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शनिवार, 12 अप्रैल 2025

अप्रैल 12, 2025

आनंद और मंगल की जड़ सत्संग हैं -संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

बीसवीं सदी के महान संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का प्रवचन को पूरा देखें 👇🙏👇 🙏🕉️ *जय गुरूदेव* 🕉️🙏 आनन्द और मंगल की जड़ : सत्संग* *प्यारे आत्मवत् प्रिय लोगो!* मुझको बुलावा में कहा गया था कि मैं चलकर सत्संग का उद्घाटन करूँ। सत्संग मुझे बहुत प्रिय है, गोया जीवन का आधार है। इस आधार के लिए बुलावा हो, मैं उपस्थित नहीं होऊँ, तो मेरे लिए बहुत हानि, लज्जा, अपयश और अवनति का काम होगा, इसलिए आया। आते ही वेद-मंत्रों का पाठ होते पाया, तो मैं समझा- वेद-मंत्र से ही उद्घाटन होगा। फिर मुझे कुछ कहना चाहिए, सो कहता हूँ। आजकल आपके प्रान्त में और दूसरे प्रांतों में भी गोस्वामीजी की रामायण का बड़ा प्रचार है। उसमें लोग पढ़ते हैं, आप भी पढ़ते होंगे- सत्संगति मूद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला।। अर्थ बहुत सीधा है, तब भी थोड़ा-सा कहता हूँ कि गोस्वामीजी ने यह कह दिया कि मुद कहते हैं-खुशी को। आनन्द और मंगल, दोनों की जड़ सत्संग है। सत्संग आनन्द और शुभ की जड़ है। गोया सत्संग से ही आनन्द औैर शुभ होता है। ऐसा कोई नहीं, जो शुभ नहीं चाहे और आनन्द नहीं चाहे। आनन्द और शुभ की जड़ ही मिल जाए, तब तो कहना ही क्या है! जहाँ सत्संग होता है, वे वहाँ से आनन्द पाते हैं और उनका कल्याण होता है। यह बहुत बड़ी बात है कि उन्होंने कहा-सत्संग की सिद्धि फल है कि सब साधन फूल हैं। फूल हों, फल नहीं लगे तो, पूरी संतुष्टि नहीं हो सकती। सत्संग की सिद्धि फल है, इसको समझाने की कोशिश करूँगा। ‘सत’ कहते हैं, जिसमें परिवर्तन नहीं हो, जिसकी स्थिरता रहे और अत्यन्ताभाव नहीं हो। परिवर्तन=बदल जाना, जैसे हमलोगों को शरीर है। बच्चे लोग बैठे हैं, इसी तरह हमलोगों का शरीर था, सुन्दरता और शक्ति चली गयी, फिर भी शरीर वही है; इस तरह परिवर्तन होता है। शरीर मर भी जाता है। कितने शरीर मर भी गए। कहते हैं कि पाँच तत्त्व का था, पाँचो तत्त्वों में मिल गया, तब भी रहा। कहते हैं प्रलय होता है और महाप्रलय भी होता है। प्रलय में कुछ रहता है और महाप्रलय में अत्यन्ताभाव हो जाता है। अत्यन्ताभाव होगा, तब वह सत्य नहीं है। सत्य क्या है? परिवर्तन हानेवाले पदार्थों में एक जीवनी शक्ति है, जिसको ज्ञानमय कहते हैं। उसको इसलिए चेतन कहते हैं, वह चेतन इस शरीर के अन्दर अंतःकरण के साथ रहता है और ब्रह्मतत्त्व-आत्मतत्त्व से भिन्न कोई रह नहीं सकता। शरीर मर गया, उसको जलाया गया, लेकिन ब्रह्मतत्त्व जलाया नहीं गया। इसी के लिए कहा गया है कि इसको हवा सुखाती नहीं, पानी भिंगाता नहीं, अस्त्र छेदता नहीं, अग्नि जलाती नहीं आदि। यह सत्य रह गया, इसलिए इसको ईश्वर का अंश कहते हैं- ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखरासी।। अपने यहाँ इसका बहुत विश्वास है कि शरीर को जलाया गया, चेतन आत्मा रही। यह अपने कर्मानुसार स्वर्ग-नरक भोगकर संसार में आती-जाती रहती है। शरीर के तरह इसका परिवर्तन नहीं होता। केवल आत्मा का कभी अभाव होता नहीं। कितने लोग चेतन और आत्मा को एक ही समझते हैं, लेकिन ऐसी बात नहीं। चेतन बदलता नहीं, लेकिन सृष्टि का पसार हुआ है, इसकी समाप्ति होगी, उस समय चेतन का भी विलीन हो जाना होगा। कभी-न-कभी अत्यन्ताभाव भी लोग मानते हैं, लेकिन आत्मा का अत्यन्ताभाव कभी होता नहीं। ‘सत्’ परा प्रकृति के नाम से, अक्षर के नाम से विख्यात है। नाशवान पदार्थ को क्षर पुरुष कहते हैं और अनाश को अक्षर पुरुष कहते हैं। इन दोनों से जो उत्तम है, वह पुरुषोत्तम है। गीता में इन तीनों का वर्णन है। पुरुषोत्तम में भी न परिवर्तन होता है, न अत्यन्ताभाव होता है। प्रलय, महाप्रलय में इसका कुछ बिगड़ता नहीं। अक्षर पुरुष, चेतन पुरुष, परा प्रकृति का कभी-न-कभी अत्यन्ताभाव होता है, लेकिन यह भी ‘सत्य’ है। और आत्मतत्त्व का कभी परिवर्तन नहीं होता, न अत्यन्ताभाव होता है, यह भी ‘सत्य’ है। उस सत् का इस सत् से मेल हो, यही है सत्संग का फल। चेतन आत्म-तत्त्व का अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त करो। शुद्ध आत्म-तत्त्व-ब्रह्मतत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान हो, सत्संग की यही सिद्धि सत्संग करते-करते जड़-चेतन की भी गाँठ जाए; यह जड़ है, यह चेतन है-ठीक-ठीक पहचान में आ जाए और फिर आत्मतत्त्व का भी पहचान हो; यह सत्संग की सिद्धि है। लेकिन यह बाहर नहीं, अन्दर में होगा। और सब साधन फूल हैं, इसलिए कि संसार में यशस्वी होते हैं, यश की सुगन्धि फैलती है, वे संसार में प्रतिष्ठित होते हैं और यह है कि आत्मतत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। इसके लिए ध्यान-भजन करना, ज्ञान अर्जन करना, योगाभ्यास करना, भक्ति करनी-ये सब साधन फूल हैं। जो इसको ग्रहण करते हैं तो संसार में सच्चरित्र होते हैं। उनकी सच्चरित्रता की बड़ाई है, वह तमाम होने लगती है। गोया यह है, यह बाहर की सिद्धि है। अंतर में साधन करते-करते जड़-चेतन और शुद्ध आत्मतत्त्व को-तीनों को अलग-अलग कर प्रत्यक्ष जानते हैं, यह फल है। जो बराबर सत्संग करते हैं, उनके लिए है- मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहि जतन जहाँ जेहि पाई।। सो जानब सत्संग प्रभाऊ। लोकहु बेद न आन उपाऊ।। बुद्धि, यश, मुक्ति, ऐश्वर्य और भलपन; जब कभी जहाँ कहीं, जिस किसी उपाय से जिसने पाया है, वह सत्संग के प्रभाव से हुआ, जानना चाहिए। लोक और वेद में इसके मिलने का उपाय नहीं। ये पाँच पदार्थ सत्संग करते-करते मिलते हैं। जिनको ये पाँच चीजें मिल जाएँ, संसार में उसको कुछ बाकी नहीं रह जाता है। वे स्वयं लाभान्वित होते हैं और संसार को लाभ पहुँचाते हैं। सत्संग ज्ञानमयी यज्ञ है। गीता में कहा गया है कि द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ है। यहाँ भी होगा। ये शुभ के लिए करते हैं। सबसे बड़ा शुभ है-ईश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान होना। यह भी सभी प्राप्त कर लेंगे, जो सत्संग करते रहेंगे। कबीर साहब ने कहा- सत्संग से लागि रहो रे भाई । तेरी बनत बनत बन जाई ।। मैंने जो आन्तरिक सत्संग करने के लिए कहा है, वह बड़ा विस्तार है। वह ध्यान से होता है। स्थूल ध्यान को लोग जानते हैं, सूक्ष्म ध्यान कम लोग जानते हैं। सूक्ष्म ध्यान में भी रूप ध्यान और अरूप ध्यान है। जो कोई जानते हैं, वे करें; जो नहीं जानते हैं, जानकर करें। इन्हीं शब्दों के साथ मैं उद्घाटन करता हूँ, सबका कल्याण चाहता हूँ। *************** *यह प्रवचन बाँका जिलान्तर्गत गाँव पैर में दिनांक 8. 4. 1970 ई0 को अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* *************** पूरा पढ़ें और दूसरों को भी शेयर जरुर करें।

शनिवार, 25 जनवरी 2025

जनवरी 25, 2025

मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

जयगुरु 🙏 सभी सज्जन वृंद से प्रार्थना है कि प्रवचन को पूरा पढ़ें आपके लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का प्रवचन को लेकर हाजिर हूं। 🙏🕉️ जय गुरूदेव 🕉️🙏 मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्यारे लोगो! जिस क्षेत्र में हमलोग सत्संग कर रहे हैं, वह बड़े महत्त्व का है। यहाँ भगवान बुद्ध बहुत सत्संग किया करते थे। यहाँ निकट ही वेणुवन में भगवान बुद्ध सत्संग कराया करते थे। यहाँ और भी पहाड़ पर उनका स्थान है। यह पुण्यभूमि है। आपलोग जो सत्संग-प्रेमी हैं, घर के कामों को छोड़कर, विहार के इस कठिन महँगाई के समय में भी खर्च करके यहाँ आए हैं। यह देखकर मेरे चित्त को बहुत ही प्रसन्नता होती है। हमलोग क्यों आए? इसलिए कि जहाँ ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध सत्संग करते थे, वहाँ सत्संग करें। सत्संग से हम क्या सीखते हैं? बच्चे खेल खेलने में-खिलौने में खुश होते हैं। वे कुछ वर्ष खुश रहते है। उनको समझाया-बुझाया जाता है, अभिभावक की ओर से उनको भय दिखाया जाता है, दबाव डाला जाता है और विद्याभ्यास में लगाया जाता है। जैसे- जैसे वे विद्याभ्यास में बढ़ते हैं, वैसे-वैसे उनके ज्ञान का विकास होता है। वे समझते हैं कि बचपन का खेल भले ही छूट गया। वह सदा का सुखदायक नहीं था। पढ़-लिख लेने के बाद कर्तव्य और अकर्तव्य को समझने लगते हैं तथा उचित विचार कर उचित कर्म को करते हैं। ऐसे ही वे चलते हैं। यहाँ ऐसे बच्चे हैं, जो देखते हैं कि केवल संसार के ही काम हैं। जो संसार के आगे का ख्याल नहीं रखते, वे भी बच्चे हैं। मैं कहूँगा, जिनको जीवन के बाद का ख्याल नहीं है, चाहे वे कितनी अधिक उम्र के हो गए हों, फिर भी वे बच्चे हैं, चाहे वे मेरी उम्र (83 वर्ष) के हों वा मेरी उम्र से अधिक के हों। विद्या से अनुचित और अनीति को समझते हैं, फिर भी उन्हीं में चलते हैं। किन्तु सत्संग से ज्ञान सीखकर जो संसार के बाद को भी सोचते हैं, उनको पता लगता है कि यह शरीर छोड़कर जाना है। लेकिन पता नहीं, कहाँ जाना है। जाना जरूर है। कहाँ जाना है? पता नहीं। रास्ता मालूम नहीं, स्थान मालूम नहीं, कितनी चिन्ता की बात है? इस बात को जो चेतते हैं, वे ही सयाने होते हैं। वे ही बालपन के खेल को छोड़ते हैं। इन्हीं बातों को समझाने के लिए संत लोग संसार में विचरते हैं। संतों ने संसार के खेल को देखा और कहा कि इसको छोड़ देना अच्छा है। एक बात तो यह है कि संसार के कामों से उपराम होना और दूसरी बात यह है कि संसार के कामों में लगे रहने पर भी संसार से उपरामता रहे। संसार के कामों में त्रुटि नहीं होने देकर उसमें उपरामता रहे, यह उत्तम है। जो संसार के कामों को छोड़कर रहते हैं, वे भी संसार के कामों और प्रबन्धों को छोड़कर नहीं रह सकते। मनुष्य को समझ में आवे कि रास्ता क्या है? जाना कहाँ है? सबसे उत्तम स्थान कहाँ है? यह भी संसार का ही काम है। और कामों से मन को हटा लिया जा सकता है, लेकिन इससे हटा नहीं सकते। बड़े-बड़े संतों, महात्माओं को ऐसा ही देखा गया। वे लड़ाई के मैदान में नहीं गए, खेती करने नहीं गए, नौकरी नहीं की, लेकिन यह काम अपने ऊपर ले लिया कि ‘चलना है रहना नहीं, चलना बिस्वाबीस।’ यह ख्याल देते रहे। चलना किस रास्ते से है। कहाँ जाना है? इस बात को समझाते हैं। यह समझाना निर्वाण में जाकर नहीं होता, संसार में रहकर ही करते हैं। दूसरे वे हैं, जो संसार के कामों को करते हुए अपने चेतते हैं और दूसरों को चेताते हैं, जैसे भगवान श्रीकृष्ण। भगवान बुद्ध संन्यासी हुए, औरों को भी उन्होंने संन्यासी बनाया। भगवान बुद्ध के समय में जितने संन्यासी हुए उतने किन्हीं के समय में नहीं। केवल संन्यासी ही नहीं बनाए, राजा और सेनापति भी उनके शिष्य थे। उनको उन्होंने संन्यासी नहीं बना लिया, उस तरह की शिक्षा दी। ‘कर ते कर्म करो विधि नाना। सुरत राख जहँ कृपानिधाना।। युद्ध भी करो और स्मरण भी करो। ‘तन काम में मन राम में।’ ‘करम करै करता नहीं, दास कहावै सोय।’ -कबीर साहब कर्म करते थे। उन्होंने अपने जीवन- यापन के लिए किसी दूसरे पर भार नहीं दिया। ‘थोड़ा बनिज बहुत ह्नै बाढ़ी उपजन लागे लाल मई।’ संतोष उनको बहुत था। थोड़ा-सा काम करते थे, अपना जीवन-यापन जिससे हो। मतलब यह कि जो संन्यासी हो जाते हैं, उनका कर्तव्य हो जाता है कि वे संसार के पार को बतावें। संसार में सदा रहना नहीं है। समर्थ रामदास ऐसे थे कि वे शिवाजी राव को चलाते थे। राजा को भी अपनी राय देते थे। शिवाजी ने कहा कि मैं तप करूँगा। समर्थ ने कहा- मैं तुम्हारा तप करता हूँ, तुम तलवार लो। गुरु गोविन्द सिंहजी महाराज ने दोनों काम करके दिखाया-भजन भी, तलवार भी। गुरु गोविन्द सिंहजी महाराज कभी अनीति में नहीं गुजरे। बेटे मर गए, लेकिन उन्होंने शोक नहीं किया। उन्होंने समय को देखा। संसार में युद्ध-ही-युद्ध होता है। वेद के उपदेश से यही मालूम हुआ कि इन्द्रिय का सुख, सुख नहीं है। संसार के पदार्थों में सुख नहीं, ईश्वर-भजन में सुख है। भगवान बुद्ध के वचन का धम्मपद ग्रन्थ से पाठ हुआ, उसमें भी यही आया, ‘ईश्वर-भजन करो’-ऐसा तो उसमें नहीं आया, लेकिन यह आया कि संसार के सुखों में आसक्त मत होओ। तब क्या करो? संसार के सुख में नहीं फँसकर, शरीर-सुख से जो विशेष सुख है, उस ओर चलो। निर्वाण की ओर चलो। यह संसार जो दीप-टेम के समान जलता है, सदा के लिए बुझ जाए, उधर चलो। हमलोग इन्हीं बातों को याद दिलाने और जो नहीं सुने हैं, उनको सुनाने के लिए यह सत्संग करते हैं। जिनको सत्संग का चसका लग जाता है, वे दूर-दूर से आते हैं। उनके मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग होता है। सुनकर लोग विद्वान होते हैं। भगवान बुद्ध ने जो वचन कहे थे, लोगों ने सुने, याद रखे। लिखे तो पीछे गए। उपनिषद् के पाठ में आया कि भवसागर को पार करने के लिए सूक्ष्म मार्ग का अवलम्बन करो। स्थूल रास्ते पर चलकर संसार भर ही रहोगे, बाहर नहीं जा सकते। संसार का मार्ग तो यह है कि यहाँ से कलकत्ता जाओ और कलकत्ता से यहाँ आओ। यह स्थूल मार्ग है। दूसरा मार्ग है कि शरीर छूटने के बाद-संसार से जाने के बाद आराम से रहना हो। इसके लिए जो उत्तम-उत्तम कर्म हैं, स्थूल दर्जे के ही हैं। फिर भी उत्तम हैं, उनको करो। सूक्ष्म मार्ग बहुत उत्तम है। ‘लखे रे कोई बिरला पद निर्वाण।’ यह बाहर में नहीं है, भीतर का रास्ता है। उसपर पैर से चला नहीं जाता। सूक्ष्म अवलम्ब लेकर चलना होता है। ‘बिन पावन की राह है, बिन बस्ती का देश। बिना पिण्ड का पुरुष है, कहै कबीर सन्देश।।’ इस सत्संग से ये ही सब बातें बतायी जाएँगी। मैं धीरे-धीरे बतलाऊँगा कि सूक्ष्म मार्ग कहाँ है, उसका आरम्भ कहाँ से है और अंत कहाँ है? मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं बतलाऊँगा कि जहाँ से आपको फिर लौटकर इस संसार में आना नहीं होगा। *************** *यह प्रवचन नालन्दा जिलान्तर्गत भगवान महावीर और भगवान बुद्ध के विहार स्थल राजगीर में 58वाँ अखिल भारतीय संतमत सत्संग का विशेषाधिवेशन दिनांक 28. 10. 1966 ई0 के प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था।* *************** अगर आप प्रवचन को पूरा पढ लिये है तो शेयर जरुर करें।

