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शनिवार, 25 जनवरी 2025

जनवरी 25, 2025

मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

जयगुरु 🙏 सभी सज्जन वृंद से प्रार्थना है कि प्रवचन को पूरा पढ़ें आपके लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का प्रवचन को लेकर हाजिर हूं। 🙏🕉️ जय गुरूदेव 🕉️🙏 मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्यारे लोगो! जिस क्षेत्र में हमलोग सत्संग कर रहे हैं, वह बड़े महत्त्व का है। यहाँ भगवान बुद्ध बहुत सत्संग किया करते थे। यहाँ निकट ही वेणुवन में भगवान बुद्ध सत्संग कराया करते थे। यहाँ और भी पहाड़ पर उनका स्थान है। यह पुण्यभूमि है। आपलोग जो सत्संग-प्रेमी हैं, घर के कामों को छोड़कर, विहार के इस कठिन महँगाई के समय में भी खर्च करके यहाँ आए हैं। यह देखकर मेरे चित्त को बहुत ही प्रसन्नता होती है। हमलोग क्यों आए? इसलिए कि जहाँ ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध सत्संग करते थे, वहाँ सत्संग करें। सत्संग से हम क्या सीखते हैं? बच्चे खेल खेलने में-खिलौने में खुश होते हैं। वे कुछ वर्ष खुश रहते है। उनको समझाया-बुझाया जाता है, अभिभावक की ओर से उनको भय दिखाया जाता है, दबाव डाला जाता है और विद्याभ्यास में लगाया जाता है। जैसे- जैसे वे विद्याभ्यास में बढ़ते हैं, वैसे-वैसे उनके ज्ञान का विकास होता है। वे समझते हैं कि बचपन का खेल भले ही छूट गया। वह सदा का सुखदायक नहीं था। पढ़-लिख लेने के बाद कर्तव्य और अकर्तव्य को समझने लगते हैं तथा उचित विचार कर उचित कर्म को करते हैं। ऐसे ही वे चलते हैं। यहाँ ऐसे बच्चे हैं, जो देखते हैं कि केवल संसार के ही काम हैं। जो संसार के आगे का ख्याल नहीं रखते, वे भी बच्चे हैं। मैं कहूँगा, जिनको जीवन के बाद का ख्याल नहीं है, चाहे वे कितनी अधिक उम्र के हो गए हों, फिर भी वे बच्चे हैं, चाहे वे मेरी उम्र (83 वर्ष) के हों वा मेरी उम्र से अधिक के हों। विद्या से अनुचित और अनीति को समझते हैं, फिर भी उन्हीं में चलते हैं। किन्तु सत्संग से ज्ञान सीखकर जो संसार के बाद को भी सोचते हैं, उनको पता लगता है कि यह शरीर छोड़कर जाना है। लेकिन पता नहीं, कहाँ जाना है। जाना जरूर है। कहाँ जाना है? पता नहीं। रास्ता मालूम नहीं, स्थान मालूम नहीं, कितनी चिन्ता की बात है? इस बात को जो चेतते हैं, वे ही सयाने होते हैं। वे ही बालपन के खेल को छोड़ते हैं। इन्हीं बातों को समझाने के लिए संत लोग संसार में विचरते हैं। संतों ने संसार के खेल को देखा और कहा कि इसको छोड़ देना अच्छा है। एक बात तो यह है कि संसार के कामों से उपराम होना और दूसरी बात यह है कि संसार के कामों में लगे रहने पर भी संसार से उपरामता रहे। संसार के कामों में त्रुटि नहीं होने देकर उसमें उपरामता रहे, यह उत्तम है। जो संसार के कामों को छोड़कर रहते हैं, वे भी संसार के कामों और प्रबन्धों को छोड़कर नहीं रह सकते। मनुष्य को समझ में आवे कि रास्ता क्या है? जाना कहाँ है? सबसे उत्तम स्थान कहाँ है? यह भी संसार का ही काम है। और कामों से मन को हटा लिया जा सकता है, लेकिन इससे हटा नहीं सकते। बड़े-बड़े संतों, महात्माओं को ऐसा ही देखा गया। वे लड़ाई के मैदान में नहीं गए, खेती करने नहीं गए, नौकरी नहीं की, लेकिन यह काम अपने ऊपर ले लिया कि ‘चलना है रहना नहीं, चलना बिस्वाबीस।’ यह ख्याल देते रहे। चलना किस रास्ते से है। कहाँ जाना है? इस बात को समझाते हैं। यह समझाना निर्वाण में जाकर नहीं होता, संसार में रहकर ही करते हैं। दूसरे वे हैं, जो संसार के कामों को करते हुए अपने चेतते हैं और दूसरों को चेताते हैं, जैसे भगवान श्रीकृष्ण। भगवान बुद्ध संन्यासी हुए, औरों को भी उन्होंने संन्यासी बनाया। भगवान बुद्ध के समय में जितने संन्यासी हुए उतने किन्हीं के समय में नहीं। केवल संन्यासी ही नहीं बनाए, राजा और सेनापति भी उनके शिष्य थे। उनको उन्होंने संन्यासी नहीं बना लिया, उस तरह की शिक्षा दी। ‘कर ते कर्म करो विधि नाना। सुरत राख जहँ कृपानिधाना।। युद्ध भी करो और स्मरण भी करो। ‘तन काम में मन राम में।’ ‘करम करै करता नहीं, दास कहावै सोय।’ -कबीर साहब कर्म करते थे। उन्होंने अपने जीवन- यापन के लिए किसी दूसरे पर भार नहीं दिया। ‘थोड़ा बनिज बहुत ह्नै बाढ़ी उपजन लागे लाल मई।’ संतोष उनको बहुत था। थोड़ा-सा काम करते थे, अपना जीवन-यापन जिससे हो। मतलब यह कि जो संन्यासी हो जाते हैं, उनका कर्तव्य हो जाता है कि वे संसार के पार को बतावें। संसार में सदा रहना नहीं है। समर्थ रामदास ऐसे थे कि वे शिवाजी राव को चलाते थे। राजा को भी अपनी राय देते थे। शिवाजी ने कहा कि मैं तप करूँगा। समर्थ ने कहा- मैं तुम्हारा तप करता हूँ, तुम तलवार लो। गुरु गोविन्द सिंहजी महाराज ने दोनों काम करके दिखाया-भजन भी, तलवार भी। गुरु गोविन्द सिंहजी महाराज कभी अनीति में नहीं गुजरे। बेटे मर गए, लेकिन उन्होंने शोक नहीं किया। उन्होंने समय को देखा। संसार में युद्ध-ही-युद्ध होता है। वेद के उपदेश से यही मालूम हुआ कि इन्द्रिय का सुख, सुख नहीं है। संसार के पदार्थों में सुख नहीं, ईश्वर-भजन में सुख है। भगवान बुद्ध के वचन का धम्मपद ग्रन्थ से पाठ हुआ, उसमें भी यही आया, ‘ईश्वर-भजन करो’-ऐसा तो उसमें नहीं आया, लेकिन यह आया कि संसार के सुखों में आसक्त मत होओ। तब क्या करो? संसार के सुख में नहीं फँसकर, शरीर-सुख से जो विशेष सुख है, उस ओर चलो। निर्वाण की ओर चलो। यह संसार जो दीप-टेम के समान जलता है, सदा के लिए बुझ जाए, उधर चलो। हमलोग इन्हीं बातों को याद दिलाने और जो नहीं सुने हैं, उनको सुनाने के लिए यह सत्संग करते हैं। जिनको सत्संग का चसका लग जाता है, वे दूर-दूर से आते हैं। उनके मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग होता है। सुनकर लोग विद्वान होते हैं। भगवान बुद्ध ने जो वचन कहे थे, लोगों ने सुने, याद रखे। लिखे तो पीछे गए। उपनिषद् के पाठ में आया कि भवसागर को पार करने के लिए सूक्ष्म मार्ग का अवलम्बन करो। स्थूल रास्ते पर चलकर संसार भर ही रहोगे, बाहर नहीं जा सकते। संसार का मार्ग तो यह है कि यहाँ से कलकत्ता जाओ और कलकत्ता से यहाँ आओ। यह स्थूल मार्ग है। दूसरा मार्ग है कि शरीर छूटने के बाद-संसार से जाने के बाद आराम से रहना हो। इसके लिए जो उत्तम-उत्तम कर्म हैं, स्थूल दर्जे के ही हैं। फिर भी उत्तम हैं, उनको करो। सूक्ष्म मार्ग बहुत उत्तम है। ‘लखे रे कोई बिरला पद निर्वाण।’ यह बाहर में नहीं है, भीतर का रास्ता है। उसपर पैर से चला नहीं जाता। सूक्ष्म अवलम्ब लेकर चलना होता है। ‘बिन पावन की राह है, बिन बस्ती का देश। बिना पिण्ड का पुरुष है, कहै कबीर सन्देश।।’ इस सत्संग से ये ही सब बातें बतायी जाएँगी। मैं धीरे-धीरे बतलाऊँगा कि सूक्ष्म मार्ग कहाँ है, उसका आरम्भ कहाँ से है और अंत कहाँ है? मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं बतलाऊँगा कि जहाँ से आपको फिर लौटकर इस संसार में आना नहीं होगा। *************** *यह प्रवचन नालन्दा जिलान्तर्गत भगवान महावीर और भगवान बुद्ध के विहार स्थल राजगीर में 58वाँ अखिल भारतीय संतमत सत्संग का विशेषाधिवेशन दिनांक 28. 10. 1966 ई0 के प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था।* *************** अगर आप प्रवचन को पूरा पढ लिये है तो शेयर जरुर करें।

