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गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

मेंहीं बाबा का मोक्ष ज्ञान भाग 3

                        -:जयगुरूदेव:- 
                                           नमस्कार मित्रों ,
आज सदगुरू मेंहीं बाबा का उपदेश के
 मोक्ष ज्ञान भाग 3 लेकर आया हूँ
 मन को एकाग्रचित्त करके पूरा पूरा पढें।
 शांति की अनुभूति होगी और सतपथ पर
 आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होगा ।
आइये मेंहीं बाबा का मोक्ष ज्ञान भाग 3 को पढ़ें।

36.शब्द का स्वाभाविक गुण है कि वह अपने केंद्र पर सूरत को आकर्षित करता है
 केंद्र के गुण को साथ लिए रहता है
 और अपने में ध्यान लगाने वाले को अपने गुणों से युक्त कर देता है।।


37. सृष्टि के दो बड़े मंडल है -परा प्रकृति मंडल वा सच्चिदानंद पद वा कैवल्य पद वा निर्मल चेतन( जड़ विहीन चेतन) मंडल और अपरा प्रकृति वा जरात्मक प्रकृति मंडल।।


38. जरात्मक प्रकृति व अपरा प्रकृति चार मंडलों में विभक्त है।
 महा कारण, कारण, सूक्ष्म और स्थूल।
 इस प्रकृति का मूल स्वरूप (रज तम और सत्) त्रयगुण का सम्मिश्रण रूप है
 अपने इस रूप में यह प्रकृति साम्यावस्था धारिणी है। इसके इस रूप को महा कारण कहना चाहिए।

 इसके इस रूप के किसी विशेष भाग में भाग में जब गुणों का उत्कर्ष होता है 
तब इस का वह भाग जो क्षोभित होकर विकृत रूप को प्राप्त होता है ।
इसलिए वह भाग प्रकृति नहीं कहलाकर विकृति कहलाता है।
 और उस भाग में सम अवस्था नहीं रह जाती है
 विश्व ब्रह्मांड की रचना होती है।
 और इसलिए वह भाग विश्व ब्रह्मांड का कारण रूप है।
 ऐसे अनेक ब्रह्मांड का कारण जरात्मक मूल प्रकृति में है ,
इसलिए यह प्रकृति अपने मूल रूप में कारण की खानी भी कही जा सकती है।
 कारण रूप से सृष्टि का प्रवाह जब और नीचे की ओर प्रवाहित होता है ।
तब वह सूक्ष्म कहलाता है 
और सूक्ष्म रूप से और नीचे की ओर उतर कर स्थूलता को प्राप्त वह स्थूल कहलाता है ।
इसी तरह जरा त्मक प्रकृति के 4 मंडल बनते हैं।


39.परा प्राकृती मंडल के सहित जडात्मक प्रकृति के चारों मंडलों को जोड़ने से संपूर्ण सृष्टि में 5 मंडल -कैवल्य, महा कारण, कारण ,सूक्ष्म और स्थूल है।


40. संख्या 39 में लिखित पांच मंडलों से जैसे विश्व ब्रह्मांड वाह्य जगत भरपूर है वैसे ही इन पांचों मंडलों से पिंड शरीर भी भरपूर है।
 जागृत और स्वप्न अवस्थाओं में की अपनी स्थिति को बिचारने पर प्रत्यक्ष ज्ञात होता है कि पिंड के जिस मंडल में जब जो रहता है वह इसके जिस मंडल को जब जो छोड़ता है ब्रह्मांड के भी उसी मंडल में वह तब रहता है या ब्रह्मांड के भी उसी मंडल को वह तब छोड़ता है इसलिए पिंड के सब मंडलों को जो सूरत व चेतन विरती पार करेगी तो वह यह सृष्टि के सभी मंडलों को वह पार कर जाएगी।।


41. किसी भी मंडल का बनना तब तक  असंभव है, जब तक उसका केंद्र स्थापित न हो।।


42. सृष्टि के कथित पांच मंडलों के 5 केंद्र अवश्य है ।।


43.कैवल्य मंडल का केंद्र स्वयं परम प्रभु सर्वेश्वर है महा कारण का केंद्र कैवल्य और महा कारण की संधि है,
कारण का केंद्र महा कारण और कारण की संधि है,
 सूक्ष्म का केंद्र कारण और सूक्ष्म की संधि है,
 स्थूल का केंद्र स्थूल और सूक्ष्म की संधि है।।