सोमवार, 6 जनवरी 2025

जनवरी 06, 2025

दर्शन पाने के लिए दूर जाना है -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का प्रवचन को लेकर आया हूं। पूरा देखें और उसके अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। इसलिए पूरा पढ़ें 🙏🕉️ जय गुरूदेव 🕉️🙏 दर्शन पाने के लिए बहुत दूर जाना है-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्यारे लोगो ! मैं चाहता हूँ कि आपको ईश्वर-स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो और अपने तईं (स्वयं) का यथार्थ ज्ञान हो। चूँकि सबके सब सुख को बहुत प्यार करते हैं, सुख के लिए ही तमाम जीवन परिश्रम करते हैं, इसलिए जो सुख पूर्ण रूप से आपको संतुष्ट कर सके, उसको आप प्राप्त करें। ऐसा नहीं कि आप कुछ भी सुख नहीं पाते। सुख पाते हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं होते। ऐश्वर्य वाले, कम ऐश्वर्य वाले, जिनको जैसा सुख मिलता है, वे उससे संतुष्ट नहीं होते। वह सुख भी सदा नहीं रहता। सुख-भोगते हुए भी संतुष्ट नहीं होते, फिर जो सुख भागता रहता है, उससे लोग कैसे संतुष्ट होंगे? आप अपना ज्ञान करें तो आप मन नहीं हैं, कोई इन्द्रिय नहीं हैं, इनसे कुछ विलक्षण हैं। अपने स्वरूप को मन-इन्द्रिय के परे जानकर आपको सोचना चाहिए कि मन-इन्द्रिय के ऊपर जो अपना स्वरूप है, उसका सुख कैसा है? संतों के ज्ञान के मुताबिक अपने तईं का वह सुख नहीं है, जो मन- इन्द्रियों का सुख है। मन-इन्द्रिय के सुख के लिए विषय चाहिए, लेकिन अपने तईं के सुख के लिए मायिक विषय कुछ नहीं चाहिए। मन-इन्द्रिय के संग में रहकर हम अपने को मन-इन्द्रिय नहीं जानें, ऐसा ज्ञान होना चाहिए। इसी ज्ञान में अपने का और पारमार्थिक सत्ता का दर्शन वा ज्ञान होगा। इसी का ठीक-ठीक यत्न आपको बताया जाय, सत्संग का यही प्रयोजन है। इसको जानकर जो उसपर लगते हैं, वे बड़े संयमी होते हैं, वे दुष्टकर्म नहीं करते। संसार से दुष्टकर्म बिल्कुल नष्ट होना तो असम्भव है, लेकिन कम हो जाएगा। दुष्टकर्म कम हो जाएँ, तो संसार में शान्ति आ जाएगी। दुष्टकर्म से बचाव होने पर संसार में शान्ति विराजेगी। जिस राष्ट्र के शासन में शान्ति नहीं है, दुष्टकर्म की अधिकता है, उस राज्य में सुराज नहीं है। हमलोगों को स्वराज्य प्राप्त है, इसके साथ सुराज भी चाहिए। यह तभी होगा, जब हम दुष्टकर्मों को कम कर देंगे वा नहीं करेंगे। हमारा आधार क्या होना चाहिए? वह आधार वही है, जहाँ दुष्टकर्मों की पहुँच नहीं है। वह क्या है? दो बातों में से एक बात कह सकते हैं। एक कहने से दूसरे का भी ज्ञान होता है। वह है मूल सत्ता-परमात्म-तत्त्व वा अपनी आत्मा। यह कैसी बात है? कितना दुःख है कि जो हम सब लोग नहीं हैं, उसी को पहचानते हैं और मैं हूँ, हम हैं-कुप्पाघाट कहते हैं, किन्तु अपने तईं जो हम हैं, इसका ज्ञान नहीं होता है। परोक्ष ज्ञान भी तो नहीं होता, अपरोक्ष ज्ञान कैसे होगा? प्रत्यक्ष प्राप्ति का ज्ञान अपरोक्ष ज्ञान है। यह केवल कहने से वा सुनने से नहीं होगा। धन धन कहत धनी जो होते निर्धन रहत न कोई । -कबीर साहब वाक्य ज्ञान अत्यन्त निपुण, भव पार न पावइ कोई । निशि गृह मध्य दीप की बातन्हि तम निवृत्त नहिं होई ।। -गोस्वामी तुलसीदासजी तेल तुल पावक पुट भरि धरि बनै न दिया प्रकाशत । कहत बनाइ दीप की बातें, कैसे हो तम नाशत ।। -सूरदासजी सत्यस्वरूप-निजस्वरूप वा आत्मस्वरूप का अपरोक्ष और परोक्ष दोनों ज्ञान होना चाहिए। जिसको पहले परोक्ष ज्ञान होगा, वही अपरोक्ष ज्ञान को पा सकता है। यह केवल विचार-ही-विचार से नहीं होगा। ईश्वर की भक्ति करो। पहले परोक्ष ज्ञान होगा, बाद में अपरोक्ष ज्ञान हो जाएगा। योग शास्त्र कहता है कि योग का पहुँचाना समाधि तक है। कबीर साहब ने कहा है- लम्बा मारग दूरि घर, विकट पन्थ बहु मार । कहो सन्तौ क्यूँ पाइए, दूर्लभ हरि दीदार ।। दर्शन पाने के लिए बहुत दूर जाना है। उस रास्ते में चलते हुए बहुत विघ्न बाधा है। वहाँ तक कैसे पहुँचोगे? उत्तर दिया- अनहद बाजै निझर झरै, उपजै ब्रह्म गियान । आवगति अन्तरि प्रगटै, लागै प्रेम धियान ।। इसीलिए भगवान बुद्ध ने भी कहा कि- भिक्षुओ, ध्यान करो। पहले प्रत्याहार, उसके बाद धारणा, धारणा के बाद ध्यान और अन्त में समाधि होती है। यह केवल संन्यासी के लिए ही है, ऐसा जानना गलत है। गृहत्यागी और गृहस्थ दोनों ही संयमी होकर रहने से लाभ कर सकते हैं। स्वयं भगवान बुद्ध को इसके लिए बहुत जन्म लेने पड़े। जब उन्होंने बुद्धत्व को लाभ किया, यह उनका आखिरी जन्म था। शरीर और संसार को देखो। शरीर पिण्ड और संसार ब्रह्माण्ड है। तत्त्वों की जितनी संख्या से ब्रह्माण्ड की बनावट है, शरीर भी उतने ही तत्त्वों से बना है। संसार में जितने तल हैं, शरीर के भी उतने ही तल हैं। शरीर के जिस तल पर रहो, संसार के भी उसी तल पर रहोगे। शरीर के सब आवरणों को पार करो तो संसार के सब आवरणों को पार करोगे। यही ब्रह्मज्ञान है। यहीं पर पहुँच कर ‘जानत तुम्हहिं तुम्हइ होइ जाई’ होता है। हम इन सब बातों को जानें और साधन-भजन करें। शरीर के जीवन का अन्त है, लेकिन निज आत्मस्वरूप का विनाश नहीं होता। आत्मा का जीवन बहुत लम्बा है। शरीर के ज्ञान से तबतक नहीं छूटेगा, जबतक आत्मज्ञान नहीं होगा। जैसे स्वप्न का दुःख-सुख मिथ्या है, सांसारिक दुःख-सुख भी वैसा ही है। जगना ऐसा होगा कि यह संसार स्वप्न मालूम होगा। इसीलिए मायामिथ्यात्व वाद का ज्ञान संसार में है। मायामिथ्यात्व वाद का ज्ञान तबतक नहीं छूटता, जबतक हम मोह में सोए रहेंगे-तीन अवस्थाओं में रहेंगे। चौथी अवस्था में जाने पर यह संसार स्वप्न होगा। थोड़ा करो, तब भी बड़ा लाभ प्राप्त होगा। थोड़ा करो तो थोड़ा- थोड़ा लाभ होता जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि योग के आरम्भ का नाश नहीं होता। यह ज्ञान संसार में मनुष्य को गिरने नहीं देता। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है-हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में और न परलोक में ही नाश होता है; क्योंकि हे तात! कल्याणमार्ग में जानेवाले की कभी दुर्गति होती ही नहीं। पुण्यशाली लोग जिस स्थान को पाते हैं, उसको पाकर वहाँ बहुत समय तक रहने पर योगभ्रष्ट मनुष्य पवित्र और श्रीमान् के घर जन्म लेता है या ज्ञानवान योगी के ही कुल में वह जन्म लेता है। जगत में ऐसा जन्म अवश्य बहुत दुर्लभ है। हे कुरुनन्दन! वहाँ उसे पूर्व जन्म के बुद्धि- संस्कार मिलते हैं और वहाँ से वह मोक्ष के लिए आगे बढ़ता है। उसी पूर्वाभ्यास के कारण वह अवश्य योग की ओर खिंचता है। योग का जिज्ञासु भी शब्दब्रह्म को पार कर जाता है। लगन से प्रयत्न करता हुआ योगी पाप से छूटकर अनेक जन्मों से विशुद्ध होकर परमगति को पाता है। भक्ति बीज पलटै नहीं, जो युग जाय अनंत । ऊँच नीच घर जन्म ले, तऊ संत को संत ।। भक्ति बीज बिनसै नहीं, आय पड़ै जो चोल । कंचन जौ ं विष्ठा पड़ै, घटै न ताको मोल ।। -कबीर साहब रविदासजी में साधन-भजन का उतना ही बल था, जितना गोस्वामी तुलसीदासजी में। उच्च वर्ण के हों वा नीच वर्ण के, दोनों ने साधन किया, लेकिन दोनों पहुँचे वहाँ एक ही स्थान में। स्वरूप में कोई भेद नहीं। हरि की भक्ति करै जो कोई । सूर नीच सू ऊँच सो होई ।। -सूरदासजी ईश्वर-स्वरूप का ज्ञान होना चाहिए। उस तक पहुँचने का रास्ता चाहिए। रास्ता पर चलने का संयम चाहिए। औषधि सेवन करने से रोग कम हो जाता है। असंयमित होने से रोग बढ़ता है। संयम में जोर दे दो तो भजन में बढ़ोगे। भजन में जोर देने से संयम बढ़ेगा। जिभ्या का स्वाद तृष्णावर्द्धक और असन्तुष्ट रखनेवाला है। अपने आप में देखो तो बड़ा विचित्र है। जाग्रत से स्वप्न में जाने में चैन मिलता है। वहाँ संसार का कुछ भी नहीं है। यह थोड़ा सा नमूना है कि भीतर प्रवेश करने में चैन मिलता है। स्वप्न में आप मनोमय जगत में रहते हैं। जगने पर फिर इस संसार को देखते हैं। स्वप्न में मनोमय राज्य में-मनोमय भोग में थोड़ा-सा सुख पाते हैं। यह बहुत नजदीक की बात है। इतना अपने अन्दर में धँसो कि अपने की पहचान हो जाय। स्वप्न में अपने जाग्रत के सुख-दुःख का कुछ ज्ञान नहीं रहता। सुषुप्ति में तो और क्या रहेगा? सुषुप्ति अवस्था में ठहराव कम होता है, फिर भी अचेतन अवस्था वहाँ है। जाग्रत, स्वप्न वा सुषुप्ति; किसी में भी सुख नहीं है। जबतक निदिध्यासन करते हुए सफल रहो, तबतक चौथी अवस्था में रहोगे। एक तो अभ्यास द्वारा पकड़ना चाहता है और दूसरी बात है कि वह स्वयं पकड़ा जाता है। लम्बा मार्ग यह है कि तीनों अवस्थाओं को पार करो। जाग्रत का संसार बहुत दूर तक है। इसमें भी ऊँचे-नीचे तल हैं। इसी तरह चौथी अवस्था दूर तक है और ऊँचा-नीचा तल है। इसका अभ्यास संन्यासी करे, गृहस्थ नहीं, बहुत गलत बात है। हमलोग आर्य हैं। आर्य का अर्थ-बुद्धिमान, विद्वान, सभ्य आदि है। गीता में, महाभारत में, बौद्ध ग्रन्थों में हमारे लिए ‘आर्य’ शब्द छोड़कर दूसरा नहीं आया है। हाल में तुलसीदासजी हुए, इनकी रचना में ‘आर्य’ के सिवा दूसरा शब्द नहीं है। ‘आर्य’ कहते हैं-बुद्धिमान को। हमको बुद्धिमान बनना चाहिए। ‘बुद्धि’ वह हो, जिसमें आत्मज्ञान हो। *************** *यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट के निकट गंगा तट पर 58वाँ वार्षिक महाधिवेशन के अवसर पर दिनांक 11. 4. 1966 ई0 को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था।
*************** पूरा पढ़ने के आपका सहृदय आभार और बहुत बहुत साधुवाद।