गुरुवार, 2 जनवरी 2025

जनवरी 02, 2025

मन से स्वतंत्र कैसे होंगे -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार आप सभी के लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के प्रवचन को प्रस्तुत कर रहे हैं। एक बार जरूर पढ़ें और अपने जीवन में सुख शांति अनुभूति करेंगे। 🙏🕉️जय गुरूदेव 🕉️🙏 मन से स्वतन्त्र कैसे होंगे?-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! ईश्वर की भक्ति को समझ सकें, इसके लिए आपको याद दिलाता हूँ। ईश्वर की भक्ति के समझने में, पहले ईश्वर-स्वरूप का निर्णय होना चाहिए। ईश्वर मायातीत होने के कारण इन्द्रिगम्य नहीं हैं। इसलिए वे प्रत्यक्ष नहीं हैं। भक्ति कहते हैं-सेवा को। जो प्रत्यक्ष नहीं है, उनकी सेवा हम कैसे करें? उनके प्रत्यक्ष रूप का भजन या भक्ति संतों के संग भी हैं। यह एक तरह की सेवा है। जहाँ ईश्वर संबंधी कथाएँ हां, सुनो; यह भी एक तरह की भक्ति है। इन्द्रियों को काबू में रखने के लिए, बहुत से कर्मों से अपने को बचाए रखो। पंच पापों से बचे रहकर ही सज्जनों के धर्मानुकूल बर्ता जा सकता है। इन्द्रियों के रोकने का स्वाभाववाला बनने के लिए केवल विचार से ही नहीं होता है। इन्द्रियों के संग, मन की धारें लगी रहतीं हैं। इन धारों को इन्द्रिय के स्थानों से समेट कर एक केन्द्र पर रखो, तो दमशीलता होगी। दमशीलता के अंदर मन का रूप बहिर्मुख से अंतर्मुख हो जाता है। यह ऊर्ध्वगमन ही ईश्वर की भक्ति होती है। जैसे जगन्नाथजी जानेवाले का चलना जगन्नाथजी की भक्ति है, उसी प्रकार ईश्वर की ओर चलना भी ईश्वर की भक्ति है। जो लोग ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन के वास्ते अंदर-अंदर चलते हैं, उनका वह चलना ईश्वर-भक्ति के अंदर दाखिल है। किसी भी मन्दिर में मूर्ति का दर्शन करके प्रत्यक्ष दर्शन की लालसा रह जाती है। दर्शन प्रत्यक्ष होना चाहिए। अन्तर्मार्गी को प्रत्यक्ष दर्शन होता है। बाहर घूमते हो इन्द्रियों के संगे-संग और अंदर घूमते हो इन्द्रिय और शरीर का संग छोड़कर। अंदर चलते-चलते अपने का पता लग जाएगा। उसी को ईश्वर का भी पता लगेगा। चेतन आत्मा के ऊपर से जब सब आवरण उतर जाते हैं, तो आत्मदृष्टि होती है। यह आत्मदृष्टि किसी के देने से नहीं होती। अन्तरंग साधना द्वारा ईश्वर की ओर चलना, ईश्वर की भक्ति है। यही परा भक्ति है। जीवात्मा शरीरों को छोड़ते-छोड़ते परमात्मा में अपने आप जा मिलती है। दमशील होने के साथ- साथ शमशील भी होना चाहिए। ‘दम’ के बिना ‘शम’ नहीं होता। ‘शम’ का साधन पूर्ण सिमटाव में पहले विन्दु पर अवस्थित रहकर वहाँ जो शब्द होता है, उसको ग्रहण करके होता है। जहाँ कम्पन है, वहीं शब्द है। जहाँ कम्पन नहीं, वहाँ रचना नहीं। कम्पन में शब्द अनिवार्य रूप से होता है। सभी शब्द सुन नहीं पाते, इसलिए कहते हैं कि कम्पन में शब्द नहीं होता। कम-से-कम 20 कम्पनांक के शब्द को तथा ज्यादे-से-ज्यादे 20 हजार वा 30 हजार कम्पनांक के शब्द सुन सकते हैं। उससे कम या अधिक कम्पनांक के शब्द कों सुन नहीं सकते। चाहे स्थूल जगत हो या सूक्ष्म जगत, बिना कम्प के रचना बन नहीं सकती। जहाँ रचना है, वहाँ शब्द है। ऊपर का शब्द नीचे दूर तक आता है। अभ्यासी एक विन्दु पर, उस सूक्ष्म मण्डल के केन्द्रीय शब्द को सुनता है। एकविन्दुता के कारण सूक्ष्म मण्डल में प्रवेश हुआ, इसलिए सूक्ष्म मण्डल के केन्द्र का शब्द पकड़ा जाता है। संतों ने पुकारकर कहा है-‘जेहि शब्द से प्रगट भये सब, सोई शब्द गहि लीजै।। (कबीर साहब) यही ईश्वर का प्रतीक है। ईश्वर तक पहुँचने का दृश्यमान र्चिं विन्दु है। बाहर में प्रतीक बनाते हैं, यह स्वकृत है। ईश्वरकृत र्चिं जैसा मनुष्यकृत र्चिं नहीं हो सकता। चलना रास्ते पर होता है। रास्ते का ओर-छोर होता है। इसका आरंभ एकविन्दुता से होता है और अंत परमात्मा में होता है। यह ज्योति मार्ग और शब्दमार्ग सबके अंदर-अंदर मौजूद है। अध्यात्म- वैज्ञानिक अपने शरीररूपी धरती में खोजकर ज्योति और शब्द पाते हैं। नहीं करनेवाला अगर कहे कि ‘नहीं है’ तो उसका यह कहना गलत है। प्रत्याहार में जो हैरानी होती है, वह साधन करते-करते मिट जाती है। शमशीलता शब्द-साधना से होती है। परा भक्ति को जो नहीं जानते हैं, वे मोटी भक्ति को पकड़े रहते हैं। पूजा-पाठ में जो एकाग्रता आती है, उससे अधिक एकविन्दुता में आती है। स्थूल भक्ति, भक्ति का पैर है और सूक्ष्म भक्ति, भक्ति का शिर है। केवल पैर ही पैर नहीं जानो, शिर को भी जानो। पंच पापों (झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार) से बचे रहो। संसार में दुष्टकर्म से जनता में कष्ट होता है। हमलोगों को सुराज्य प्राप्त है। इसके लिए कितने गोली के शिकार हुए और फाँसी पर चढ़े। परन्तु सुखी हम अपने को नहीं पाते हैं। हमें पापों से रहित होना चाहिए। अपने को पापों से छुड़ा ले, तो दुष्ट कर्म बिल्कुल मिट जाएँगे और स्वराज्य में सुराज हो जाएगा। ईश्वर की भक्ति करनेवाले पापों से छूटते हैं। सबको चाहिए कि अपने को भक्त बना लें। किसी तरह धन कमा लो, इसमें पापों को नहीं छोड़ते हैं। परन्तु ईश्वर की भक्ति में पंच पापों को छोड़ना आवश्यक है। अपने तईं अपने को ईश्वर तक पहुँचाना ही ईश्वर की भक्ति है। हमलोग तन से स्वतंत्र हो गए हैं, परन्तु मन से नहीं। *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 27. 12. 1965 ई0 के अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* *************** इस प्रवचन को पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत साधुवाद एवं कमेंट बॉक्स में जयगुरु जरूर लिखें और शेयर करें 🙏

मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

दिसंबर 31, 2024

योगी देवता के पद से भी आगे बढ़ जाते हैं -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार आप सभी धर्मप्रेमी के महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का दिव्य प्रवचन लेकर आया हूं। सद्गुरु महाराज का प्रवचन जीवन को नयी आध्यात्मिक पर ले जाने वाला है।इसे पूरा पढ़ें 🙏🕉️ जय गुरूदेव 🕉️🙏 योगी देवता के पद से भी आगे बढ़ जाते हैं-संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! आपलोग शान्तिप्रिय बनें। शान्ति कैसे प्राप्त हो, यह इस सत्संग से जानें। सत्संग में भक्ति के बारे में कहा जाता है, ईश्वर-स्वरूप का ठीक- ठीक निर्णय बताया जाता है। आपके अपने-अपने घरों में, ईश्वर संबंधी कोई- न-कोई शब्द बच्चों को रटाते हैं। यह बहुत अच्छी रिवाज है। ईश्वर को अनेक मानना गलती है। क्या! ईश्वर अनेक हो सकते हैं? जो भक्त ईश्वर को अनेक मानते हैं, वे कम जानते हैं। ईश्वर दो हो नहीं सकते, यह एकदम असम्भव है। अनेक ईश्वर को मानने की साम्प्रदायिक भावना आपस में झगड़े पैदा कर देती है। यथार्थ में ईश्वर एक ही हैं। नाम और रूप अनेक हैं। उपनिषद् का यह ज्ञान बहुत उत्तम है- वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ।। -कठोपनिषद् , अध्याय 2, वल्ली 2 अर्थात् जिस प्रकार इस लोक में प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है। ब्रह्म या आत्मा एक-ही-एक है, वह वायु के ऐसा सर्वव्यापक है और सर्व से परे भी है। ईश्वर का न केन्द्र होता है और न परिधि। जीव केन्द्र और परिधियुक्त है। ईश्वर केन्द्र और परिधि से परे है। उसकी सीमा कहीं नहीं होती है। उसी एक को राम, शिव, विष्णु आदि कहते हैं। यह नाम, रूप माया है। ‘नाम रूप दुइ ईश उपाधी।’ (गोस्वामी तुलसीदासजी) पशु-योनि में जो मन रहता है, वही मन मनुष्ययोनि में भी रहता है। इसीलिए पशु-योनि का संस्कार मनुष्यों में पाया जाता है। जीवात्मा परमात्मा का अभिन्न अंश है। यह अंश आवरण के कारण से माना जाता है। कितना भी बड़ा रूप बना लो, वह रहेगा आकाश के अंदर ही। ईश्वर माया के रूप को भरकर उससे बाहर कितना है, कोई नहीं कह सकता। ईश्वर इन्द्रियों को व्यक्त नहीं, परन्तु आपको व्यक्त है। जो कोई योगी होता है, वह देवता के पद से भी आगे बढ़ जाता है। जहाँ जाकर ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ होता है। मनुष्य वहाँ तक जा सकता है। परमात्मा की भक्ति हम माया रूप पाने के लिए नहीं, उनके स्वरूप को पाने के लिए करें। मनु-शतरूपा को माया रूप का दर्शन हुआ, लेकिन उनका कष्ट नहीं छूटा। इससे छूटने के लिए अमायिक रूप का दर्शन चाहिए। उन्हें आत्मा से ही पहचान सकेंगे। आत्मा को अपनी कैवल्य-दशा में आना चाहिए। शरीर माया से निर्मित घर है। इसको जबतक हम पार नहीं कर जाएँ, तबतक हम कैवल्य-दशा को प्राप्त नहीं कर सकते। अंदर चलने के लिए ध्यानाभ्यास करो। किसी रूप का ध्यान स्थूल ध्यान है। रूप ध्यान से सिमटाव होता है और सूक्ष्म ध्यान करने की योग्यता प्राप्त होती है। ध्यान करने के लिए कहीं घर छोड़कर भागने की आवश्यकता नहीं। कर्म करो और ध्यान भी करो। सज्जनों के धर्मानुकूल चलो। पंच पापों से रहित को सज्जन कहते हैं। दमशीलता का अभ्यास करो। दमशील इन्द्रियों को रोकने का स्वभाववाला होता है। दमशील केवल विचार से नहीं हो सकते। मन की सूतें इन्द्रियों से लगी हुई है। ध्यान से मन को इन्द्रियों की घाटों से समेटा जाता है। द *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 26. 12. 1965 ई0 के अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* ******* प्रवचन को पूरा पढ़ने के लिए आपका आभार। शेयर जरुर करें

रविवार, 29 दिसंबर 2024

दिसंबर 29, 2024

आपका निजी ज्ञान क्या है -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार आप लोगों के लिए सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का अमृत में प्रवचन लेकर हाजिर हूं और इस प्रवचन को आप पूरा पढ़ें और जीवन में उतारने का प्रयास करें क्योंकि यह सदगुरु महाराज का प्रवचन जीवन को एक नई दिशा देने वाला है एक बार अवश्य पढ़ें और शेयर करना ना भूलें। 🙏🕉️ *जय गुरूदेव* 🕉️🙏 आपका निजी ज्ञान क्या है-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज *धर्मानुरागिनी प्यारी जनता!* आपलोगों को यह विदित हो गया है कि संतमत सत्संग का यह विशेषाधिवेशन है। यहाँ के श्रीछांगूर भगतजी ने इसे कराया। सत्संग से यह मतलब नहीं कि इसमें राजनैतिक बातें हों। सत्य क्या है? जो अकम्प है, जो अडिग है, जिसका नाश नहीं होता, जो है, जो था और जो सदा रहेगा, वह सत्य है। उसी सत्य के संबंध में यहाँ बात करेंगे। यहाँ प्रश्न आ जाता है कि सत्संग की आवश्य- कता क्या है? यदि हम सत्संग नहीं करें तो हमारी क्या हानि होगी? कर्म का फल अवश्य होगा। कोई धनवान है तो कोई धनहीन। सब तरहों में जीवन बिताते हुए कोई कहे कि मैं सुखी हूँ, यह कभी संभव नहीं। इस संसार में बड़े-बड़े बलवानों का बल थक गया। बड़े-बड़े धनवान भी धन छोड़कर चले गए। हम शरीर ही धारण नहीं करें, इसके लिए किस अवलम्ब को धारण करें? संतों ने विचार कर कहा कि इसके लिए तुम भक्ति करो। जो प्रत्यक्ष नहीं, जो इन्द्रियों की पकड़ में नहीं रहते, उन्हीं को अव्यक्त कहते हैं। आवागमन में घूमना कबतक होगा, इसका कोई ठिकाना नहीं। हाँ, इसका ठिकाना संतों ने ईश्वर-भक्ति करके जाना है। ईश्वर की भक्ति करने में यह जानना चाहिए कि ईश्वर का स्वरूप क्या है? वह अव्यक्त क्यों है? वह व्यक्त भी होगा? इसके उत्तर में कहा जाएगा कि वह इन्द्रियों को व्यक्त नहीं होगा, आप अपने को पहचानें तो वह व्यक्त होगा। तुम्हारा शरीर क्षेत्र है और तुम क्षेत्रज्ञ हो। बिना बीज का वृक्ष नहीं हो सकता। इसी तरह स्थूल शरीर वृक्षवत् है और सूक्ष्म शरीर बीजवत्। स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण; इन चार शरीरों के साथ आप रहते हैं। इन्द्रियों के कामों को आप जानते हैं, पर अपने निजी कामों को नहीं। आपका निजी काम क्या है, सो समझिए। दुःख की बात है कि आप अपने आपको नहीं पहचानते हैं। सब इन्द्रियाँ जड़ हैं, इनमें कोई अपनी निजी शक्ति नहीं। इन इन्द्रियों को आपके ज्ञान से ज्ञान होता है। आप अपने से अपने को पहचानेंगे। इन्द्रियाँ माया से निर्मित हैं। चेतन आत्मा के कारण देह सचेतन है। इस तरह यह सिद्ध होता है कि चेतन और जड़ में भेद है। एक ज्ञानमय है, एक ज्ञान-रहित। संत महात्मा कहते हैं कि आप अपने निजी ज्ञान से ही अपने को पहचान सकते हैं। अपने को पहचानेंगे तो ईश्वर को भी पहचानेंगे। ईश्वर वह है, जिन्हें आप अपने निजी ज्ञान से पहचानें। जैसे कोई स्वप्न में सपनाता हुआ अर्थहीनता का दुःख पाता है और जब जग जाता है, तभी अर्थहीनता का दुःख छुटता है। इसी तरह संतों का कहना है कि तीन अवस्थाओं अर्थात् जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को पार करोगे तो चौथी अवस्था मिलेगी। चौथी अवस्था में आपका निजी ज्ञान धीरे-धीरे चमकता जाएगा। यह शरीर माया से निर्मित है। जिसमें बदली हो, जिसका अत्यन्ताभाव हो, वह माया है। यह योगियों ने सिद्ध कर बतलाया है। ईश्वर-भक्त बनो, माया नहीं लगेगी। इस चर्मचक्षु से जिस रूप को देखोगे, वह माया का दर्शन होगा। जिसे आत्मदृष्टि से देखता है, वह परमात्मा है। जिस तरह आँख को देखने के लिए आइने का सहारा लेते हैं, उसी तरह ईश्वर को तथा अपने को देखने के लिए ध्यान-भजन रूप साधन की आवश्यकता है। जबतक कोई ईश्वर-स्वरूप का निर्णय नहीं जानता, तबतक वह औनाया हुआ रहता है। जैसे यात्री को निर्दिष्ट स्थान मालूम नहीं रहता तो उसका चलना व्यर्थ ही होता है। श्रीरामायणजी के पाठ में अभी जो पढ़ा गया, उससे ज्ञात होता है कि माया ईश्वर के अधीन में इस तरह है, जिस तरह कठपुतली। परमात्मा अज है, विज्ञान-स्वरूप है। जो बिना कारण का कार्य दिखाता है। ‘अज विज्ञान रूप बलधामा।’(गोस्वामी तुलसीदासजी)। आज के भौतिक विज्ञानवाले को यदि उपादान कारण नहीं रहे, तो वे कुछ भी नहीं बना सकते। परमात्मा उपादान कारण को बनाते हैं। ‘तद् आप ही आप, आप उपाया, नहिं किछुते किछु कर दिखलाया। (गुरु नानक साहब)।’ परमात्मा स्वरूपतः अनादि-अनन्त हैं। वे उपज-ज्ञान से भी अनादि हैं। सबसे पहले का एक अनादि-अनन्त तत्त्व अवश्य मानना पडे़गा। द *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 25. 12. 1965 ई0 के अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* पूरा प्रवचन को पढ़ने के लिए आपका दिल से सहृदय आभार और सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के प्रवचन को शेयर करें 🙏