44. केंद्र से जब सृष्टि के लिए कैंप की धारा प्रवाहित होती है तब सृष्टि होती है 
प्रवाह का सहचर शब्द अवश्य होता है 
पांचों मंडलों के केंद्र से स्थित केंद्रीय शब्द अवश्य है।
 कथित पांचों मंडलों के केंद्रीय ध्वन्यात्मक सब शब्द के मुंह या प्रवाह और ऊपर से नीचे को है ।
इनमें से प्रत्येक सूरत को अपने अपने उद्गम स्थान पर आकर्षण करने का गुण रखता है 
सार शब्द व निर्मायिक शब्द परम प्रभु सर्वेश्वर तक आकर्षण करने का गुण रखता है
 और वर्णित दूसरे दूसरे शब्द जिन्हें मायावी कह सकते हैं ,
अपने से ऊंचे दर्जे के शब्दों से ध्यान लगाने वाले को मिलाते हैं इनका सहारा लिए बिना सार शब्द का पाना असंभव है ।
यदि कहा जाए कि सार शब्द मालिक के बुलाने का पैगाम देता है तो उसके साथ ही यही कहना उचित है कि इसके अतिरिक्त दूसरे सभी केंद्रीय शब्दों में से प्रत्येक शब्द अपने से ऊंचे दर्जे के शब्दों को पकड़ा देता है।।

45. ऊपर का शब्द नीचे दूर तक पहुंचता है और सूक्ष्म अपने से स्थूल में स्वभाविक ही व्यापक होता है ।
तथा सूक्ष्म धार, स्थूल धार से लंबी होती है
 इन कारणों से प्रत्येक निचले मंडल के केंद्र पर से उसके ऊपर के मंडल के केंद्रीय शब्द का ग्रहण होना अंक गणित के हिसाब के सदृश ध्रुव निश्चित है।
 ऊपर कथित शब्दों के अभ्यास से सूरत का नीचे गिरना नहीं हो सकता है ।।


46.उपनिषदों में और भारती संतवाणी में नादानुसंधान या सुरत शब्द योग करने की विधि इसी हेतु से है की संख्या 45 में वर्णित केंद्रीय शब्दों को ग्रहण करते हुए और शब्द के आकर्षण से खींचते हुए सृष्टि के सब मंडलों को पार कर सर्वेश्वर को प्रत्यक्ष पाया जाए।।


47. प्रकृति को भी अनाद्या कहा गया है ।
इसलिए नहीं कि परम प्रभु सर्वेश्वर की तरह यह भी उत्पत्ति हीन है 
परंतु इसलिए कि इसकी उत्पत्ति के काल और स्थान नहीं है ;
क्योंकि इसके प्रथम नहीं परंतु इसके होने पर ही काल और स्थान या देश बन सकते हैं।
 यह परम प्रभु की मौज से परम प्रभु में ही प्रकट हुई अतः परम प्रभु में ही इसका आदि है
 और परम प्रभु देश कालातीत है और वह अनादि के भी आदि कहलाते हैं ।
प्रकृति को अनादि शांत भी कहते हैं


48. पिंड अर्थात शरीर को क्षेत्र और आत्मा को क्षेत्रज कहते हैं।।


49. स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महा कारण
 यह चारों क्षेत्र या शरीर जड़ है
 इनसे आवर्णित रहने पर परम प्रभु सर्वेश्वर का यानी आत्मस्वरूप का अपरोक्ष ज्ञान नहीं हो सकता है।।

50. कैवल्य शरीर या क्षेत्र चेतन है
 यह परम प्रभु सर्वेश्वर का अत्यंत निकटवर्ती है 
अर्थात इसके पड़े सर्वेश्वर के अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है
 इसके सहित रहने पर परम प्रभु सर्वेश्वर के तथा निज आत्मस्वरूप के अपरोक्ष ज्ञान का होना संभव है ।
और आत्मा को अपना और परम प्रभु सर्वेश्वर का अपरोक्ष ज्ञान हो इसमें संशय करने का कारण ही नहीं है।।

 सज्जनों आप लोग इस भाग-3 को पूरा पूरा पढे और अपने जीवन में शांति का अनुभूति कीजिए 
यह बहुत ही गहन और रहस्यमय बात है।
 और रहस्य में ज्ञान है यह गुरु महाराज की अनुभूति का एक प्रमाण है।
 अतः साधकों शांत हो करके इसे पढ़े और अपने जीवन में एक प्रैक्टिकल ज्ञान के रूप में प्रयोग करें ।
जीवन सफल होगा जीवन आनंद में होगा 
और इसी तरह का आर्टिकल पढ़ने के लिए 
इस ब्लॉग(kumartarunyadav.blogspot.com) पर आइए आपका स्वागत है
 फिर अगले कड़ी में इसका चौथा भाग अपनों के सामने लेकर प्रस्तुत होगा 
                                ।।जय गुरु।।

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