गुरुवार, 2 जनवरी 2025

जनवरी 02, 2025

मन से स्वतंत्र कैसे होंगे -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार आप सभी के लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के प्रवचन को प्रस्तुत कर रहे हैं। एक बार जरूर पढ़ें और अपने जीवन में सुख शांति अनुभूति करेंगे। 🙏🕉️जय गुरूदेव 🕉️🙏 मन से स्वतन्त्र कैसे होंगे?-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! ईश्वर की भक्ति को समझ सकें, इसके लिए आपको याद दिलाता हूँ। ईश्वर की भक्ति के समझने में, पहले ईश्वर-स्वरूप का निर्णय होना चाहिए। ईश्वर मायातीत होने के कारण इन्द्रिगम्य नहीं हैं। इसलिए वे प्रत्यक्ष नहीं हैं। भक्ति कहते हैं-सेवा को। जो प्रत्यक्ष नहीं है, उनकी सेवा हम कैसे करें? उनके प्रत्यक्ष रूप का भजन या भक्ति संतों के संग भी हैं। यह एक तरह की सेवा है। जहाँ ईश्वर संबंधी कथाएँ हां, सुनो; यह भी एक तरह की भक्ति है। इन्द्रियों को काबू में रखने के लिए, बहुत से कर्मों से अपने को बचाए रखो। पंच पापों से बचे रहकर ही सज्जनों के धर्मानुकूल बर्ता जा सकता है। इन्द्रियों के रोकने का स्वाभाववाला बनने के लिए केवल विचार से ही नहीं होता है। इन्द्रियों के संग, मन की धारें लगी रहतीं हैं। इन धारों को इन्द्रिय के स्थानों से समेट कर एक केन्द्र पर रखो, तो दमशीलता होगी। दमशीलता के अंदर मन का रूप बहिर्मुख से अंतर्मुख हो जाता है। यह ऊर्ध्वगमन ही ईश्वर की भक्ति होती है। जैसे जगन्नाथजी जानेवाले का चलना जगन्नाथजी की भक्ति है, उसी प्रकार ईश्वर की ओर चलना भी ईश्वर की भक्ति है। जो लोग ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन के वास्ते अंदर-अंदर चलते हैं, उनका वह चलना ईश्वर-भक्ति के अंदर दाखिल है। किसी भी मन्दिर में मूर्ति का दर्शन करके प्रत्यक्ष दर्शन की लालसा रह जाती है। दर्शन प्रत्यक्ष होना चाहिए। अन्तर्मार्गी को प्रत्यक्ष दर्शन होता है। बाहर घूमते हो इन्द्रियों के संगे-संग और अंदर घूमते हो इन्द्रिय और शरीर का संग छोड़कर। अंदर चलते-चलते अपने का पता लग जाएगा। उसी को ईश्वर का भी पता लगेगा। चेतन आत्मा के ऊपर से जब सब आवरण उतर जाते हैं, तो आत्मदृष्टि होती है। यह आत्मदृष्टि किसी के देने से नहीं होती। अन्तरंग साधना द्वारा ईश्वर की ओर चलना, ईश्वर की भक्ति है। यही परा भक्ति है। जीवात्मा शरीरों को छोड़ते-छोड़ते परमात्मा में अपने आप जा मिलती है। दमशील होने के साथ- साथ शमशील भी होना चाहिए। ‘दम’ के बिना ‘शम’ नहीं होता। ‘शम’ का साधन पूर्ण सिमटाव में पहले विन्दु पर अवस्थित रहकर वहाँ जो शब्द होता है, उसको ग्रहण करके होता है। जहाँ कम्पन है, वहीं शब्द है। जहाँ कम्पन नहीं, वहाँ रचना नहीं। कम्पन में शब्द अनिवार्य रूप से होता है। सभी शब्द सुन नहीं पाते, इसलिए कहते हैं कि कम्पन में शब्द नहीं होता। कम-से-कम 20 कम्पनांक के शब्द को तथा ज्यादे-से-ज्यादे 20 हजार वा 30 हजार कम्पनांक के शब्द सुन सकते हैं। उससे कम या अधिक कम्पनांक के शब्द कों सुन नहीं सकते। चाहे स्थूल जगत हो या सूक्ष्म जगत, बिना कम्प के रचना बन नहीं सकती। जहाँ रचना है, वहाँ शब्द है। ऊपर का शब्द नीचे दूर तक आता है। अभ्यासी एक विन्दु पर, उस सूक्ष्म मण्डल के केन्द्रीय शब्द को सुनता है। एकविन्दुता के कारण सूक्ष्म मण्डल में प्रवेश हुआ, इसलिए सूक्ष्म मण्डल के केन्द्र का शब्द पकड़ा जाता है। संतों ने पुकारकर कहा है-‘जेहि शब्द से प्रगट भये सब, सोई शब्द गहि लीजै।। (कबीर साहब) यही ईश्वर का प्रतीक है। ईश्वर तक पहुँचने का दृश्यमान र्चिं विन्दु है। बाहर में प्रतीक बनाते हैं, यह स्वकृत है। ईश्वरकृत र्चिं जैसा मनुष्यकृत र्चिं नहीं हो सकता। चलना रास्ते पर होता है। रास्ते का ओर-छोर होता है। इसका आरंभ एकविन्दुता से होता है और अंत परमात्मा में होता है। यह ज्योति मार्ग और शब्दमार्ग सबके अंदर-अंदर मौजूद है। अध्यात्म- वैज्ञानिक अपने शरीररूपी धरती में खोजकर ज्योति और शब्द पाते हैं। नहीं करनेवाला अगर कहे कि ‘नहीं है’ तो उसका यह कहना गलत है। प्रत्याहार में जो हैरानी होती है, वह साधन करते-करते मिट जाती है। शमशीलता शब्द-साधना से होती है। परा भक्ति को जो नहीं जानते हैं, वे मोटी भक्ति को पकड़े रहते हैं। पूजा-पाठ में जो एकाग्रता आती है, उससे अधिक एकविन्दुता में आती है। स्थूल भक्ति, भक्ति का पैर है और सूक्ष्म भक्ति, भक्ति का शिर है। केवल पैर ही पैर नहीं जानो, शिर को भी जानो। पंच पापों (झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार) से बचे रहो। संसार में दुष्टकर्म से जनता में कष्ट होता है। हमलोगों को सुराज्य प्राप्त है। इसके लिए कितने गोली के शिकार हुए और फाँसी पर चढ़े। परन्तु सुखी हम अपने को नहीं पाते हैं। हमें पापों से रहित होना चाहिए। अपने को पापों से छुड़ा ले, तो दुष्ट कर्म बिल्कुल मिट जाएँगे और स्वराज्य में सुराज हो जाएगा। ईश्वर की भक्ति करनेवाले पापों से छूटते हैं। सबको चाहिए कि अपने को भक्त बना लें। किसी तरह धन कमा लो, इसमें पापों को नहीं छोड़ते हैं। परन्तु ईश्वर की भक्ति में पंच पापों को छोड़ना आवश्यक है। अपने तईं अपने को ईश्वर तक पहुँचाना ही ईश्वर की भक्ति है। हमलोग तन से स्वतंत्र हो गए हैं, परन्तु मन से नहीं। *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 27. 12. 1965 ई0 के अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* *************** इस प्रवचन को पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत साधुवाद एवं कमेंट बॉक्स में जयगुरु जरूर लिखें और शेयर करें 🙏

मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

दिसंबर 31, 2024

योगी देवता के पद से भी आगे बढ़ जाते हैं -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार आप सभी धर्मप्रेमी के महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का दिव्य प्रवचन लेकर आया हूं। सद्गुरु महाराज का प्रवचन जीवन को नयी आध्यात्मिक पर ले जाने वाला है।इसे पूरा पढ़ें 🙏🕉️ जय गुरूदेव 🕉️🙏 योगी देवता के पद से भी आगे बढ़ जाते हैं-संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! आपलोग शान्तिप्रिय बनें। शान्ति कैसे प्राप्त हो, यह इस सत्संग से जानें। सत्संग में भक्ति के बारे में कहा जाता है, ईश्वर-स्वरूप का ठीक- ठीक निर्णय बताया जाता है। आपके अपने-अपने घरों में, ईश्वर संबंधी कोई- न-कोई शब्द बच्चों को रटाते हैं। यह बहुत अच्छी रिवाज है। ईश्वर को अनेक मानना गलती है। क्या! ईश्वर अनेक हो सकते हैं? जो भक्त ईश्वर को अनेक मानते हैं, वे कम जानते हैं। ईश्वर दो हो नहीं सकते, यह एकदम असम्भव है। अनेक ईश्वर को मानने की साम्प्रदायिक भावना आपस में झगड़े पैदा कर देती है। यथार्थ में ईश्वर एक ही हैं। नाम और रूप अनेक हैं। उपनिषद् का यह ज्ञान बहुत उत्तम है- वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ।। -कठोपनिषद् , अध्याय 2, वल्ली 2 अर्थात् जिस प्रकार इस लोक में प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है। ब्रह्म या आत्मा एक-ही-एक है, वह वायु के ऐसा सर्वव्यापक है और सर्व से परे भी है। ईश्वर का न केन्द्र होता है और न परिधि। जीव केन्द्र और परिधियुक्त है। ईश्वर केन्द्र और परिधि से परे है। उसकी सीमा कहीं नहीं होती है। उसी एक को राम, शिव, विष्णु आदि कहते हैं। यह नाम, रूप माया है। ‘नाम रूप दुइ ईश उपाधी।’ (गोस्वामी तुलसीदासजी) पशु-योनि में जो मन रहता है, वही मन मनुष्ययोनि में भी रहता है। इसीलिए पशु-योनि का संस्कार मनुष्यों में पाया जाता है। जीवात्मा परमात्मा का अभिन्न अंश है। यह अंश आवरण के कारण से माना जाता है। कितना भी बड़ा रूप बना लो, वह रहेगा आकाश के अंदर ही। ईश्वर माया के रूप को भरकर उससे बाहर कितना है, कोई नहीं कह सकता। ईश्वर इन्द्रियों को व्यक्त नहीं, परन्तु आपको व्यक्त है। जो कोई योगी होता है, वह देवता के पद से भी आगे बढ़ जाता है। जहाँ जाकर ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ होता है। मनुष्य वहाँ तक जा सकता है। परमात्मा की भक्ति हम माया रूप पाने के लिए नहीं, उनके स्वरूप को पाने के लिए करें। मनु-शतरूपा को माया रूप का दर्शन हुआ, लेकिन उनका कष्ट नहीं छूटा। इससे छूटने के लिए अमायिक रूप का दर्शन चाहिए। उन्हें आत्मा से ही पहचान सकेंगे। आत्मा को अपनी कैवल्य-दशा में आना चाहिए। शरीर माया से निर्मित घर है। इसको जबतक हम पार नहीं कर जाएँ, तबतक हम कैवल्य-दशा को प्राप्त नहीं कर सकते। अंदर चलने के लिए ध्यानाभ्यास करो। किसी रूप का ध्यान स्थूल ध्यान है। रूप ध्यान से सिमटाव होता है और सूक्ष्म ध्यान करने की योग्यता प्राप्त होती है। ध्यान करने के लिए कहीं घर छोड़कर भागने की आवश्यकता नहीं। कर्म करो और ध्यान भी करो। सज्जनों के धर्मानुकूल चलो। पंच पापों से रहित को सज्जन कहते हैं। दमशीलता का अभ्यास करो। दमशील इन्द्रियों को रोकने का स्वभाववाला होता है। दमशील केवल विचार से नहीं हो सकते। मन की सूतें इन्द्रियों से लगी हुई है। ध्यान से मन को इन्द्रियों की घाटों से समेटा जाता है। द *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 26. 12. 1965 ई0 के अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* ******* प्रवचन को पूरा पढ़ने के लिए आपका आभार। शेयर जरुर करें

रविवार, 29 दिसंबर 2024

दिसंबर 29, 2024

आपका निजी ज्ञान क्या है -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार आप लोगों के लिए सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का अमृत में प्रवचन लेकर हाजिर हूं और इस प्रवचन को आप पूरा पढ़ें और जीवन में उतारने का प्रयास करें क्योंकि यह सदगुरु महाराज का प्रवचन जीवन को एक नई दिशा देने वाला है एक बार अवश्य पढ़ें और शेयर करना ना भूलें। 🙏🕉️ *जय गुरूदेव* 🕉️🙏 आपका निजी ज्ञान क्या है-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज *धर्मानुरागिनी प्यारी जनता!* आपलोगों को यह विदित हो गया है कि संतमत सत्संग का यह विशेषाधिवेशन है। यहाँ के श्रीछांगूर भगतजी ने इसे कराया। सत्संग से यह मतलब नहीं कि इसमें राजनैतिक बातें हों। सत्य क्या है? जो अकम्प है, जो अडिग है, जिसका नाश नहीं होता, जो है, जो था और जो सदा रहेगा, वह सत्य है। उसी सत्य के संबंध में यहाँ बात करेंगे। यहाँ प्रश्न आ जाता है कि सत्संग की आवश्य- कता क्या है? यदि हम सत्संग नहीं करें तो हमारी क्या हानि होगी? कर्म का फल अवश्य होगा। कोई धनवान है तो कोई धनहीन। सब तरहों में जीवन बिताते हुए कोई कहे कि मैं सुखी हूँ, यह कभी संभव नहीं। इस संसार में बड़े-बड़े बलवानों का बल थक गया। बड़े-बड़े धनवान भी धन छोड़कर चले गए। हम शरीर ही धारण नहीं करें, इसके लिए किस अवलम्ब को धारण करें? संतों ने विचार कर कहा कि इसके लिए तुम भक्ति करो। जो प्रत्यक्ष नहीं, जो इन्द्रियों की पकड़ में नहीं रहते, उन्हीं को अव्यक्त कहते हैं। आवागमन में घूमना कबतक होगा, इसका कोई ठिकाना नहीं। हाँ, इसका ठिकाना संतों ने ईश्वर-भक्ति करके जाना है। ईश्वर की भक्ति करने में यह जानना चाहिए कि ईश्वर का स्वरूप क्या है? वह अव्यक्त क्यों है? वह व्यक्त भी होगा? इसके उत्तर में कहा जाएगा कि वह इन्द्रियों को व्यक्त नहीं होगा, आप अपने को पहचानें तो वह व्यक्त होगा। तुम्हारा शरीर क्षेत्र है और तुम क्षेत्रज्ञ हो। बिना बीज का वृक्ष नहीं हो सकता। इसी तरह स्थूल शरीर वृक्षवत् है और सूक्ष्म शरीर बीजवत्। स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण; इन चार शरीरों के साथ आप रहते हैं। इन्द्रियों के कामों को आप जानते हैं, पर अपने निजी कामों को नहीं। आपका निजी काम क्या है, सो समझिए। दुःख की बात है कि आप अपने आपको नहीं पहचानते हैं। सब इन्द्रियाँ जड़ हैं, इनमें कोई अपनी निजी शक्ति नहीं। इन इन्द्रियों को आपके ज्ञान से ज्ञान होता है। आप अपने से अपने को पहचानेंगे। इन्द्रियाँ माया से निर्मित हैं। चेतन आत्मा के कारण देह सचेतन है। इस तरह यह सिद्ध होता है कि चेतन और जड़ में भेद है। एक ज्ञानमय है, एक ज्ञान-रहित। संत महात्मा कहते हैं कि आप अपने निजी ज्ञान से ही अपने को पहचान सकते हैं। अपने को पहचानेंगे तो ईश्वर को भी पहचानेंगे। ईश्वर वह है, जिन्हें आप अपने निजी ज्ञान से पहचानें। जैसे कोई स्वप्न में सपनाता हुआ अर्थहीनता का दुःख पाता है और जब जग जाता है, तभी अर्थहीनता का दुःख छुटता है। इसी तरह संतों का कहना है कि तीन अवस्थाओं अर्थात् जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को पार करोगे तो चौथी अवस्था मिलेगी। चौथी अवस्था में आपका निजी ज्ञान धीरे-धीरे चमकता जाएगा। यह शरीर माया से निर्मित है। जिसमें बदली हो, जिसका अत्यन्ताभाव हो, वह माया है। यह योगियों ने सिद्ध कर बतलाया है। ईश्वर-भक्त बनो, माया नहीं लगेगी। इस चर्मचक्षु से जिस रूप को देखोगे, वह माया का दर्शन होगा। जिसे आत्मदृष्टि से देखता है, वह परमात्मा है। जिस तरह आँख को देखने के लिए आइने का सहारा लेते हैं, उसी तरह ईश्वर को तथा अपने को देखने के लिए ध्यान-भजन रूप साधन की आवश्यकता है। जबतक कोई ईश्वर-स्वरूप का निर्णय नहीं जानता, तबतक वह औनाया हुआ रहता है। जैसे यात्री को निर्दिष्ट स्थान मालूम नहीं रहता तो उसका चलना व्यर्थ ही होता है। श्रीरामायणजी के पाठ में अभी जो पढ़ा गया, उससे ज्ञात होता है कि माया ईश्वर के अधीन में इस तरह है, जिस तरह कठपुतली। परमात्मा अज है, विज्ञान-स्वरूप है। जो बिना कारण का कार्य दिखाता है। ‘अज विज्ञान रूप बलधामा।’(गोस्वामी तुलसीदासजी)। आज के भौतिक विज्ञानवाले को यदि उपादान कारण नहीं रहे, तो वे कुछ भी नहीं बना सकते। परमात्मा उपादान कारण को बनाते हैं। ‘तद् आप ही आप, आप उपाया, नहिं किछुते किछु कर दिखलाया। (गुरु नानक साहब)।’ परमात्मा स्वरूपतः अनादि-अनन्त हैं। वे उपज-ज्ञान से भी अनादि हैं। सबसे पहले का एक अनादि-अनन्त तत्त्व अवश्य मानना पडे़गा। द *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 25. 12. 1965 ई0 के अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* पूरा प्रवचन को पढ़ने के लिए आपका दिल से सहृदय आभार और सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के प्रवचन को शेयर करें 🙏