शनिवार, 28 दिसंबर 2024

दिसंबर 28, 2024

योग के आरंभ का नाश नहीं होता -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार सभी धर्मप्रेमी के लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का प्रवचन लेकर हाजिर हूं। पूरा पढ़ें 🙏🕉️ *जय गुरूदेव* 🕉️🙏 योग के आरम्भ का नाश नहीं होता *प्यारे लोगो!* जो अचेत पड़ा हुआ हो, वह कुछ समझे बूझे-ऐसा नहीं हो सकता है। इसलिए संत- महात्मागण कहते हैं कि तुम सचेत हो जाओ। विषयों में लवलीनता अपने को अचेत रखना है। विषयों में लवलीनता नहीं हो, यह असम्भव नहीं है। पंच विषयोपभोग काल में जो जाग्रत दशा रहती है, उसमें थोड़ी-सी सचेतता है। तीन अवस्थाओं के अंदर हमलोग स्वभावतः गुजरते रहते हैं। इसमें विषय लवलीनता रहती है। जिस तरह ये तीनों अवस्थाएँ होती रहती हैं, उसी तरह एक चौथी अवस्था भी है। यह अवस्था योगी को प्राप्त होती है। जिन्होंने इसे पाने की ठीक विधि जानकर अभ्यास किया, उन्हें अवश्य ही इस अवस्था का ज्ञान होता है। चौथी अवस्था में यह स्थूल संसार खो जाता है। जैसे इस साधारण जागने की अवस्था में स्वप्नावस्था खो जाती है। केवल वाक्य-ज्ञान में निपुण होने से कोई विषयों से अनासक्त नहीं हो सकते। हमलोग सात्त्विक, राजस एवं तामस कर्म करते हैं। सात्त्विक कर्म का परिणाम वहाँ तक पहुँचाता है, जहाँ पहुँचकर तीनों गुणों से बाहर हुआ जाता है। तामस कर्म नीचे-नीचे की योनियों के भोगों को भोगता है। सात्त्विक कर्म ईश्वर की उपासना ही है। ईश्वर की उपासना इस तरह से करें कि वह हमें तीनों अवस्थाओं से ऊपर उठा सके। चौथी अवस्था का भेद बतानेवाले गुरु चाहिए। ऐसे गुरु के मिलने पर ही वह साधन हो सकेगा। पापों से छूटना ध्यान से ही हो सकता है और कर्मों से नहीं हो सकता। सुकर्मों को करते हुए जो ध्याना- भ्यास करते हैं, वही कर्मों के बंधनों से छूटते हैं। यदि शैल समं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम् । भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ।। -ध्यानविन्दूपनिषद् अर्थात् यदि अनेक योजनों तक फैले हुए पहाड़ के समान भी पाप हो तो वह ध्यानयोग से नष्ट हो जाता है। जिस कर्म का परिणाम दुःखद हो वा आवागमन करानेवाला हो, वह पाप है। ध्यान, लव लगाने को कहते हैं। कोई भी क्यों न हो, ध्यान सभी कर सकते हैं। ध्यान की युक्ति गुरु से सीखनी चाहिए। मैंने जो थोड़ा-सा अभ्यास किया है, उससे मुझे विश्वास हो गया है। इस अभ्यास में चलते रहो-अनवरत रूप से चलते रहो। अंत में वही होगा, जो संतों को प्राप्त हुआ है। ध्यानयोग के द्वारा सिमटाव होता है। सिमटाव से ऊर्ध्वगमन होता है। द्वैत का जहाँ तक विस्तार है, यदि ध्यान-योग से वहाँ तक की सीमा को पार कर गए तो सारे कर्मों-कर्म बंधनों से छूट जाता है। ध्यान-योग का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। एक-एक डेग चलते रहने से कितने कोस निकल जाते हैं, इसी तरह थोड़ा-थोड़ा नित्य नियमित रूप से ध्यानाभ्यास करते रहने से अवश्य लाभ होगा। ध्यानाभ्यासी का जब-जब जन्म होगा, मनुष्य योनि में ही जन्म होगा। इसका संस्कार कभी नष्ट नहीं होगा। भगवान कृष्ण ने कहा-‘योग के आरम्भ का नाश नहीं होता।’ भक्ति बीज बिनसै नहीं, जो युग जाय अनंत । ऊँच नीच घर जन्म ले, तऊ संत को संत ।। संतों की वाणी से दिलाशा होती है। अपने को पवित्र रखना चाहिए। *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 25. 12. 1965 ई0 के प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था।* इस प्रवचन को पूरा पढ़ें और शेयर करें 🙏

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

जुलाई 08, 2022

अंतर अजब बिलास-महर्षि हरिनंदन परमहंस जी महाराज

श्री सद्गुरवें नमः
आचार्य श्री रचित
पुस्तक "पूर्ण सुख का रहस्य" से लिया गया है।एक बार अवश्य पढ़ें 👇👇👇👇👇👇👇👇
: पूर्ण सुख का रहस्य
https://youtu.be/wmoLWGUsh_U
https://youtu.be/wmoLWGUsh_U
गो० तुलसीदासजी महाराज ने संतों के उत्कृष्ट गुणों का वर्णन करते हुए रामचरितमानस में लिखा है
 षट्विकार जित अनघ अकामा 
अचल अकिञ्चन सुचि सुख धामा ॥
 अमित बोध अनीह मितभोगी । 
सत्यसार कवि कोविद जोगी ॥

अर्थात् सन्त जन छः विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य) को जीते हुए, निष्पाप, वासना-रहित, स्थिरबुद्धि, धन-त्यागी, पवित्र, सुख के धाम, अति विशेष ज्ञानवान, इच्छा-रहित, अल्पभोगी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान और योगी होते हैं।