सोमवार, 22 नवंबर 2021

नवंबर 22, 2021

अमृत को नेत्रों से पान करो-सदगुरू महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।
अमृत को नेत्रों से पान करो (साभार–सत्संग-सुधा सागर) आप सब यहाँ सत्संग के लिए एकत्रित हैं। सत्संग में बहुत तरह की बातें होती हैं। ऐसा नहीं कि जो आध्यात्मिकता के खिलाफ बातें हैं, वे भी होती हैं। मैं आपका ख्याल उधर ले जाना चाहता हूँ, जो आपने पहले सद्ग्रंथों के पाठ में सुना था। मेरा यह कायदा और सहारा भी है कि संतों की वाणी का मैं आदर करूँ और उसके सहारे चलें। संतों की वाणी को ही मैं सत्संग कहूँगा। जो मुझे जानते हैं, वे तो वैसे ही मुझे कहते होंगे कि संतों की वाणी का सहारा मुझे उतना ही है, जितना कि बिना वायु के श्वास कोई नहीं ले सकता। मण्डल ब्राह्मणोपनिषद् में संसार को समुद्र कहा गया है। उसमें निद्रा-भय जीव-जन्तु हैं, ऐसा बतलाया गया है। समुद्र में बड़े-बड़े जीव होते हैं और जीव को जीव निगल जाते हैं। उसी प्रकार नींद है। उसके पेट में जो जाते हैं, उसकी सुधिबुद्धि सब खो जाती है। भय भी उसी तरह है। भयातुर होकर अपनी शक्ति को लोग खो बैठते हैं। उसमें तृष्णा भँवर है, इसको पार करने के लिए सूक्ष्म मार्ग का अवलम्ब ग्रहण करें। जीव भँवर में चक्कर खाते हैं। ऐसे ही इच्छा की तरंग में पड़े हुए लोग सूक्ष्ममार्ग का अवलम्ब ग्रहण करें। सूक्ष्म का अर्थ है - महीन। सूक्ष्ममार्ग के लिए बतलाया गया कि उसके द्वारा किस तरह ब्रह्म का अवलोकन होता है। चन्द्र-बिम्ब अमृत को नेत्रों से पान करो। उसके दर्शन के लिए तीन प्रकार की दृष्टियाँ चाहिए। अमादृष्टि, प्रतिपदादृष्टि और पूर्णिमादृष्टि। पूरी आँखें बंदकर देखना अमादृष्टि है। आधी आँखें खोलकर और आधी आँखें बंदकर देखना प्रतिपदादृष्टि है, जिसे शाम्भवी मुद्रा कहते हैं और पूरी आँखें खोलकर देखना पूर्णिमादृष्टि है, जिसे वैष्णवी मुद्रा कहते हैं। इस तरह देखने से क्या होता है? तो कहते हैं कि इससे वायु की स्थिरता होती है, मन की स्थिरता होती है। क्या यह बात सत्य है? उपनिषद् की बातों को झूठलावें, मेरी समझ से बाहर है। दृष्टि वह चीज है, जहाँ पर यह ठीक से लगी रहती है, मन वहीं पर पड़ा रहता है। ऐसा नहीं होगा कि दृष्टि को एक जगह स्थिर किए हैं और मन दूसरी ओर भाग जाय। यदि ठीक-ठीक देखते हैं तो मन वहीं रहता है। दृष्टि डीम-पुतली को नहीं कहते, देखने की शक्ति को कहते हैं। दृष्टि स्थूल है या सूक्ष्म? दृष्टि को हाथ से आप नहीं पकड़ सकते। आप मेरी ओर देखते हैं और मैं आपकी ओर देखता हूँ, तो दोनों की दृष्टि दोनों पर पड़ती है, किन्तु उसे देख नहीं सकते। इस प्रकार दृष्टि सूक्ष्म है और मन भी सूक्ष्म है। सूक्ष्म को सूक्ष्म का सहारा मिलना अवश्य मानने योग्य है। इसलिए दृष्टि से मन का स्थिर होना पूर्ण सम्भव है। दूष्टि और मन दोनों सूक्ष्म है, इसलिए उपनिषद् का यह वाक्य सत्य है, ऐसा विचार में जँचता है। बाकी रही बात वायु-स्थिरता की। तो आप देखिए, किसी गम्भीर बात को सोचिए, तो मन इधर-उधर नहीं भागता। ऐसी अवस्था में श्वास-प्रश्वास की गति भी धीमी पड़ती है। आप स्वयं आजमाकर देख सकते हैं। मन की चञ्चलता में श्वास तेज होता है और मन की स्थिरता में श्वास की गति धीमी होती है। याद रहे कि मैं प्राण और प्राणवायु दोनों को एक ही नहीं मानता। योगिवर भूपेन्द्रनाथ सान्यालजी ने कहा था - ‘जैसे दूध में घी रहता है, उसी प्रकार वायु में प्राण रहता है। प्राणवायु वह है, जो वायु प्राण से सम्बन्धित हो। उपनिषद् में जो बताया गया कि दृष्टि-साधन से मन और वायु की स्थिरता होती है, बिल्कुल ठीक है और जो कहा गया कि भवसागर से पार हो जाओगे, वह भी ठीक है। यदि कहा जाय कि मन और वायु की स्थिरता में ईश्वर की प्राप्ति कैसे होगी? तो देखिए,मन के सिमटाव से ऊर्ध्वगति होती है, ऊर्ध्वगति से मायिक तल का छेदन होता है। माया के तल से ऊपर जाने पर निर्मायिक का दर्शन होता है। परमात्मा का दर्शन हमको इसलिए नहीं होता है कि हमने पहले जाना नहीं कि परमात्मा का दर्शन कैसे होता है। पहले जानो कि शब्द का ग्रहण कान से होता है। रूप का दर्शन आँख से होता है। परमात्मा तो बहुत दूर है, पहले आप अपने को जानिए। कोई ऐसा नहीं कहता कि मैं नहीं हूँ। मैं हूँ - ऐसा सबको विश्वास है। कहाँ हैं? तो कहेंगे - शरीर के अंदर हैं। शरीर के अंदर मनोवृत्ति के संग-संग हैं। जिस प्रकार दूध के संग-संग घी रहता है, उसी तरह मन के संग-संग जीवात्मा रहता है। एक आदमी है, जो चारचित लेटा पड़ा हुआ है। उसको उठकर कहीं जाना है, तो वह क्या करेगा? पहले हाथ-पैर समेटेगा, तब वह उठकर चलेगा। बिना हाथ-पैर समेटे चल नहीं सकता है। उसी प्रकार इन इन्द्रियों की सम्भाल जबतक नहीं होगी, तबतक परमात्म-दर्शन सम्भव नहीं। उसके लिए साधन बताया गया कि शाम्भवी मुद्रा का। अभ्यास करो। शाम्भवी मुद्रा तीन तरह की होती है। भगवान विष्णु को जहाँ देखिए, तो खुली आँखें, शिवजी को जहाँ ध्यानावस्थित देखिए, आधी आँखें खुली और आधी आँखें बन्द। भगवान बुद्ध को देखिए, तो आँखें बन्द। व्यासदेवजी भी आँख बन्द करके ध्यान करते थे, ऐसा चित्र मुझे मिला है। हमारे गुरु महाराज कहते थे कि आँखें खोलकर देखोगे, तो तुमको आँखों में कष्ट होगा। पाल ब्रंटन ने एक पुस्तक लिखी है, उसमें उन्होंने लिखा कि एकटक लगाओ। एक साधु थे, जिनकी आँखों से पानी टपकता था। आपको पोथी-प्रमाण की आवश्यकता नहीं। विचार से देखिए - जहाँ आपकी दृष्टि गड़ी रहेगी, मन वहीं रहेगा। मन सूक्ष्म है और दृष्टि भी सूक्ष्म है। इसलिए स्वजाति को स्वजाति से मदद मिलती है। मैंने श्रीभूपेन्दनाथ सांन्यालजी से पूछा कि प्राणायाम करके ध्यान करना चाहिए अथवा ध्यान करके प्राणायाम करना चाहिए। उन्होंने कहा - ‘प्राणायाम करके ध्यान करना चाहिए। मैंने कहा - 'श्रीगीताजी के छठे अध्याय में बैठने के लिए आसन और आसन के तरीके सब बतलाए हैं, किन्तु वहाँ प्राणायाम के लिए कोई जिक्र नहीं है। जहाँ-जहाँ मन भाग जाय, वहाँ वहाँ से लौटाने कहा है। ध्यान से प्राणस्पन्दन बन्द हो जाय, तो यही प्राणायाम हो गया। पहले दूध-मक्खन साथ-साथ रहते हैं। जहाँ दूध रहता है, मक्खन भी वहीं रहता है। फेफड़े में संकोचन-विकासन की क्रिया होती रहती है, किन्तु बाहर की वायु से नहीं, जीवनी शक्ति से। जीवनी शक्ति प्राण है। प्राण परमात्मा से उत्पन्न होता है और वायु आकाश से उपजती है। हाँ, हम जो बाहर से वायु खींचते हैं, वह प्राण से सम्बन्धित हो जाती है, इसलिए उसको प्राणवायु कहते हैं। यदि शाम्भवी मुद्रा से अभ्यास करें तो मन स्थिर हो जाता है। मन स्थिर हो जाता है तो प्राण भी स्थिर हो जाता है। दृष्टि का ऐसा प्रयोग है, जिससे मन स्थिर हो जाता है। स्थिरता में सिमटाव होता है। सिमटाव से मायिक आवरणों का छेदन होता है। मायिक आवरणों के छेदने पर उधर परमात्मा ही बाकी रहते हैं। उसे परमात्मा का साक्षात्कार होता है। अष्टांग योग में पहले यम, नियम और तब आसनसिद्धि के बाद प्राणायाम कहा, किन्तु प्राणायाम में ही समाप्त नहीं किया। प्राणायाम के बाद प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि भी कहा है। इसलिए पहले यम, नियम, आसनसिद्धि आदि और अन्त में समाधि होगी। प्राणायाम से आपदा भी हो सकती है, किन्तु ध्यान से आपदा नहीं होती। प्राणायाम से उन्माद भी होता है। ‘कल्याण' पत्र में ऐसा लेख भी निकला है। गुरु नानक, दादू दयाल, कबीर साहब, तुलसी साहब आदि संतों ने ध्यानयोग पर ही जोर दिया है। दृष्टिसाधन से आरम्भ करके अन्त तक का वर्णन किया। प्राणायाम के बाद ध्यान-योग में जाना ही पड़ेगा, किन्तु ध्यान-योग से प्राणायाम में नहीं जाना होगा। मन को ठीक-ठीक लगाओ, दृष्टि को ठीक-ठीक लगाओ, जैसा बताया गया है। अवश्य शांति मिलेगी। मेरे कहने का तात्पर्य ऐसा नहीं कि प्राणायाम नहीं करो। जिनसे निबहता है, करें; किन्तु खतरे से - आपदा से बचते रहें। बिना प्रत्याहार के धारणा नहीं होगी। बिना धारणा के ध्यान नहीं होगा। इसलिए पहले प्रत्याहार होगा। मन जहाँ जहाँ भागेगा, वहाँ-वहाँ से लौटा-लौटाकर फिर वही लगाया जाएगा, तो अल्प टिकाव अवश्य होगा। ‘रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निसान' यही धारणा होगी। फिर विशेष देर तक टिकते-टिकते ध्यान होगा और अन्त में समाधि होगी। केवल किसी एक पर जोर देना उचित नहीं। लोग पूजा-पाठ, मूर्ति-ध्यान करते हैं, इसमें भी एकाग्रता होती है। शरीर कपड़े की तरह बदलता है, किन्तु हम रहेंगे। हम पर जो संस्कार पड़ेगा, वह भी रहेगा। भगवान ने कहा कि जहाँ-जहाँ मन भागे, वहाँ-वहाँ से लौटा-लौटाकर लाओ। ऐसा संदेह नहीं करना चाहिए कि इधर साधना से गए और उधर सांसारिक भोग से भी। तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - कल्याणकारी कर्म करनेवालों की अधोगति नहीं होगी। ऐसा वर्णन है। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में दृष्टिसाधन करने के लिए कहा - समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।। अर्थात् काया, सिर और गले को समान एवं अचल करके और स्थिर होकर अपनी नासिका के आगे दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ देखे। नासाग्र ध्यान में भी भेद है। एक सेठ ने अपने गुप्त धन रखने का स्थान अपने बही-खाते में लिखकर रख दिया था कि अमुक महीने की अमुक तिथि के दिन, दोपहर के समय धन अमुक ताड़ गाछ की फुनगी पर रखा है। जब वह मर गया और उसके बेटे ने जब इसे पढ़ा, तो अति आश्चर्यित हुआ कि ताड़ वृक्ष तो अभी वर्तमान है, पर वहाँ तो धन है नहीं! और सोचा कि वहाँ धन रह भी सकता है कैसे? उसके पिता के समय का एक वृद्ध मुनीम था। जब लड़के ने इस विषय में उससे पूछा तब उस वृद्ध ने कहा - 'वह महीना, तिथि और वह समय आने दो, तो मैं बतला दूँगा।' जब वह समय आ गया, तब उस वृद्ध ने उस सेठ के पुत्र को उस स्थान पर ले जाकर ताड़ गाछ की फुनगी की छाया जहाँ पड़ती थी, वह स्थान बतला दिया और बोला कि इसी जगह में वह धन गड़ा है। सेठपुत्र ने कोड़कर अपना धन निकाल लिया। संत धरनीदासजी ने कहा - धरनी निर्मल नासिका, निरखो नैन के कोर। सहजै चन्दा ऊगिहैं, भवन होइ उजियोर।। निर्मल नासिका को समझो। शाण्डिल्योपनिषद् में भी नासाग्र का जिक्र आया है। विद्वान्समग्रीवशिरो नासाग्रदृग्भ्रूमध्ये। शशभृद्बिम्बं पश्येन्नेत्राभ्याममृतं पिवेत्।। विद्वान गला और सिर को सीधा करके नासिका के आगे दृष्टि रखते हुए, भुवों के बीच में चन्द्रमा के बिम्ब को देखते हुए नेत्रों से अमृत का पान करें। कुछ लोगों का कहना है कि आज्ञाचक्र से नीचे पाँच चक्र हैं। इनमें से पहले नहीं गुजरकर आकाश में ही कैसे उड़ने लगेंगे? तो मैं कहूँगा कि दोनों आँखों से दृष्टि की धार निकलती है। बिजली के गिरने से यदि कोई उसे देख लेता है, तो उसकी दृष्टिधार निकलते ही उसका शरीर भी छूट जाता है। दृष्टि शरीर का प्राण है। अजगर की दृष्टि किसी आदमी की दृष्टि पर पड़े तो अजगर की दृष्टि से उसकी दृष्टि मिलने से वह व्यक्ति उस ओर खिंचता चला जाता है। ‘शिवसंहिता' में भगवान शिव ने एक-एक चक्र के साधन का तथा उनके गुणों का वर्णन किया है। फिर आज्ञाचक्र के वर्णन में उन्होंने कहा है - पंच पद्मों का जो-जो फल (पंच चक्रों के ध्यान का जो-जो फल) होता है, सो समस्त फल आप ही इस आज्ञा कमल (आज्ञाचक्र) के ध्यान से प्राप्त हो जाएगा। आपके दोनों हाथों को पकड़कर कोई खींचे, तो तमाम शरीर उसी ओर खींचा जाएगा। उसी प्रकार दोनों दृष्टि की धारें जिधर खींची जाएँगी, संपूर्ण शरीर की धार उस ओर फिर जाएगी। इसी का वर्णन गुरु नानक, कबीर साहब आदि संतों ने किया है। जिसका मन एक क्षण के लिए भी उस ओर लग जाएगा, तो वह एकाग्रता का सुख और कुछ-न-कुछ झलक अवश्य देखेगा। यही साधन निरापद है। करते जाओ, सुगम साधन है। इसके साथ संयम करो। बिना संयम किए न हठयोग चलेगा, न दृष्टियोग और न शब्दयोग। इसलिए झूठ, चोरी, नशा, हिंसा, व्यभिचार मत करो। यदि कभी भूल से भी हो जाय, तो परमात्मा से प्रार्थना करो कि हमसे अब ऐसा न होने पावे। अपनी शक्ति भी लगाओ कि ये अपकर्म आपसे न होने पावें, केवल कहो नहीं। धन-सम्पत्ति के लिए जो बहुत दुष्कर्म करते हो, यह साथ जाने को नहीं है। साथ ही जब आपका शरीर छूट जाएगा और कहीं जन्म होगा, तब उस धन के लिए कहो कि मेरा धन है, तो आपको कौन दिला देगा? इसलिए धन-सम्पत्ति में आसक्ति मत बढ़ाओ। ध्यान करो। ध्यान करने के लिए पहले किसी नाम का जप करो, फिर जिस नाम का जप करते हो, जिसमें श्रद्धा हो, उसी से संबंधित रूप का मानस ध्यान करो। फिर – कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।। - गीता, अध्याय 8/9 विन्दुध्यान करो। ध्यानविन्दूपनिषद् में आया है – बीजाक्षरं परम विन्दुं नादं तस्योपरि स्थितम्। सशब्दं चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परं पदम्।। - ध्यानविन्दूपनिषद् विन्दु के बाद शब्द का - नाद का ध्यान करो। ‘न नाद सदृशो लयः।' पहले विन्दु का ध्यान करो, फिर नाद का। इस प्रकार लोग नित्य अभ्यास करते हुए आगे बढ़ सकते हैं। कोई पूछे कि ईश्वर क्या है, तो पूछो कि रूप क्या है? जो इन आँखों से देखा जाय। उसी तरह जो चेतन आत्मा से ग्रहण हो, वह ईश्वर या परमात्मा है। चेतन आत्मा को जड़ का संग छूटे, इसी के लिए दृष्टि-साधन और शब्द-साधन है। दृष्टि-साधन करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए मानस जप और मानस ध्यान है। इसके लिए ऐसा नहीं कि काम आज शुरू करो और आज ही खतम। भगवान बुद्ध ने 550 जन्मों में सिद्धि प्राप्त की थी। भगवान कृष्ण ने भी अनेक जन्मों की बात कही है। यह सुनकर शिथिलता लाने की बात नहीं। धीरे-धीरे करते जाओ, एक-न-एक दिन काम अवश्य समाप्त होगा। 🙏🙏🙏श्री सद्गुरु महाराज की जय 🙏🙏🙏 सभी सत्संगी बंधुओं से निवेदन है कि अधिक से अधिक शेयर करें जिससे और भी सत्संगी बंधुओं को लाभ मिल सके और पुण्य का भागी बनें 👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇 संतमत प्रवचन के लिए लिंक पर क्लिक करें 👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇

मंगलवार, 1 जून 2021

जून 01, 2021

काम करते हुए भी भजन करो-महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।। काम करते हुए भी भजन करो
(साभार – सत्संग-सुधा सागर) बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।। प्यारे लोगो! शरीर में जीवात्मा का निवास है, इसीलिए शरीर जीवित मालूम होता है। शरीर जड़ है अर्थात्‌ ज्ञानहीन पदार्थ है और जीवात्मा-चेतन अर्थात्‌ ज्ञानमय पदार्थ है। दोनों का संग ऐसा है कि साधारणतः: इसको कोई भिन्न नहीं कर सकता। शरीर में रहने का जीवन थोड़ा है और शरीर छोड़ने के बाद का जीवन अनंत है। क्योंकि जीवात्मा अविनाशी है। अनंत जीवन बहुत जीवन है, एक शरीर का जीवन बहुत कम है। अवश्य ही वर्तमान शरीर के बाद के जीवन में स्थूल शरीर अनेक हो सकते हैं - शरीर बहुत हो सकते हैं। उन जन्म-मरणशील जीवन को जोड़ो तो बहुत हैं। इस शरीर से छूटने पर केवल जीवात्मा नहीं रहता। वह तीन जड़ शरीरों के अंदर रहता है। बारम्बार जनमने-मरने में केवल स्थूल शरीर छूटता है और तीन शरीर रह जाते हैं। इन तीनों शरीरों में रहने का जीवन बहुत है। इन्हीं शरीरों में रहते हुए स्वर्गादि परलोक का भोग होता है। वहाँ के भोग के समाप्त होने पर फिर कर्मानुसार किसी के यहाँ जन्म लेता है। लेकिन यह चक्र कबतक चलता रहेगा, कोई ठिकाना नहीं। इतना ठिकाना है कि जबतक शरीर और संसार से छुटकारा नहीं हो जाय - मुक्ति नहीं प्राप्त कर ले, तबतक लगा रहेगा। सबसे उत्तम जीवन यही है कि किसी शरीर में नहीं रहना। किसी शरीर में रहना, पुण्य के अनुकूल स्वर्गादि में रहो फिर वहाँ से नीचे गिरो, यह जीवन कोई अच्छा जीवन नहीं है। हमलोग वर्तमान शरीर में हैं, इसमें कितने दिन रहेंगे, ठिकाना नहीं। उस अनंत जीवन के समक्ष यह जीवन अत्यन्त स्वल्प है। लोग दुःख में एक सेकेण्ड के लिए लिए रहना नहीं चाहते। सुख की ओर दौड़ता हुआ, दुःख से भागता हुआ यह जीव चलता है। किंतु जो सुख यह चाहता है, वह कहीं नहीं मिलता। साधु-सन्त लोग कहते हैं कि थोड़े-से जीवन के लिए तुम दौड़े-दौड़े फिरते हो और डरते हो कि आज यह काम नहीं किया जाएगा तो यह हानि होगी। डर के मारे ठीक-ठीक नौकरी, वाणिज्य-व्यापार, खेती आदि करते रहते हो। ऐसा नहीं करो तो कोई हर्ज नहीं। बहुत धनी आदमी भी धन को सम्हालने और बढ़ाने में रहता है। धन के सम्हालने और बढ़ाने में भी कष्ट होता है। गरीब आदमी देखता है कि आज खाने के लिए है कल के लिए यत्न नहीं करो तो क्या खाओगे? उससे विशेष जो कृषक हैं, सोचते हैं कि इस साल के लिए खाने को है, आगे वर्ष क्या खाएँगे, इस डर के मारे खेती करते हैं। तो एक शरीर के जीवन के लिए डरते हो और काम करते हो। और इसके लिए नहीं डरते कि इस शरीर के जीवन के बाद का जो जीवन है उससे क्या होगा? चाहिए कि ऐसा काम करो कि शरीर छोड़ने के बाद भी तुम सुखी रहो। इसके लिए क्या करना होगा? ईश्वर का नाम जपो।
इसी को कबीर साहब ने कहा है – निधड़क बैठा नाम बिनु, चेति न करै पुकार। यह तन जल का बुदबुदा, बिनसत नाहीं बार।। यदि समझ लो तो फिर आज कल के लिए बहाना नहीं करो कि आज नहीं कल करूँगा। क्योंकि गुरु नानकदेवजी ने कहा है – नहँ बालक नहँ यौवने, नहिं बिरधी कछु बंध। वह औसर नहिं जानिये, जब आय पड़े जम फंद।। अनंत जीवन में दुःखी न होओ, इसके लिए ईश्वर का नाम-भजन करो। आजकल करते हुए समय बर्बाद मत करो। बल्कि – काल करै सो आज कर, आज करै से अब्ब। पल में परलै होयगा, बहुरि करैगा कब्ब।। भर दिन, भर रात बैठकर भजन नहीं करने कहा जाता। समय बांध-बांधकर भजन करो। काम करते हुए भी भजन करो और काम छोड़-छोड़कर भी भजन करो। ब्राह्ममुहुर्त्त में मुँह-हाथ धोकर, निरालस होकर भजन करो। दिन में स्नान के बाद भजन किया करो। तन काम में मन राम में’ हमारे यहाँ प्रसिद्ध है, इसको काम में लाओ। फिर सायंकाल भी बैठकर भजन करो। रात में सोते समय भजन करते हुए सोओ, तो खराब स्वप्न नहीं होगा। नाम-भजन को लोग जानते हैं कि गुरु ने जो मंत्र दिया है, वही नाम-भजन है। वह नाम-भजन है किंतु और भी नाम-भजन है। जो शब्द लोग बोल सकते हैं, सुन सकते हैं, वह वर्णात्मक नाम-भजन है। ध्वन्यात्मक नाम-भजन भी होता है। वह ध्वनि तुम्हारे अंदर है। उस ब्रह्म ध्वनि में जो अपने मन को लगाता है, तो वह शब्द से खींचकर ब्रह्म तक पहुँचा देता है। नाम का जप और नाम का ध्यान भी होता है। वर्णात्मक नाम का जप होता है। जिसकी युक्ति गुरु बताते हैं और ध्वन्यात्मक नाम का ध्यान होता है। इसकी भी युक्ति गुरु बताते हैं। इस साधन के लिए भला चरित्र से रहना होगा। जिसका चरित्र भला नहीं है, जो सदाचार का अवलम्ब नहीं लेता है, वह विषयों में - भोगों में बँधा रहता है। जब वह भजन करने लगता है तो उसका मन गिर-गिर जाता है। इसलिए अपने को पवित्र आचरण में रखो। जाकी जिभ्या बंध नहीं, हिरदे नाहीं साँच। ताके संग न चालिये, घाले बटिया काँच।। जिभ्या पर खाने और बोलने का बंधन रखो। झूठ और कड़वा बोलना खराब है। झूठ बोलना सब पापों की जड़ है। कड़वा बोलना आपस में फूट पैदा करता है। इसलिए सत्य बोलो और नम्र होकर रहो। साधू सोई सराहिये, साँची कहे बनाय। कै टूटै कै फिर जुरै, कहे बिन भरम न जाय।। जो साँच बोलते हैं और कड़वा बोलते हैं तो उसको भी लोग सहन नहीं कर सकते। जो भोजन तुम्हारी बुद्धि को नीचा करे, शरीर में रोग पैदा करे, वह मत खाओ। इसके लिए संतों ने कहा - मांस मछरिया खात है, सुरा पान से हेत। सो नर जड़ से जाहिंगे, ज्यों मूरी की खेत।। यह कूकर को खान है, मानुष देह क्‍यों खाय। मुख में आमिख मेलता, नरक पड़े सो जाय।। मांस, मछली तथा नशा आदि खाने-पीने से पाशविक वृत्ति रहती है। इसमें राजस-तामस वृत्ति रहती है। सात्तिक वृत्ति से भजन होता है। इस प्रकार के भोजन से सात्त्विक बुद्धि दमन हो जाती है और राजस-तामस की प्रधानता हो जाती है। जिससे भजन में चंचलता और आलस आता रहता है। जो भोजन शीघ्र नहीं पचे, वह भोजन भी मत करो। क्योंकि यह भी भजन नहीं होने देता। जितने नशे हैं, यहाँ तक कि तम्बाकू तक लेने योग्य नहीं। इसलिए कबीर साहब ने कहा – भाँग तम्बाकू छूतरा, अफयूँ और शराब। कह कबीर इनको तजै, तब पावे दीदार।। तम्बाकू को लोग साधारण समझते हैं, किंतु यह भी बहुत बुरी नशा है। नशाओं से, कुभोजन से, कड॒वी बात से और असत्य भाषण से बचो। इन्द्रियों में संयम रखो और भजन करो तो भजन बनेगा। केवल भाँग, तम्बाकू ही नशा नहीं है, बल्कि - मद तो बहुतक भाँति का, ताहि न जाने कोय। तन मद मन मद जाति मद, माया मद सब लोय।। विद्या मद और गुनहु मद, राजमद्द उनमद्द। इतने मद को रद्द करें, तब पावे अनहद्द।। इन सब नशाओं को भी छोड़ना चाहिए। यही संतों का उपदेश है। जो संतों के उपदेश के अनुकूल रहते हैं, वे पवित्र हैं। जो संतों के उपदेश के अनुकूल नहीं चलते, वे किसी कारण पवित्र क्यों न कहे जाएँ, किंतु अपवित्र हैं। यथार्थ में हृदय पवित्र होना चाहिए। शरीर पवित्रता के लिए क्या बात है? शिवजी के रूप को देखिए, अमंगल वेष रहने से अपवित्र नहीं है। हृदय की पवित्रता चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि स्नान नहीं करे, पवित्रता से नहीं रहे, शारीरिक पवित्रता भी चाहिए। झूठ सब पापों का झोरा है। सत्य बोलनेवाले का झूठ का झोरा जल जाता है। जो सत्य बोलता है, उससे कोई पाप नहीं हो सकता है। साँच बोलने की जिसकी प्रतिज्ञा रहेगी, वह चोरी नहीं करेगा, कोई पाप नहीं करेगा। चोरी करने से झूठ बोलकर छिपाता है। सत्य बोलो तो चोरी भी छूट जाएगी। हिंसा मत करो। हिंसा करोगे तो क्या होगा? संत कबीर साहब ने कहा - कहता हूँ कहि जात हूँ, कहा जो मान हमार। जाका गर तू काटिहौं, सो फिर काट तोहार।। कर्मफल किसी को नहीं छोड़ता। श्रीराम-सीता वन गए। वे गंगा नदी के किनारे ठहरे। पत्तों के बिछौना पर श्रीसीता-राम लेटे थे और लक्ष्मण पहरा दे रहे थे। वहाँ गुहनिषाद भी बैठा और कहा कि कैकेयी ने इनको बहुत दुःख दिया। तब लक्ष्मणजी ने कहा कि - काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सुनु भ्राता।।
युधिष्ठिर को थोड़ा-सा झूठ बोलने का फल भी मिला ही। यद्यपि वह भगवान के समक्ष और उनकी प्रेरणा से बोला था। भगवान श्रीकृष्ण को भी व्याधा ने तीर से मारा। यह भी कर्मफल ही था। इसलिए हिंसा से बचो। व्यभिचार मत करो। पर पुरुषगामिनी स्त्री व्यभिचारिणी है और परस्त्रीगामी पुरुष व्यभिचारी है। इन पंच पापों से बचो। एक ईश्वर पर विश्वास करो, उनका पूरा भरोसा करो। उनकी प्राप्ति पहले अपने अंदर होगी। उनकी प्राप्ति पहले अपने अंदर होगी, फिर सर्वत्र। ध्यान करो, सत्संग करो और गुरु की सेवा करो। पहले कहे पंच निषेध कर्मों को नहीं करो और पीछे कहे पंच विधि कर्मों को करो। यही ‘विधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रविनन्दिनी बरनी।।' है। इस तरह अपने जीवन को बिताने पर मुक्ति मिलेगी। मुक्ति होने से स्वयं मालूम होगा कि मुक्ति मेरी हो गई। जैसे भोजन करने से स्वयं मालूम होता है कि पेट भर गया। जो जीवन-मुक्ति प्राप्त कर लेता है, मरने पर उसे विदेह-मुक्ति हो जाती है। यदि मुक्ति नहीं हुई तो भगवान श्रीकृष्ण के कहे अनुकूल बहुत वर्षों तक स्वर्गादि का भोग करके इस संसार में किसी पवित्र श्रीमान्‌ के घर में जन्म लेगा। अथवा योगियों के कुल में ही जन्म लेगा। इस प्रकार का जन्म इस लोक में बहुत दुर्लभ है। फिर वह पूर्व जन्म के संस्कार से प्रेरित होकर साधन-भजन करेगा और अनेक जन्मों के बाद मुक्ति को प्राप्त कर लेगा। यह कभी नहीं भूलना चाहिए, सदा याद रखना चाहिए कि सदाचार के धरातल पर भजन-रूप मकान बनता है। यह प्रवचन रविदास सत्संगियों के संतमत सत्संग मंदिर, सिकन्दरपुर, भागलपुर में दिनांक 18.3.1955 ई० के सत्संग में हुआ था। श्री सद्गुरु महाराज की जय जयगुरु अगर आप पूरा पढ लिये है तो परमार्थ हेतु गुरु महाराज के अमृत वचन को अधिक से अधिक शेयर करें जिससे और भी सत्संगी बंधुओं को लाभ मिल सके Visual video, pravachan ke lia link pr click kare 👇👇👇👇👇👇👇👇

बुधवार, 26 मई 2021

मई 26, 2021

केवल विद्वता से संतवाणी नहीं समझ सकते-महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।🙏
केवल विद्वता से संतवाणी नहीं समझ सकते
(साभार – सत्संग-सुधा सागर)

बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। 
महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।

प्यारे लोगो! 
मनुष्य अपने परम कल्याण के वास्ते भजन करें।
 भजन ऐसा करें कि ईश्वर को प्राप्त कर लें।
 ईश्वर को प्राप्त करने के लिए ऐसा विश्वास मत करो कि अभी कुछ जप ध्यान कर लो, मरने पर प्रभु मिलेंगे। 
भजन इस जन्म में पूरा नहीं होगा, तो दूसरे जीवन में या अनेक जन्मों के बाद किसी जीवन-काल में ही परमात्मा मिलते हैं।
 नाम-भजन सबसे श्रेष्ठ है। 
नाम-भजन दो तरह से होता है - जप और ध्यान। 
वर्णात्मक नाम का जप और ध्वन्यात्मक नाम का ध्यान करो।
इसी ध्वन्यात्मक नाम के ध्यान को नाम-भजन और सुरत-शब्द-योग भी कहते हैं। इसको अंतर्मुख होकर करना पड़ेगा। यह शब्द मनुष्य का बनाया हुआ नहीं है। इसको कोई मनुष्य मुँह से उच्चरित करके किसी से कह भी नहीं सकता है। 
इसकी युक्ति जानो और ध्यान करो।
 ध्यान करने से आप-ही-आप यह नाद सुन पड़ेगा। संतों की वाणी में जो पाँच शब्द आते हैं, वे ये हैं कि परमात्मा से सृष्टि के लिए जो मौज होती है, उससे जो धारा प्रवाहित होती है, उससे पाँच मण्डल बनते हैं। 
उन्हीं पाँच मण्डलों के केन्द्रीय शब्दों को पाँच शब्द कहते हैं। 
कबीर साहब ने कहा है - 
 *पाँचो नौबत बाजती, होत छतीसो राग।
 सो मंदिर खाली पड़ा, बैठन लागे काग।।

 और गुरु नानकदेवजी ने कहा है - 
 पंच सबदु धुनिकार धुन तहँ बाजे सबदु निसानु।



जो अपने अंदर गहरा ध्यान करता है, उसको यह नाद मिलता है और उस नाद को गहण कर परमात्मा को पाता है। इससे सरल और सुलभ कोई मार्ग नहीं है।
 बाबा साहब ने यह नहीं कहा कि मैं एक पुस्तक बना देता हूँ, इसी को पढ़ो।
 बल्कि उन्होंने कहा कि दुनिया की सारी किताबों को पढ़ो, जो संतों की बनाई हुई हैं। 
किसी एक कोटरी में अपने को बन्द करके मत रखो। सभी कोठरियाँ तुम्हारी हैं।
 'गुरुग्रंथ साहब’ में कितने संतों के वचन हैं। यह उदारता है।
 सभी संतों के ग्रंथों को पढ़ो।
 नानकपंथ के दसवें गुरु-गुरु गोविन्द सिंहजी ने कहा है - 
 बाजे परम तार तत हरि को, उपजै राग रसारं।
यह नादानुसंधान है। 
नादानुसंधान सभी संतों के ग्रंथों में मिलता है। 
आजकल बड़े-बड़े विद्वान लोग संतों की वाणियों की खोज करते हैं और उससे वे बड़े-बड़े पुरस्कारों को प्राप्त करते हैं; किंतु केवल विद्वता से कोई संतवाणी को नहीं समझ सकते हैं
 और ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि विद्या की आवश्यकता नहीं। बिना विद्या के शब्द का अर्थ नहीं जान सकते। जो बहुत पढ़े हैं, रायचन्द, प्रेमचन्द पास करते हैं।
 उनके पास शब्दों का भण्डार हो जाता है। 
अगर वे साधन की क्रिया को जानते हैं, तो ठीक-ठीक अर्थ कर सकते हैं, समझ सकते हैं और समझा सकते हैं।
यदि साधना की क्रिया नहीं जानते हैं, केवल पढ़-लिखकर विद्वान हुए हैं, तो संतवाणी का ठीक-ठीक अर्थ नहीं कर सकते हैं। 
 
सत्त पुरुष इक बसैं पछिम दिसि तासों करो निहोर।
संत कबीर साहब की इस पंक्ति का एक विद्वान ने अर्थ किया था कि कबीर साहब मुसलमान खानदान में पाले पोसे गए थे, इसलिए पश्चिम कहकर उन्होंने मक्का का संकेत किया है। 
विद्वानों को संतों की साधना जाननी चाहिए। साथ ही उसका अभ्यास करना चाहिए। 
अभ्यास के साथ-साथ सदाचारी भी बनना होगा। तभी संतवाणी को ठीक-ठीक जान सकेंगे।
 आजकल विद्वानों में एक भ्रामक विचार फ़ैल गया है कि संतों की साधना में कुछ करना नहीं पड़ता है। आँख भी बन्द नहीं करनी पड़ती।

 वे कबीर साहब की 
ये पक्तियाँ कहते हैं - 
 आँख न मूँदौं कान न रूँधौं, तनिक कष्ट नहिं धारौं।
 खुले नयन पहिचानौं हँसि-हँसि, सुन्दर रूप निहारौं।।

पूरा इस प्रकार है - 
 साधो सहज समाधि भली।
 गुरु प्रताप जा दिन से जागी, दिन दिन अधिक चली।। जहँ जहँ डोलौं सो परिकरमा, जो कुछ करौं सो सेवा। जब सोवौं तब करौं दण्डवत, पूजौं और न देवा।। 
कहौं सो नाम सुनौं सो सुमिरन, खावँ पियौं सो पूजा। गिरह उजाड़ एक सम लेखौं, भाव मिटावौं दूजा।। 
आँख न मूँदौं कान न रूँधौं, तनिक कष्ट नहिं धारौं।
 खुले नयन पहिचानौं हँसि हँसि, सुन्दर रूप निहारौं।। शब्द निरंतर से मन लागा, मलिन वासना भागी। 
ऊठत बैठत कबहुँ न छूटै, ऐसी ताड़ी लागी।।
कहै कबीर यह उनमुनि रहनी, सो परगट कर गाई। 
दुख सुख से कोइ परे परम पद, तेहि पद रहा समाई।।

संत कबीर साहब ने कहा –
 ‘खाँव पिऊँ सो पूजा।‘
 श्रीरामकृष्ण परमहंस भी पीछे चलकर ऐसे ही हो गए थे कि कोई जो कुछ भी काली माई को चढ़ाते थे, वे अपने मुँह में ले लेते थे और खा जाते थे – ‘कालिकाय्ये नम:’ कहकर खा जाते थे। 
केवल कहने से नहीं होगा। इसकी योग्यता होनी चाहिए।
श्रीरामकृष्ण परमहंसजी को इसकी योग्यता हो गयी थी।

गिरह उजाड़ एक सम लेखौं, भाव मिटावौं दूजा।।

इस कसौटी पर कसकर देख लीजिए कि उनमें द्वैत भाव है कि नहीं।
 आँख न मूँदौं कान न रूँधौं, तनिक कष्ट नहिं धारौं। 
खुले नयन पहिचानौं हँसि-हँसि, सुन्दर रूप निहारौं।।
ऐसी स्थिति उनमें आ गई कि नहीं?
शब्द निरंतर से मन लागा, मलिन वासना भागी।
 ऊठत बैठत कबहुँ न छूटै, ऐसी ताड़ी लागी।।

आत्मस्वरूप के दर्शन में ही 'आँखि न मूँदौं कान न रूधौं’ होता है। साधनारम्भ में नहीं होता है। 

साधना के लिए तो कबीर साहब ने कहा है –
बंद कर दृष्टि को फेरि अंदर करै, घट का पाट गुरुदेव खोलै। 
गुरुदेव बिन जीव की कल्पना ना मिटै, गुरुदेव बिन जीव का भला नाहीं। 
गुरुदेव बिन जीव का तिमिर नासे नहीं, समुझि विचारि ले मने माहिं।। 
राह बारीक गुरुदेव तें पाइए, जनम अनेक की अटक खोलै।
 कहे कबीर गुरुदेव पूरन मिलै, जीव और सीव तब एक तोलै।।
यह समाधि में होता है।

 बाबा नानक ने कहा -
 तीनों बंद लगाय कर, सुन अनहद टंकोर।
 नानक शून्य समाधि में, नहिं साँझ नहिं भोर।।

ये तीन बंद क्या है?
 कबीर साहब ने कहा –
 आँख कान मुख बंद कराओ, अनहद झींगा शब्द सुनाओ।
 दोनों तिल एक तार मिलाओ, तब देखो गुलजारा है।।

संतों के पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान बिना साधु-संतों का संग किए नहीं होता।
 पूर्व का अर्थ होता है - जो पहले हो। इसलिए 
जो पहले हो, वह पूर्व है। इसका उलटा जो हो वह है पश्चिम।
परम सहायक को दाहिना कहते हैं।
 गोस्वामीजी ने लिखा है – ‘जे बिनु काज दाहिने बायें।‘ जो उपकारक के विरुद्ध हो जाय, वह दाहिना नहीं है। 
दाहिना अर्थात्‌ दक्षिण, जो बड़ा मददगार होता है। उत्तर यानी दक्षिण दिशा का उलटा। उत्तर सबसे परे होता है।
 नक्शे का उत्तर ऊपर होता है। इसलिए 'प्राणसंगली' के पहले भाग में नक्शा है, उसमें बताया है कि *पूर्व अंधकार को कहते हैं। प्रकाश को पश्चिम, शब्द को दक्षिण और निःशब्द को उत्तर कहते हैं।
संतों के पारिभाषिक शब्दों के ये अर्थ हैं। और विद्वानों को सूझ गया पश्चिम का अर्थ मक्का। 
विद्वता भी चाहिए और अच्छे साधु-संत का संग भी। ज्ञान-वृद्धि के लिए एकाग्रता की जरूरत है। एकाग्रता में ज्ञान-वृद्धि होती है।
 ध्यान में एकाग्रता होती है।
 एकाग्रता में सिमटाव होता है। सिमटाव होने पर ऊर्ध्वगति होती है। इससे परमात्मा तक पहुँच सकते हो। एकाग्रता जैसे हो, वैसे करो।
 मण्डल ब्राह्मणोपनिषद्‌ में तीन प्रकार से सिमटाव करना बतलाया है - अमावस्या, प्रतिपदा और पूर्णिमा से। आँख बन्दकर देखना अमादृष्टि है, आधी आँख खोलकर देखना प्रतिपदा है और पूरी आँख खोलकर देखना पूर्णिमा है। 
उसका लक्ष्य नासाग्र होना चाहिए। जिससे जो निभता है, करता है। करने दो।
 ध्यान में स्थूल, सूक्ष्म - दोनों भेदों को जानिए। 
सदाचारी बनकर रहिए और ध्यान कीजिए।