उपर्युक्त विशिष्ट गुणों को धारण करनेवाले संतजन परमात्मा रूपी धन को पाकर पूर्णकाम हो जाते हैं। उनके मन में संसार के अन्य किसी पदार्थों को पाने की चाहना नहीं होती। उन संत महापुरुषों के अतिरिक्त संसार के अन्य सभी लोगों के मन में विविध पदार्थों को पाने की चाहना बराबर होती रहती है।

सर्वसाधारण लोगों के मन में उस वस्तु को पाने की लालसा होती है, जो वस्तु उसे सुखदायक प्रतीत होती है। धन-सम्पत्ति, भोग-सामग्री, राज-पाट, पद-प्रतिष्ठा, स्त्री-पुत्र आदि की प्राप्ति में लोगों को सुख का बोध होता है, इस कारण स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में इन सभी वस्तुओं को पाने की चाहना होती है।

धन-सम्पत्ति वगैरह भरपूर मात्रा में उपलब्ध रहने पर भी अगर उसे और अधिक पाने की चाहना मन में रहती है, तो यह चाहना अपने में कमी का बोध कराती है और जहाँ कमी है, वहाँ पूर्ण सुख भला कैसे हो सकता है।

सांसारिक वस्तु लोगों को कितनी ही अधिक मात्रा में प्राप्त क्यों न हो जाय, उसकी प्राप्ति से उनकी लालसा की समाप्ति नहीं होती, बल्कि उनकी वह लालसा अधिकाधिक बढ़ती जाती है। जिस प्रकार धधकती हुई आग में घी डालने से वह बुझती नहीं और अधिक प्रज्वलित हो जाती है। गो० तुलसीदासजी महाराज ने 'विनय-पत्रिका' में लिखा है

बुझे न काम अगिनि तुलसी कहुँ, विषय भोग बहु घी ते। चाहना की पूर्ण रूप से समाप्ति आत्मसाक्षात्कार होने पर ही होती है। जिस आत्मा का साक्षात्कार होने पर सब चाहनाओं की समाप्ति हो जाती है, उसके संबंध में सद्ग्रंथों में कहा गया है कि उसी परम तत्त्व के आधार पर सम्पूर्ण सृष्टि टिकी हुई है। वह आत्म-तत्त्व इस विश्व-ब्रह्माण्ड में सर्वत्र समष्टि रूप में व्यापक होकर उससे कितना अधिक बाहर है, यह कोई बतला नहीं सकता। ऋषिओं और संतों ने उस परम तत्त्व को 'परमात्मा' कहकर अभिहित किया है।

वह सर्वव्यापी परमात्मा बड़ा ही विलक्षण है। उसकी विलक्षणता का वर्णन गो० तुलसीदासजी महाराज ने रामचरितमानस में इस प्रकार किया है

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु कान। कर बिनु करम करइ विधि नाना ॥ आनन रहित सकल रस भोग । बिनु बानी बकता बड़ जोगी ॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ धान बिनु बास असेखा ॥ असि सब भाँति अलौकिक करनो । महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ॥ ऐसे विलक्षण कर्म करनेवाले परम प्रभु परमात्मा की अद्भुत

• सामर्थ्य का बखान करते हुए गो० तुलसीदासजी महाराज ने कहा है कि उन प्रभु राम में असंख्य कामदेव के समान सुन्दरता है, करोड़ों दुर्गा के समान शत्रुओं का नाश करने की शक्ति है। वे परमात्मा सौ करोड़ इन्द्र के समान विलास करनेवाले और सौ करोड़ आकाश के समान परिमाण-रहित अवकाशवाले हैं। सौ करोड़ पवन के समान बड़े बली और सौ करोड़ सूर्य के समान प्रकाशवाले हैं। उनमें सौ करोड़ चन्द्रमा के समान शीतलता है तथा असंख्य काल के समान वे अत्यन्त कठिन, दुर्गम और अपार हैं। अपरिमित अग्नि के समान कठिनता से धरने के योग्य, अनगिनत पाताल के समान गहरे, अनगिनत यमराज के समान भयंकर, अनगिनत असंख्य तीर्थ के समान बहुत अधिक पवित्र, करोड़ों हिमालय के समान स्थिर और असंख्य समुद्रों के समान गहरे हैं। अनगिनत कामधेनु के समान समस्त इच्छाओं को पूर्ण करनेवाले और करोड़ों सरस्वती के समान बहुत अधिक चतुर तथा अनगिनत ब्रह्मा के समान सृष्टि करने में प्रवीण हैं। अनगिनत विष्णु के समान पालन करनेवाले और अनगिनत रुद्र के समान संहार करनेवाले हैं। सौ करोड़ कुबेर के समान धनवान और सौ करोड़ माया के समान छल की खान
तथा करोड़ों शेषनाग के समान भार-धारण करनेवाले हैं। इस तरह परम प्रभु परमात्मा की अद्भुत सामर्थ्य का बखान करते हुए गो० तुलसीदासजी महाराज ने अन्त में कहा है कि जिस तरह सूर्य को सौ करोड़ जुगनुओं के समान कहने में सूर्य की हीनता होती है, उसी तरह अपरिमित शक्तिवाले उस परम प्रभु परमात्मा के लिए सभी उपमाएँ अत्यन्त तुच्छ हैं। वास्तव में उन परम प्रभु परमात्मा की उपमा के योग्य और कुछ नहीं है। उनके समान वे ही हैं।

उस अद्भुत सामर्थ्य से युक्त परम प्रभु परमात्मा के स्वरूप का वर्णन हमारे परमाराध्य गुरुदेव महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज ने इस प्रकार किया है- 'जो परम तत्त्व, आदि-अन्त-रहित, असीम, अजन्मा, अगोचर, सर्वव्यापक और सर्वव्यापकता के भी परे है, उसे ही सर्वेश्वर, सर्वाधार मानना चाहिए तथा अपरा (जड़) और परा (चेतन); दोनों प्रकृतियों के पार में अगुण और सगुण-पर, अनादि-अनन्त-स्वरूपी, अपरम्पार शक्तियुक्त, देशकालातीत, शब्दातीत, नामरूपातीत, अद्वितीय, मन-बुद्धि और इन्द्रियों के परे जिस परम सत्ता पर यह सारा प्रकृति मंडल एक महान यंत्र की नाई परिचालित होता रहता है, जो न व्यक्ति है और न व्यक्त है, जो मायिक विस्तृतत्व-विहीन है, जो अपने से बाहर कुछ भी अवकाश नहीं रखता है, जो परम सनातन, परम पुरातन एवं सर्वप्रथम से विद्यमान है, सन्तमत में उसे ही परम अध्यात्म-पद वा अध्यात्म-स्वरूपी परम प्रभु सर्वेश्वर (कुल्ल मालिक) मानते हैं।'

जो सर्वशक्तिमान परम प्रभु परमात्मा अत्यन्त सघनता के साथ समस्त प्रकृति-मण्डल में व्यापक होकर उससे बाहर भी हैं, वे ही परम प्रभु अंश रूप से सब शरीरों में विद्यमान हैं; किन्तु उनका वह अंश मायिक आवरणों से आच्छादित रहने के कारण 'जीवात्मा' कहलाता है।

जीवात्मा जबतक शरीर में विद्यमान रहता है, तबतक शरीर तथा शरीरस्थ सभी इन्द्रियाँ सक्रिय जान पड़ती हैं अर्थात् देखना, सुनना, खाना, पीना, उठना, बैठना इत्यादि क्रियाएँ होती रहती हैं। शरीर में विद्यमान वही चेतन तत्त्व जब शरीर से निकल जाता है, तब शरीर और शरीरस्थ सभी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं। ऐसा होने पर लोग कहते हैं कि अमुक व्यक्ति मर गया।शरीर से जीवात्मा के निकल जाने पर शरीर नष्ट हो जाता है; परन्तु जीवात्मा का नाश नहीं होता। परम प्रभु परमात्मा का अंश होने के कारण यह जीवात्मा भी अविनाशी है। यह अविनाशी जीवात्मा एक शरीर के नष्ट हो जाने पर पुनः दूसरे शरीर को ठीक उसी प्रकार धारण कर लेता है, जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण कर लेता है। श्रीमद्भगवद्गीता के निम्नांकित श्लोक से इस कथन की सम्पुष्टि हो जाती है