 यह प्रवचन भागलपुर जिला के श्रीसंतमत सत्संग मंदिर एकचारी में दिनांक 3.3.1955 ई० को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था। 
अंत में कमेन्ट्स में
श्री सद्गुरु महाराज की जय
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बुधवार, 19 मई 2021

मई 19, 2021

नारद जी को बैकुंठ में मोह-संत सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज

श्री सतगुरु देवाय नमः

 आदरणीय सत्संगी बंधु एवं प्रभु प्रेमियों 

आप लोगों के लिए सदगुरु महाराज का 

अमृत वचन नारद जी को वैकुंठ में मोह हो गया था

 उसी पर बहुत ही अद्भुत दृष्टांत के साथ 

सदगुरु महाराज ने समझाएं हैं 

उसे पूरा विस्तार से पढ़ें 

और जीवन में उतारने का प्रयास करें


।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।
----:नारदजी को बैकुण्ठ में मोह:-------
(साभार – सत्संग-सुधा सागर)


बन्दौं गुरुपद कंज, कृपा सिन्धु नररूप हरि।
महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।

प्यारे लोगो!
महात्मा बुद्ध से लेकर अब तक इस कलि काल में बहुत से साधु-संत हुए हैं।
उन लोगों ने जो कुछ शिक्षा दी है, लोगों ने उसे ग्रंथों में रख दिया है।
हाल के संतों ने अपने से लिख भी दिया है। संत दरिया साहब, भगवान बुद्ध, महावीर तीर्थंकर आदि ने अपने से लिखा नहीं, केवल कह दिया।
बुद्ध, महावीर के बाद तुलसी साहब भी कुछ पढ़े-लखे थे, किंतु उन्होंने लिखा नहीं।
लोगों ने वचनों को सुनकर ग्रंथाकार किया।
इसी तरह प्राचीन काल में ऋषि-मुनि हुए। उन्होंने भी लिखा नहीं, कहा। लोगों ने उसका संग्रह किया, वही उपनिषद्‌ है।
उपनिषद्‌ वेद का ज्ञान मानी जाती है।
उसमें कर्म और कर्मफल का वर्णन किया गया है, कर्म की विधियों का वर्णन किया गया है, जिससे इस लोक और परलोक में सुख की प्राप्ति लिखी है।
उपासना काण्ड में भी दोनों लोकों के सुखों से हटने के लिए कहा और कहा कि ये दोनों बन्धन हैं।
दोनों में से किसी में रहो तो आवागमन में पड़े रहोगे। *दोनों के सुख क्षणभंगुर हैं, तृप्तिदायक नहीं हैं।
जिसमें पूर्ण सुख-शान्ति मिलेगी, वह विषय सुख नहीं है अर्थात्‌ इन्द्रियों से पाने योग्य नहीं है।
अर्थात्‌ इन्द्रियों और विषयों के संयोग से जो सुख होता है, वह तृप्तिदायक नहीं।
संतों ने कहा कि इहलोक और परलोक दोनों का सुख अनित्य है।
इससे परे का सुख नित्यानंद है।
यह आत्मा से ग्रहण होने योग्य है। नित्यानंद वह है, जो सदा रह जाय। अनित्यानंद वह है, जो कुछ काल रहे, फिर नहीं रहे।
इहलोक और परलोक - दोनों से चित्त हटा रहे,
यही उपनिषद्‌ और संतवाणियों में है –
एहि तन कर फल विषय न भाई।
स्वर्गउ स्वल्प अन्त दुखदाई।।
यह चौपाई भी यही बात कहती है।
'उस नित्यानंद के लिए कहाँ ठहराव होगा?’
यदि यह पूछा जाय तो उत्तर होगा - किसी देश में नहीं, देश-काल के परे। किसी आधार पर आधेय बनकर रहना किसी लोक-लोकांतर में रहना है।
आधेय बनकर रहना नित्यानन्द नहीं है।
वह अपना आधार आप है।
शरीरों से अलग हटा हुआ है, केवल आत्मस्वरूप में रहता है। उसके रहने के लिए स्थान की आवश्यकता नहीं है। वहाँ स्थान नहीं है तो काल भी नहीं।
वह देश-काल से अतीत पद है।
उसमें आरूढ़ होने के लिए - पहुँचने के लिए संतों ने उपदेश दिया है। संतवाणी का निचोड़ यह है। इसके लिए मनुष्य पहले अपने को जाने।
लोग ऐसा ख्याल करते हैं कि जैसे धरती पर रहना है, वैसे ही अन्य लोकों में जाकर सुख से रहना होगा। परन्तु इससे विशेष बात वह है, जिसको मैने आपलोगों से कहा।
चाहिए कि इसके लिए इच्छा उत्पन्न करे और इसको सोचे।
मनुष्य अपने को नहीं जानता है, अपने शरीर को अपने तईं कहता है, तो गलत कहता है। शरीर मर जाता है, यह प्रत्यक्ष देखता है। फिर ख्याल होता है कि शरीर में रहनेवाला कहीं चला गया है।
इसलिए वैदिक धर्म में हमलोगों के यहाँ जो पुराण में प्रचार है, उससे श्राद्ध-क्रिया करते हैं। शरीर मर गया, शरीर में रहनेवाला कहीं चला गया, उसकी शान्ति के लिए, सुख के लिए श्राद्ध-क्रिया करते हैं। *श्राद्ध क्रिया यह ज्ञान देती है कि शरीर में रहनेवाला कोई था, वह चला गया।
उसके लिए श्राद्ध-क्रिया होती है। इस श्राद्ध-क्रिया से शरीर और शरीरी का ज्ञान होता है। यह पूरा ज्ञान तो नहीं है; किंतु आरम्भ का ज्ञान अवश्य है। जिस शरीर को लोग जला आते हैं, उसमें भी शरीर है।
फिर उसमें भी शरीर है। एवम्‌ प्रकार से चार जड़-शरीर हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण। मुंशी माखनलाल चले गए या और कोई कितने गए; किंतु क्या केवल आत्मा गयी? नहीं। स्थूल शरीर छोड़कर गयी और सूक्ष्म शरीर को साथ लेकर चली गयी।
ऊपर का स्थूल शरीर छूट गया तो ऊपर में सूक्ष्म शरीर रहा। यह शरीर का पूरा ज्ञान है।
इन सब शरीरों के बाद एक शरीर और है, जिसको ‘चिदानन्दमय देह तुम्हारी' कहते हैं। यह चेतन शरीर है। चेतन से भी परे स्वरूप आत्मा का है।
जैसे स्थूल शरीर में होने पर स्थूल जगत में रहना होता है, इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर के लिए सूक्ष्म जगत होना चाहिए। इसी सूक्ष्म जगत में स्वर्ग-वैकुण्ठादि हैं।
कितने लोग स्वर्गादि को नहीं मानते हैं। उस सूक्ष्म लोक और स्वर्गादि में यहाँ के सुख से विशेष सुख और विशेष दिनों तक रहना होता है।
किंतु न यहाँ दुःख छोड़ता है और न वहाँ दुःख छोड़ता है। माया-मोह न यहाँ छोड़ता है और न वहाँ।
नारदजी वैकुण्ठ गए।
वहाँ उनका मोह और बढ़ गया। गोलोक से श्रीदामाजी कंस के पास राक्षस बनकर आए। वहाँ विषय-सुख है और माया का पसार है।
माया में जो होना चाहिए, सो होता है। इसलिए
'स्वर्गठ स्वल्प अंत दुखदाई' - भगवान श्रीराम ने कहा। संतों ने ज्ञान, योग और भक्ति; तीनों को मिलाकर चलने को कहा। घी, मीठा और अन्न तीनों मिलाकर सुन्दर मिठाई होती है।
इसी तरह ज्ञान, योग ओर भक्ति;
तीनों को मिलाकर संतों ने उपदेश दिया है।


यह प्रवचन भागलपुर जिला के श्रीसंतमत सत्संग मंदिर एकचारी में दिनांक 2.3.1955 ई० को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था।
श्री सद्गुरु महाराज की जय

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गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

अप्रैल 08, 2021

सुमिरन से क्या होता है-सतगुरू मेंहीं

।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।
सुमिरण से क्या होता है?

https://youtu.be/01AwFbKDjVE

(साभार – सत्संग-सुधा सागर)

बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। 
महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।

प्यारे लोगो!
सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुख जाय।
 कह कबीर सुमिरन किये, साई माहिं समाय।।
 राजा राणा राव रंक, बड़ा जो सुमिरे नाम। 
कह कबीर सोइ पीव को, जो सुमिरे नि:काम।।
 नर नारी सब नरक है, जब लगि देह सकाम। 
कह कबीर सोइ पीव को, जो सुमिरे नि:काम।। 
सुमिरन से मन लाइये, जैसे दीप पतंग। 
प्राण तजे छिन एक में, जरत न मोड़े अंग।।
 सुमिरन से मन लाइए, जैसे नाद कुरंग। 
कह कबीर बिसरे नहीं, प्राण तजे तेहि संग।। 
सुमिरन से मन लाइये, जैसे पानी मीन। 
प्राण तजे पल बिछुड़े, सत कबीर कहि दीन।।

सुमिरण का अर्थ स्मरण करना है।
 तरह-तरह से सुमिरण या याद किया जा सकता है। सुमिरण करने से क्या गुण - क्या फल होता है, सो भी कहा। परमात्मा गुरु निकट है-सतगुरु मेंहीं
सुमिरण से सुख होता है, दुःख भाग जाता है। 
अंत में परमात्मा मिल जाते हैं।
राजा-रंक कोई हो, बड़ा वही है जो सुमिरण करता है। धन में बड़ा हो, प्रतिष्ठा में बड़ा हो, जाति में बड़ा हो; किंतु सुमिरण नहीं करता है, तो पारमार्थिक दृष्टि से वह बड़ा नहीं है। फल-सहित होकर जो भजन करता है, वह ठीक नहीं।क्या आप ईश्वर का दर्शन करना चाहते हैं
 जो निष्काम होकर भजन करता है, वह परमात्मा को पाता है। जैसे घर से सभी चीजों को निकाल देने से खाली जगह बच जाती है, उसी तरह हृदय से सभी फलाशा छोड़ देने पर हृदय में केवल ईश्वर रह जाएँगे। 
सांसारिक सभी इच्छाओं को छोड़ दो और भजन करो, तो परमात्मा मिल जाएँगे।
एक राजा की बहुत-सी रानियाँ थीं।
 विदेश जाते समय राजा ने सभी रानियों से पूछा – ‘तुम्हारे लिए क्या लाऊँ।' 
सभी ने अपनी-अपनी इच्छानुकूल चीजें लाने को कहा। किंतु एक रानी ने कहा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, केवल आप कुशलपूर्वक मेरे पास आ जाइए। राजा विदेश से लौटकर आया तो सब रानियों को उनकी माँग के अनुकूल चीजें दीं और अपनी उस रानी के पास चला गया, जिसने कुछ माँग नहीं की थी। 
अब सोचिए, जिसका राजा ही अपना हो गया, उसको क्या कमी रही? 
सभी खजाना उसी का हो गया। इसी प्रकार 
परमात्मा जिसके हो जाएँगे, 
उसको किसी चीज की कमी नहीं रहेगी।
सुमिरण तीन तरह से होता है - एक तो जोर-जोर से पुकारकर, दूसरा धीरे-धीरे बोलकर, जिसमें केवल होठ हिलते हैं और तीसरा है, जिसमें मन-ही-मन जपते हैं। मन-ही-मन जप करने से मन की स्थिरता आती है।
नाम जपत स्थिर भया, ज्ञान कथत भया लीन। 
सुरति शब्द एकै भया, जल ही ह्वैगा मीन।।
लोग मुँह से मिष्ट वचन, अश्लील वचन और कटु वचन बोलते हैं, किन्तु ईश्वर का नाम जपने के लिए एकाग्र मन होना चाहिए।

बाहर क्या दिखलाइये, अंतर जपिये नाम।
 कहा महौला खलक से, पड़ा धनि से काम।।
 नाम जपत दरिद्री  भला, टूटी घर की छान।
 कंचन मंदिर जारि दे, जहँ गुरु भक्ति न जाना।। 
नाम जपत कुष्टी भला, चुई चुई पड़ै जो चाम। 
कंचन देह केहि काम का, जा मुख नाहीं नाम।।

ईश्वर के गुण का वर्णन करते-करते जपनेवाला उस रंग में रँग जाता है। 
जो समझ-समझकर जपता है, वह ईश्वर के रंग में रँग जाता है। 
जैसे कंगाल पैसे को नहीं भूलता, वैसे ही पल-पल नाम को जपो, एक घड़ी भी मत छोड़ो
 जैसे पनिहारी माथे पर गगरी लेकर चलती है और रास्ते में बातचीत भी करती जाती है। 
यह मानस ध्यान है।
सुमिरन से मन लाइए, ज्यों सुरभी सुत माहिं। 
कह कबीर चारा चरत, बिसरत कबहूँ नाहिं।।
यह भी मानस ध्यान है। 
किंतु दोनों में अंतर है। गाय का बच्चा गाय के अंग-संग नहीं है; किंतु पनिहारी की गगरी उसके अंग-संग मौजूद है, तब उस पर ख्याल रखती है। गौ और गौ के बच्चे की जो मिसाल दी गई है, उससे यह गगरी और पनिहारीवाली उपमा विशेष है। जो चिह्न आपके अंग-संग मौजूद है और साधन करके उसे कभी देख लिया, उसको यदि बराबर नहीं देख सकते हैं। 
तो जिस स्थान पर वह चिह्न है, उस ओर आपका मन लगा रहे, सुरत उधर लगी रहे तो बहुत अच्छा है। दृष्टि-साधन में यदि आपने एक बार भी झलक देख ली और फिर वह नहीं देख पाते हैं तो उस ओर के लिए आपकी सुरत चलती रहेगी, उठी रहेगी, जिस ओर आपने देखा है। मेंहीं बाबा का उपदेश
उसकी बारंबार याद आपको रखनी चाहिए। यह सूक्ष्म मानस ध्यान है।
 बाहर में रूप देखकर जो मानस ध्यान करते हैं, वह स्थूल मानस ध्यान है। यदि आप सूक्ष्म मानस ध्यान कर सकते हैं तो स्थूल मानस ध्यान करने की आवश्कता नहीं है। कबीर साहब ने कहा है -
सुमिरन सुरत लगाय के, मुख ते कछू न बोल। 
बाहर का पट देय के, अंतर का पट खोल।।
ब्रह्मज्योतियों को देखने से और अनहद ध्वनियों को सुनने से बाहर की कोई चीज याद नहीं आती। केवल परमात्मा याद आता है। इससे परमात्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान तो नहीं होता, किंतु उसकी वृत्ति ऊपर उठी हुई होती है। कबीर साहब ने दीप और पतंग की मिसाल दी है, वह है - प्रत्यक्ष ब्रह्मज्योति में अपनी वृत्ति लगी रहे।
 नाद-कुरंग की जो मिसाल दी है, वह है - शब्द अभ्यासी को नादध्यान में उसी तरह रहना चाहिए। पानी और मछली की जो उपमा है, वह है - जैसे पानी को मछली पसन्द करती है, उससे अलग करने से वह जी नहीं सकती, उसी तरह काम करता हुआ या एकान्त में बैठा हुआ या बहुत लोगों में बैठा हुआ - किसी भी तरह रहे, यदि उसकी सुरत उसमें लगी रहती है, तो वह मछली की तरह है। 
दीप और पतंग में ब्रह्मज्योति की उपमा है। नाद-कुरंग में शब्द अभ्यास का सहारा है। 
मानस जप, मानस ध्यान, दृष्टिसाधन और सुरत-शब्द-योग - सब कुछ सुमिरण के अंदर है।
 इसलिए कबीर साहब ने कहा है -
जप तप संयम साधना, सब सुमिरन के माहिं। 
कबीर जाने भक्तजन, सुमिरन सम कछु नाहिं।।
इसलिए सब किसी को इसकी तरकीब जानकर सुमिरण करना चाहिए।
https://www.youtube.com/channel/UCsZCkj1tcYjidrWe4UQ_qvw