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

ईश्वर - परमात्मा का अंश-रूप यह जीवात्मा यद्यपि अविनाशी, चेतन, मल-रहित (निर्मल) तथा सहज सुख की राशि है, तथापि मायिक आवरणों से युक्त हो जाने के कारण इस जीवात्मा को अपने सहज स्वरूप का विस्मरण हो गया है। शरीर का संग हो जाने के कारण यह मायिक सुखों का भोगी हो गया है। मायिक सुख स्वल्प, परिमित तथा विनाशी होने के कारण जीवात्मा को इससे पूर्ण सुख प्राप्ति नहीं हो पाती। की

संत-महापुरुष बतलाते हैं कि अगर पूर्ण सुख प्राप्त करना चाहते हो, तो परम प्रभु परमात्मा के धाम में चलो। उस परम प्रभु परमात्मा के धाम में जाने का मार्ग बाहर में नहीं है। वह मार्ग तुम्हारे अपने ही अन्दर में है।

परमाराध्य गुरुदेव महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज उस मार्ग के सम्बन्ध में कहते हैं कि वह अन्तर का मार्ग, जिसपर चलकर परमात्मा के धाम में पहुँच होती है, बड़ा ही अद्भुत है; लेकिन बिना सन्त सद्गुरु की शरण में गये उस अद्भुत मार्ग की जानकारी नहीं हो सकती

बिन दया सन्तन की 'मेंहीं', जानना इस राह को । हुआ नहीं होता नहीं, वो होनहारा है नहीं । परम दयालु गुरुदेव उस मार्ग की जानकारी करा देते हैं, जिसपर चलकर बहुत सुख मिलता है। गुरुदेव कहते हैं
[अद्भुत अन्तर की डगरिया, जापर चलकर प्रभु मिलते ॥ टेक ॥ दाता सतगुरु धन्य धन्य जो राह लखा देते । चलत पंथ सुख होत महा है, जहाँ अझर झरते ॥ अमृत ध्वनि की नौबत झहरत, बड़भागी सुनते । सुनत लखत सुख लहत अद्भुती, 'मेंहीं' प्रभु मिलते |

उस अन्तर- पथ पर अमृत की वर्षा होती है अर्थात् उस अन्तर-पथ पर चलनेवालों को ब्रह्मज्योति और ब्रह्मनाद की प्राप्ति होती है, जिससे अद्भुत सुख मिलता है; लेकिन जो बड़भागी होते हैं, वे ही अन्तर- पथ पर उस ब्रह्मनाद को सुन पाते हैं और उसके सहारे वे परम प्रभु परमात्मा के धाम में पहुँचकर परम सुख वा पूर्ण सुख को प्राप्त कर लेते हैं।
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महर्षि हरिनंदन बाबा कुप्पाघाट: https://www.youtube.com/playlist?list=PLud4sU56FoLnOF1jHHnl6Ad-wEtItI_Bs