यह प्रवचन कटिहार जिलान्तर्गत श्रीसंतमत सत्संग मंदिर मनिहारी में दिनांक 16.2.1955 ईo को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था।
पूरा पढ़ें और
श्री सद्गुरु महाराज की जय 
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शुक्रवार, 5 मार्च 2021

मार्च 05, 2021

धन यौवन का गर्व न कीजै-सतगुरू मेंहीं

*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।
बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।। धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! मैंने तो आज तक अपने को कुछ ऐसा नहीं जाना है। अपनी परख और अपनी जाँच से मैंने अपने को वैसा नहीं पाया, जैसा कि आपने अभिनंदन पत्र देकर मुझे सम्मानित किया है। मैं उसके सर्वथा अयोग्य हूँ। कल्ह भी आपलोगों ने अभिनंदन पत्र दिया था। उसे आशीर्वाद समझकर ग्रहण करता हूँ। आपलोग जानते हैं कि मैं सत्संग के निमित्त यहाँ आया हूँ। *सत्संग में संतों के वचनों का अवलंब लेता हूँ।* गुरु महाराज की यही आज्ञा है। सन् 1909 ई० से लेकर आज 1954 ई० तक संतवचन के आधार पर सत्संग हुआ है, होता चला आ रहा है। संतों के वचन में ईश्वर को मानने का बड़ा आग्रह है। *ईश्वर नहीं हो तो संत-वचन छूँछ है।* जो ईश्वर पर विश्वास नहीं करता, संत उससे सहमत नहीं। बहुत लोगों का कहना है कि ईश्वर को बुद्धि के विचार से समझा दो। जो बुद्धि-विचार से परे है, उसे बुद्धि के विचार से कैसे समझाया जाय? संतलोग कहते हैं, ईश्वर कैसा होता है यह जानो। *ईश्वर ससीम वस्तु, व्यक्त वस्तु नहीं है।* ईश्वर-स्वरूप के लिए – *व्यापक व्याप्य अखण्ड अनन्ता। अखिल अमोघ सक्ति भगवन्ता।।* तथा - *राम स्वरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर। अविगत अकथ अपार, नेति नेति नित निगम कह।।* गोस्वामीजी ने कहा है। *वह स्वरूपतः अपार अर्थात् असीम है।* इस पर सोचो कि ऐसा कुछ हो सकता है या नहीं। अपार यानी जिसकी सीमा नहीं हो सकती हो किसी परिधि से घेरा नहीं जाय। ऐसा कुछ हो सकता है या नहीं। यदि कहो सब ससीम ही ससीम है, तब प्रश्न होगा कि सब ससीमों के पार में क्या है? इसके उत्तर में बिना असीम कहे प्रश्न हल हो नहीं सकता। यदि कहो कि सब ससीमों को जोड़कर एक असीम होगा, तो यह हो नहीं सकता कि सब ससीमों को जोड़कर असीम हो गया। *सबसे पहले का जो है, वह असीम अवश्य है।* यदि उसे ससीम माने तो उसकी सीमा के पार में कुछ और क्या होगा, वही असीम होगा। तब उसी असीम को क्यों नहीं परमात्मा माना जाय। सभी संतों यानी कबीर साहब, नानक साहब, पलटू साहब, तुलसी साहब, उपनिषद् आदि सभी के वचनों में यही है कि ईश्वर स्वरूपतः अनंत है। थोड़ा तर्क और विचार भी दृढ़ कर देता है कि एक अनंत तत्त्व - परमात्मा अवश्य है। एक-एक पिण्ड में जो रहनेवाला है, वह उत्सुक रहता है कि सुख मिले। इसकी पूर्ति के लिए वह संसार के पदार्थों में अपने को लगा-लगाकर खोजता है। फिर भी सुख दूर ही रहता है। *संसार में विद्वान, धनवान कोई भी हो, वह पूर्ण रूपेण सुखी नहीं।* बलवान, रूपवान, धनवान कबतक रहेगा। संयोग-लगन से धन घट जाता है। बुढ़ापा आने से रूप और बल घट जाता है। पहला रूप और बल नहीं रहता। बुढ़ापा आता है, वह सुरूप को कुरूप और बलवान को निर्बल बना देता है। पहले तो रोग होता है। शायद ही कोई रोग से बचते हों। इसीलिए कबीर साहब ने कहा -
*धन यौवन का गर्व न कीजै, झूठा पँच रंग चोल रे।* कितना भी सुंदर शरीर हो, एक दिन अवश्य छूटेगा। धन-परिवार सभी छूटेंगे। जो इस शरीर में रहनेवाला है, जो शरीर-सुख में भूला रहता है, असली सुख का जिसको पता नहीं है। तो वह हानि में जा रहा है। इस बात को संत लोग जानते हैं और कहते हैं संसार में सुख नहीं। संसार के परे का जो पदार्थ है, उसकी ओर चलो, उस तक पहुँचो, उसको पहचानो। *संसार को पहचानकर तुम अतृप्त रहते हो, लेकिन परमात्मा को पहचानकर तुम तृप्त हो जाओगे।* परमात्मा सबको दे रहा है, किंतु वे जान नही सकते हैं कि परमात्मा हमको देता है। सबसे विशेष देना यह है कि परमात्मा अपने को हमसे छिपाकर नहीं रखे। उसके दर्शन से मन तृप्त हो जाता है, तब कुछ माँग नहीं रहती, इच्छा नहीं रहती कि जागतिक सुख मिले। इसलिए ईश्वर की भक्ति करो। गुरु नानकदेवजी का वचन याद आता है - *ऐसी सेवकु सेवा करै, जिसका जीउ तिसु आगे धरै।* फूल, पत्ती, नैवेद्य आदि को चढ़ानेवाले बहुत होते हैं, किंतु अपने को कैसे चढ़ावें, यह नहीं जानते। यह जीव इस शरीर में ऐसा फँसा हुआ है कि उसको शरीर और जीव एक ही जैसे मालूम होते हैं। किसी मृतक को देखते हैं तो एक विचित्र वैराग्य होता है कि यह शरीर बेकाम हो गया। कितने समझते हैं, शरीर गया, तुम भी गए। किंतु मुझे इसका विश्वास नहीं। शरीर जड़ है। इसमें चलना, बोलना, फिरना कैसे होता है? *बिना ज्ञानमय पदार्थ के यह जड़ तत्त्व कुछ कर नहीं सकता।* कोई कहे कि बुद्धि-यंत्र से बूझता-सूझता है, इन्द्रिय यंत्र से काम करता है। सभी जड़-जड़ तत्त्व मिलकर चेतन उत्पन्न हो गया। किंतु इसका विश्वास नहीं होता। जड़ अपरा प्रकृति और चेतन परा प्रकृति श्री मद्भगवद्गीता के अनुकूल है। *जड़ असत्, परिवर्तनशील है और चेतन सत्, अपरिवर्तनशील है।* जीव सदा सुख के लिए इच्छुक रहता है। वहाँ चेतन जब शरीर से निकल गया, तब यह शरीर मर गया। संतों ने कहा कि यह मत समझो कि यही केवल पंचरंगा चोल है। ‘पंच रंग चोल' यानी पंच तत्त्वों का शरीर। रंग कहने का मतलब पंच तत्त्वों के पाँच रंग। पृथ्वी का रंग पीला, पवन तत्त्व का रंग हरा, अग्नि का रंग काला, जल का रंग लाल और आकाश का रंग सफेद होता है। यह पंच तत्त्वों का शरीर झूठा है। केवल एक ही शरीर नहीं है। केवल दार्शनिक ढंग से कहकर ही नहीं समझाया, बल्कि कथा कहकर समझाया। सावित्री और सत्यवान की कथा से ज्ञात होता है कि स्थूल शरीर के अंदर सूक्ष्म शरीर भी है। सूक्ष्म शरीर को ही लिंग शरीर कहते हैं। यमराज ने सत्यवान के स्थूल शरीर से लिंग शरीर को निकाला था, तब सत्यवान मर गया था। जब उसी लिंग शरीर को यमराज ने स्थूल शरीर में प्रवेश करा दिया, तो सत्यवान जीवित हो उठा। मतलब यह कि *शरीर के अंदर शरीर है।* साथ-ही-साथ यह भी सीखना चाहिए कि पातिव्रत्यधर्म कितना बड़ा धर्म है। *जिस प्रकार स्त्रियों के लिए पातिव्रत्य धर्म है, उसी प्रकार पुरुषों के लिए पत्नीव्रत धर्म है, जैसे श्रीराम ने इस धर्म का पालन किया था। एक पत्नीव्रती पुरुष की आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है।* खैर, यह एक छोटी-सी शाखा निकली थी। उसे छोड़ दीजिए और अब अपने मूल विषय पर आइए। जड़ शरीर चार हैं - स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण। ये चारो शरीर छूट जायँ, चेतन आत्मा पर कोई आवरण नहीं रहे, अकेले रहे, तब ईश्वर कहीं छिप नहीं सकता। ये ही चारो जड़ शरीर घूँघट के पट हैं। *संतों ने यहाँ ईश्वर-भक्ति का बड़ा आग्रह किया है।* शरीर लेकर किसी के आगे गिरना शरण होना नहीं है। बल्कि ‘ऐसी सेवकु सेवा करै, जिसका जीउ तिसु आगे धरै।‘ यह शरण होना है। *ऐसी भक्ति का काम करें कि सब शरीर छूटकर ईश्वर के सामने हो जायँ।* इसी का प्रचार हमारे गुरु महाराज ने किया। इसी भक्ति पर संतों का बड़ा जोर है। यह विषय तो गहरे ग्रंथ में अवश्य है, किंतु बहुत कम लोग जानते हैं। यह सब कहने से लोगों को मालूम होता है कि कोई नयी बात कह रहे हैं, किंतु बात पुरानी है। चारों शरीरों से निकल जाइए, तो आप ईश्वर के सामने हो जाइएगा। इसके लिए सोचिए कि यह कैसे होगा। आप नित्य प्रति सोते-जागते हैं। जागने से गहरी नींद में जाने के समय एक अवस्था तन्द्रा होती है, उसमें सबको मालूम होता है कि बाहर की तरफ से बेखबरी हो रही है और कुछ-कुछ ज्ञान भी होता रहता है। शरीर की शक्ति भीतर की ओर खिंचती है। फिर बाहर की ओर से अचेत हो जाते हैं। एक ही बिछावन पर और कुछ होता हो, तो आपको उसका ज्ञान नहीं होता। इसी तरह साधना द्वारा बाहर स्थूल तल से छूटना हो सकता है, जब आप भीतर प्रवेश करें। इसलिए *संतों ने अंतर्मुख होने कहा। जैसे-जैसे भीतर चलेंगे, वैसे-वैसे घूँघट उतरते जाएँगे। जब सब उतर जाएँगे, तब प्रभु को पहचानेंगे।* लोग कहते हैं, ईश्वर सर्वत्र है, फिर जाओगे कहाँ? मैं कहता हूँ ईश्वर सर्वत्र है, तो तुम पहचानते भी हो? *जहाँ जाकर पहचानेगे, वहाँ जाना होगा।* परमात्मा सर्वत्र है। संत कबीर साहब ने कहा - *सबकी दृष्टि पड़े अविनाशी, विरला संत पिछानै। कहै कबीर यह भरम किवाड़ी, जो खोलै सो जानै।।* परमात्मा सब जगह है, पहचान में क्यों नहीं आता? परमात्मा स्वरूपतः अनादि, अनंत, असीम है। वह सर्वव्यापक है। जो सर्वव्यापक है, वह सबसे विशेष सूक्ष्म है। जो सबसे विशेष सूक्ष्म है, उसको इन्द्रियों से कैसे पकड़ सकते हैं? इन्द्रियाँ स्थूल हैं। जैसे आँखों पर पट्टी बंधी रहने से बाहर का दृश्य नहीं देखा जाता, उस पट्टी को हटाने से देखा जाता है। उसी प्रकार शरीररूप पट्टी को हटाइए, तब ईश्वर के दर्शन होंगे। इसके लिए भक्ति कीजिए। भक्ति का अर्थ सेवा है। भूखे को खिलाना, प्यासे को पानी पिलाना, दुखियों की सेवा करनी भक्ति है। किंतु *ईश्वर को क्या चाहिए? उनको तो खाना-पीना कुछ नहीं, सोना-जागना कुछ नहीं। वह तो ऐसा है कि सबको खिलाता है, वह खाता नहीं। सबको पहनाता है, वह कुछ नहीं पहनता। सब कोई सोते हैं और वह जगकर पहरा करता है।* फूल-पत्ती आदि चढ़ाते हैं, यह आपका प्रेम है। इसके द्वारा आप अपने को ईश्वर की ओर लगाते हैं। किंतु ईश्वर को ये सब चीजें कुछ नहीं चाहिए। ईश्वर सर्वव्यापी है, सर्वगत है। *सर्वरूपी कहने से सगुण होता और सर्वगत कहने से निर्गुण होता है।* सगुण और साकार कहने से दो का बोध होता है। सगुण अर्थात् गुण सहित। साकार अर्थात् आकार सहित। आशय यह है कि कोई बिना गुण का है। उसने गुण को धारण किया तो सगुण हुआ। कोई निराकार है, उसने आकार धारण किया तो साकार हुआ। *भक्ति ऐसी होनी चाहिए कि स्थूल सगुण साकार से आरंभ कर निर्गुण निराकार के पार तक पहुँचा जा सके।* यह पवित्र मंगल कार्य सबको करना चाहिए। किंतु कैसे कीजिएगा? *हाथ में गोबर लगा रहे तो उसको इत्रदान में डुबाना ठीक नहीं होगा।* उसी प्रकार हृदय को विकारों से, पापों से अपवित्र कर परमात्मा को कैसे छू सकते हो? इसलिए *अपने को पवित्र बनाओ यानी झूठ चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार से अपने को बचाकर रखो और अंतस्साधन करो, तो प्रभु को पाओगे।* *औषधि करै औ पथ रहे, ताका वेदन जाय।* कोई आदमी अपने रोग निवारण के लिए औषधि तो करे, किंतु पथ्य नहीं करे, तो रोग कैसे छूटेगा? *अंतर्मुख होइए, पवित्र रहिए और ईश्वर का भजन कीजिए, कल्याण होगा।* यह प्रवचन मुंगेर जिलान्तर्गत जमालपुर निवासी राय बहादुर श्रीदुर्गादासजी तुलसी के आवास पर दिनांक 17.4.1954 ई० को रात्रिकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

“O Romeo” Movie Review & Story Breakdown – A Fresh Romantic Drama for Today’s Audience

Indian cinema continues to experiment with youth-centric love stories, and O Romeo is one such film that brings a blend of romance, modern...