बुधवार, 22 जून 2022

जून 22, 2022

अंतर अजब बिलास-महर्षि हरिनंदन परमहंस जी महाराज

पूज्य
आचार्य श्री महर्षि हरिनंदन परमहंस जी महाराज का प्रवचन 👇👇👇 पुस्तक 👇👇👇👇👇 -------------:अन्तर अजब बिलास:---------- सभी लोगों को ईश्वर ने बनाया। संसार के सभी जीवों का सृजन करनेवाले भी वे ही हैं। हमें जो कुछ भी चाहिए, उसे देनेवाले भी परमात्मा ही हैं। हम जो कुछ ग्रहण कर रहे हैं- अन्न, जल, हवा- सब कुछ के निर्माता भी वे ही हैं। यह सब परम प्रभु परमात्मा से प्राप्त करके भी हमारी स्थिति क्या है? हम शरीररूपी जेलखाने में पड़े हुए हैं। शरीर और संसार के कैदी बने हुए हैं। आप जैसा चाहते हैं, वैसा हो नहीं पाता। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन होता है, उसी तरह से जीवन में सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख का क्रम लगा हुआ है। दुःख कोई नहीं चाहता, फिर भी वह आता है और उसे हमें भोगना पड़ता है, उसपर हमारा कोई वश नहीं होता। हम जैसा नहीं चाहते हैं, वैसा हो जाता है। ईश्वर-परमात्मा की मौज के सामने किसी की एक नहीं चलती। हम दुःखी होते हैं। ऐसा कबतक होता रहेगा? जबतक हम बंधन में रहेंगे। ईश्वर की जो मौज होगी, उसी के अन्तर्गत हमें रहना पड़ेगा। हमने फूस के छप्परवाले मकान बनाये, सोचा उसी में गुजर-बसर होगी, आँधी आयी और छप्पर उड़ गया, कच्चा मकान ढह गया। खेत-बगीचों में अच्छी फसल लगायी, पत्थर (ओले) गिरे और सारी फसल बर्बाद हो गयी। जैसा नहीं चाहते थे, वैसा हो गया। हम स्वाभाविक रूप से दुःखी हुए। ऐसा तबतक होता रहेगा, जबतक संसार में रहेंगे; क्योंकि संसार में एकरूपता नहीं रहती। आप चाहें कि दिन ही हो, रात न हो, तो यह संभव नहीं है। दिन हुआ है, तो रात भी होगी ही; सुख मिला है, तो दुःख होगा ही। यह संसार का नियम है। सुख में हम हर्षित होते हैं और दुःख में विलाप करते हैं। गो० तुलसीदासजी महाराज ने लिखा है- जड़ हरषहिं सुख दुख बिलखाहीं। दोऊ सम धीर धरे मन माहीं ॥ यह सुख-दुःख सबके जीवन में आते हैं। ये दिन-रात की तरह जीवन में साथ लगे रहते हैं। सामान्य मनुष्य ही नहीं, शरीर धारण करके जब-जब भगवान भी इस पृथ्वी पर अवतरित हुए, उन्हें भी दारुण दुःख झेलने पड़े। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने राजसी सुख प्राप्त किया, तो वनवास का दुःख और पत्नी वियोग की पीड़ा भी सही, सम्राज्ञी सीताजी को वन-वन भटकना पड़ा और लक्ष्मणजी ने शक्तिवाण की मर्मतुद पीड़ा भोगी । द्वापर में पाण्डवों ने बारह वर्षों के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास में कौन-सी पीड़ा न भोगी होगी। राज-सुख में रहनेवाले पाण्डवों ने कितना कष्ट झेला होगा, यह अकल्पनीय है। राजा नल भी द्यूतक्रीड़ा में अपना राज-पाट सव हार गये। उन्हें भी अपनी पत्नी के साथ एक धोती में जंगलों की खाक छाननी पड़ी। कितनी विपदा उन्होंने वनवास में सही, ठिकाना नहीं। जंगल में पति-पत्नी दुर्योग से राह भटक गये और अलग-अलग हो गये। कहाँ राज सुख और कहाँ यह दुर्दशा! वे वर्षों बाद मिले। वर्षों बाद उन्हें अपना राज्य भी पुनः प्राप्त हुआ। महाभारत में इसकी लंबी कथा है। अतीव सुख में रहनेवाले बड़े लोगों के जीवन में जब दुःख आते हैं, तो वे दुःख भी बड़े होते हैं। साधारण लोग ऐसी विपदाएँ, ऐसे दुःख को सह नहीं सकते। जीवन में हमेशा एक-सी स्थिति नहीं रहती सूरदासजी महाराज ने लिखा है संपति विपति विपति सों संपति, देह धरे को यहै सुभाई। शरीर धारण करने का यही स्वभाव है। सबके जीवन में ऐसा होता है। सुख-दुःख की आँख-मिचौनी से हम बच नहीं सकते, भाग नहीं सकते। कहाँ भागेंगे? संसार और शरीर दोनों ही कैदखाने हैं। हम तो स्वयं शरीररूपी कैदखाने को ढोते फिरते हैं। मृत्यु की मार झेलकर फिर इसी कैदखाने में आ जाते हैं, संसाररूपी कैदखाने में पहुँच जाते हैं। इससे छूट नहीं पाते, जिसमें दैविक, दैहिक और भौतिक-त्रय ताप लगे ही रहते हैं। ईश्वरीय कोप से उपजता है दैविक ताप। रोग-व्याधि से क्लांत हुए शरीर को दैहिक ताप सताता है। एक जीव द्वारा दूसरे जीव को पहुँचनेवाला कष्ट भौतिक ताप कहलाता है। इन त्रय तापों के अलावा एक ताप और है, जिसे झेलने के लिए मनुष्य अभिशप्त है, वह है- मानसिक ताप । काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सर, द्वेष, छल, कपट, पाखंड से उत्पन्न पीड़ा मानसिक ताप देती है। इस ताप से चित्त हमेशा अशांत और व्यथित रहता है। यह सब तबतक होता रहेगा, जबतक हम शरीर और संसार के बंधन में बँधे रहेंगे। प्रश्न उठता है कि इन बंधनों से हम कैसे छूटें? गो० तुलसीदासजी महाराज ने बताया है गुरु बिनु भवनिधि तरै न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥ ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देव ही क्यों न हों, गुरु की कृपा के बिना कोई भी संसार-सागर के पार नहीं उतर सकता। यही सहजोवाई भी कहती हैं हरि ने जन्म दियो जग माहीं। गुरु ने आवागमन छुटाहीं ॥ अर्थात् ईश्वर ने हमें यह मानव-शरीर तो दिया लेकिन बारंबार जन्म-मरण का अपार दुःख सहना पड़ता है, उस दुःख से छुटकारा दिलानेवाले गुरु ही होते हैं। हरि ने पाँच चोर दिये साथा। गुरु ने लई छुटाय अनाथा ॥ ये पाँच चोर हमारी पाँच ज्ञान-इन्द्रियाँ हैं। इनको ही चोर कहा। इसलिए कि इन्हें जो ग्रहण नहीं करना चाहिए, जिसे ग्रहण करके अन्त में दुःख ही दुःख होता है, ये उसे ही ग्रहण करती हैं, उसी दिशा में जाती हैं। आँखें रूप, कान शब्द, नाक गन्ध, जिह्वा रस और त्वचा स्पर्श ग्रहण की ओर हमेशा प्रवृत्त रहती हैं। इन पाँचों ज्ञान-इन्द्रियों की इस प्रवृत्ति से होता क्या है? हमलोग रोज पाठ करते हैं- 'मृगवारि सम सबहीं प्रपञ्चन्ह, विषय सब दुखरूप हैं।' उस ओर जाकर ये इन्द्रियाँ केवल दुःख ही दुःख का कारण बनती हैं; फिर भी ये बारंबार उधर ही उन्मुख रहती हैं। शरीर की ये पाँचो इन्द्रियाँ पाँच चोर हैं-'हरि ने पाँच चोर दिये साथा। गुरु ने लई छुटाय अनाथा ॥' गुरु इनसे छूटने का यत्न बतलाते हैं, ताकि ये इन्द्रियाँ उन विषयों की ओर नहीं जायें। आँख में चेतनधार आती है, तब आँख इन्द्रिय देखती है बाहर की ओर। कहते हैं, इस तरह से साधन करो कि चेतनवृत्ति का सिमटाव हो जाय। अगर आँख में चेतन-धार न आये, तो आँख इन्द्रिय बाहरी विषय की ओर प्रवृत्त नहीं होगी। विषयों से प्राप्त सुख क्षण-भर में दुःख में परिवर्तित हो जाता है। जैसे किसी प्रिय जन के आगमन की प्रसन्नता (आँखों द्वारा देख लेने का हर्ष), उसकी पीड़ा जानकर तत्काल दुःख में बदल जाती है। पुत्र की प्राप्ति पर अपार सुख हुआ; किन्तु उसकी मृत्यु हो गई, तो उतनी ही भीषण पीड़ा हो गयी। कहाँ रहा सुख? तो सब विषय दुःख रूप हैं। इस तरह इन्द्रियों से प्राप्त सुख उसकी समाप्ति पर दुःख में बदल जाते हैं। अतः इन्द्रियों से होनेवाले सुख में दुःख भी लगा हुआ है। इन्द्रियों के माध्यम से जिस ओर जाकर सुख ही नहीं, दुःख भी हो जाता है, उस ओर से इन्द्रियों को लौटाना चाहिए। जो नहीं देखना चाहिए, जो ग्रहण नहीं करना चाहिए, उसे ही इन्द्रियाँ देखना और ग्रहण करना चाहती हैं; इसीलिए उन्हें चोर कहा गया है। गुरु ही इसका भेद बतला सकते हैं कि इन्द्रियों की तृष्णा से कैसे छूटा जा सकता है। ऐसा विलक्षण ज्ञान देनेवाले गुरु हैं 'हरि ने रोग भोग उरझायौ, गुरु जोगी कर सबै छुटायौ ।' संसार में रहकर रोग, भोग, भय सब कुछ होता है, गुरु ही इससे छूटने का उपाय बतलाते हैं। सहजोबाई कहती हैं- राम तजूँ पै गुरु न बिसाऊँ।' सहजोबाई के गुरु थे चरणदासजी महाराज। उनकी वाणी में हमलोगों ने सुना है गुरु बिन और न जान, मान मेरो कहो। चरण दास उपदेश, विचारत ही रहो ॥ कहते हैं, गुरु के समान और कोई नहीं। उन्होंने कारण वेद रूप गुरु होहिं, कि कथा सुनावहीं। बतलाया पंडित को धरि रूप, कि अर्थ बतावहीं ॥ वेदों में बहुत तरह की बातें हैं। गुरु भी ज्ञानस्वरूप होते हैं। वे वेद के समान ज्ञान की बातों को कहते जाते हैं, विविध कथाएँ, उपदेश वे सुनाते हैं, समझाते हैं। वेद को पढ़कर सब कोई उसके रहस्य को समझ नहीं पाते, पंडित (ज्ञानी) ही उसके अर्थ को समझा पाते हैं, वैसे ही गुरु भी ज्ञान की गूढ़ बातों को, संतों के कथनों को, उनके रहस्य को बतला समझा देते हैं। कल्पवृक्ष गुरुदेव मनोरथ सब सरौं । कामधेनु गुरुदेव छुधा तृस्ना हरें ।। जिस तरह कल्पवृक्ष के नीचे जाने से सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और कामधेनु के द्वारा सब तरह का भोजन प्राप्त होता है, ठीक वैसे ही गुरु की शरण में जानेवाले की सभी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं। जो गुरु को सदा याद रखते हैं, वे गुरु की शरण में हैं। जौं गुरु बसै बनारसी, शिष्य समुंदर तीर। एक पलक बिसरै नहीं, जो गुण होय शरीर॥ गुरु का शरीर चाहे दूर हो; परन्तु जो मन को गुरु के पास रखते हैं, समझिये कि वे गुरुरूपी कल्पवृक्ष की छाया में हैं। उनके मन में जो इच्छा होगी, वह पूर्ण होगी। गुरु की शरण में रहनेवाले को कोई कमी नहीं होती। गुरु सब कुछ देनेवाले हैं। जिन लोगों ने गुरु महाराज को प्रत्यक्षतः देखा है, उन्हें स्मरण होगा कि भक्त और श्रद्धालु जन नाना प्रकार की चीजें उनके लिए ले आते थे और वे चाहते थे कि उनके अर्जन में से थोड़ा-कुछ गुरुदेव की सेवा में लगे । ऐसे श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित चीजों कि संख्या इतनी अधिक होती थी कि गुरु महाराज के सेवक ही नहीं, उनके आस-पास के लोग भी तृप्त हो जाते थे। ऐसा कुछ भी नहीं था, जो उनको अलभ्य हो । राजा-महाराजा को भी जो दुर्लभ होता है, वह सन्तों के पास परमात्मा की दया से सहज ही आता है। गुरु सब कुछ देनेवाले होते हैं। अनेक देवताओं की कृपा से जो प्राप्त हो सकता है, उसे गुरुदेव अकेले ही देनेवाले हैं। गंगा सम गुरु होय, पाप सब धोवहीं । सूरज सम गुरु होय, तिमिर हरि लेवहिं ॥ गंगा के लिए कहा गया है कि वह पाप धोनेवाली है। बाहर की गंगा में स्नान करके कोई पाप मुक्त हो जाये, ऐसा नहीं होता। जो गुरु की शरण में पड़े रहते हैं, वे पापों से मुक्त हो जाते हैं। तो फिर गंगा का उदाहरण क्यों दिया गया? संत लोग कहते हैं कि 'बाहर में जो आप गंगा देखते हैं, सिर्फ वही गंगा नहीं है। गंगा अवश्य पाप धोनेवाली है; लेकिन वह कौन-सी गंगा है? 'गगन धार गंगा बहै, कहैं संत सुजाना हो।' अपने अन्दर में जो गंगा है, वही असली गंगा है। उस गंगा में जो स्नान करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। सन्तों ने आन्तरिक ज्योति और नादरूपी गंगा का उदाहरण दिया है। गुरु भी गंगा के समान सब पापों को धोनेवाले हैं। और 'सूरज सम गुरु होय, तिमिर हरि लेवहीं।' रात्रि का अंधकार दूर करने की सामर्थ्य किसे है? यह सामर्थ्य एकमात्र सूर्य में है, किसी और में नहीं। ठीक उसी तरह अज्ञान का जो घनान्धकार है, उसे दूर करने की सामर्थ्य सिर्फ गुरुदेव में है। गुरु महाराज कहते हैं-'तन-मन और धन को अर्पित करके गुरु चरणों की सेवा करो।' हम आसक्त होकर नहीं रहें-न तन में आसक्ति, न धन की आसक्ति और न मन में अहंकार की भावना। आसक्ति तजकर और सब कुछ गुरु के चरणों में अर्पित करके उनकी सेवा करें। गुरु महाराज की वाणी में आया है तन मन धन को अरपि, गुरूपद सेव करो। 'मेँहीँ' आज्ञा पालि, दुस्तर भव सुख से तरो ॥ वे कहते हैं कि अगर ऐसा करोगे, तो यह जो दुस्तर है, बड़ा भयंकर है, उसे सुख से तर जाओगे, पार कर जाओगे। जब अर्पित करेंगे तन, मन, धन को, तब गुरुदेव इस संसार सागर से पार कर देंगे, जिस संसार के लिए संत राधास्वामी ने कहा है कि भवसागर धारा अगम, खेवटिया गुरु पूर। नाव बनाई शब्द की, चढ़ बैठे कोइ सूर॥ यह संसार-सागर बड़ा भयंकर है। इसे कोई अपने आप तर नहीं सकता। अपना कोई बल नहीं, शक्ति नहीं, सामर्थ्य नहीं कि भवसागर को पार कर सकें। इसीलिए तो हमलोग रोज प्रार्थना करते हैं कि 'पर निज बल कछु नाहिं है, जेहि बने कमाई ।' गुरुदेव ही पार लगानेवाले होते हैं। कैसे पार लगायेंगे? जैसे हम विपत्ति में पड़ जाते हैं,तो लोगों को पुकारते हैं, लोग आते हैं और सहायता कर देते हैं। किसी का पाँव कीचड़ में फँस गया, उसने आवाज दी और लोगों ने उसे संकट से उबार लिया। उसी तरह से हम संसार सागर में, भव-पंक में धँसे हुए हैं। यहाँ लोगों को पुकारने से सहायता नहीं मिलेगी; क्योंकि संसार के समस्त जीव तो इसी पंक में धँसे हुए हैं। सन्त सद्गुरु ही हमारी पुकार सुनकर सहायता कर सकते हैं, वे ही संसार-सागर से, भव-पंक से जीव का उद्धार करनेवाले हैं। गुरु महाराज की वाणी का जो पाठ हुआ कि 'तुम साहब रहमान हो, रहम करो सरकार। भवसागर में हौं पड़ो, खेइ उतारो पार॥' 'रहमान कहते हैं, बहुत कृपा करनेवाले को, बहुत दया करनेवाले को। गुरु रहमान हैं, दयालु हैं, वे ही अनुग्रह करके इस संसार समुद्र से पार करनेवाले हैं। सूरदासजी महाराज भी कहते हैं- 'नीर अति गंभीर माया, लोभ लहरि तरंग।' वे संसार-सागर से उबारने के लिए प्रार्थना करते हैं अबके माधव मोहि उधारि । मगन हौं भव अंबु निधि में, कृपासिंधु मुरारि ॥ वे कहते हैं- 'मैं तो अज्ञानता के कारण इस भव-सागर में आ पड़ा हूँ और इसी में मग्न हूँ। आप कृपासिंधु हैं, दया करके हे माधव! मुझे उबारिये। इस संसार समुद्र में मायारूपी जल भरा हुआ है। संसार समुद्र का लंघन मेरे वश की बात नहीं है।' 'नीर अति गंभीर माया' - माया रूपी जल अगाध है, इसे पार करना संभव नहीं है। जो इसमें आ पड़ता है, इसे ही सत्य समझने लगता है और इसी में रमा रहता है। 'लिये जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग।' यह लोभ हमें खींचते हुए अगाध जल में लिये जा रहा है, जिसमें 'गहे ग्राह अनंग'। 'अनंग' कहते हैं कामदेव को काम की इच्छा को । इस अगाध जल में अनंग है, जिसने हमें पकड़ रखा है। 'मीन इन्द्रिय अतिहि काटत, मोह अघ सिर भार।' इन्द्रियरूपी मछलियाँ हमें काटती हैं, जैसे बच्चा भूख लगने पर माता को काटता-नोचता है, ठीक उसी तरह इन्द्रियाँ भी अपने-अपने भोग के लिए हमें पीड़ित करती हैं। आँख सुन्दर रूप देखना चाहती है, कान अच्छा शब्द सुनना चाहता है, नासिका सुगन्ध चाहती है, जिह्वा अच्छा रस चाहती है और त्वचा स्पर्श-सुख के लिए लालायित रहती है, जिस ओर जाकर दुःख ही दुःख होता है। सन्त राधास्वामीजी महाराज कहते हैं हे इन्द्रियन तुम भोग दिवानी, क्यों फँसो काल की फाँस । हे इन्द्रियो ! तुम भोग की ओर जा तो रही हो; लेकिन उस ओर जाने से काल के फंदे में फँसोगी। जैसे मछली चारे के लोभ में वंशी में फँस जाती है, उसी तरह तुम भी फँस जाओगी। जल्दी से अब मुख को मोड़ो, अंतर अजब विलास । जैसे बने तैसे करो कमाई, धर चरनन विश्वास ॥ वे कहते हैं कि बाहर से अपने मुख (वृत्ति, ख्याल) को मोड़ो। तुम्हारे अन्दर में अद्भुत सुख है- 'अन्तर अजब विलास'। जिस तरह से हो सके, कमाई करो; अपने अन्दर का वह धन प्राप्त करो, जो परम सुख देनेवाला है। इस कमाई को करने का ज्ञान देनेवाले संत सद्गुरु ही हैं, अन्य किसी से यह ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। गुरु महाराज की वाणी के अन्तिम चरण में हमने अभी-अभी सुना है- 'गुरु की अमित बलिहार।' सत्य है कि गुरु की महिमा अपरंपार है, उनसे बड़ा अपना कोई हितैषी नहीं है। अतः हमें चाहिए कि गुरु की शरण ग्रहण करें। उनके चरणों में अटल श्रद्धा रखें। हमारा मन भाग-भाग जाता है। इस चंचल और भाग-भाग जानेवाले मन के लिए सन्त कबीर साहब ने कहा है सिपाही मन दूर खेलन मत जैये । दूर खेलन से मनुवाँ दुखित होय... हमारा मन संसार की ओर भाग जाता है, बाहरी बातों को सोचने लग जाता है। गुरु महाराज के निकट रहकर भी दूर-दूर चला जाता है। संत कबीर साहब यही कहते हैं कि मन को दूर ले जाओगे, विषयों की ओर ले जाओगे, तो दुःख होगा। बाहर की ओर मत जाओ। अपने आपको बाहर से मोड़कर अन्दर की ओर करो, तब शाश्वत सुख की प्राप्ति होगी, शांति की प्राप्ति होगी। यह तब होगा, जब हम गुरु महाराज के चरणाश्रित होकर रहेंगे। जबतक उनके चरणाश्रित होकर नहीं रहेंगे, अपने अन्दर के सुख की प्राप्ति नहीं होगी। 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 कमेंट जरुर करें वीडियो प्रवचन 👇👇👇 https://www.youtube.com/playlist?list=PLud4sU56FoLnOF1jHHnl6Ad-wEtItI_Bs

मंगलवार, 30 मार्च 2021

मार्च 30, 2021

सर्प की दयालुता

-:सर्प ने अपनी दयालुता का ऋण चुकाया:-
कुछ ग्रामीण एक साँप को मार रहे थे, 
तभी वहाँ से गुजर रहे संत एकनाथ बोले, 'भाइयो! इसे क्यों मार रहे
हो? कर्मवश साँप होने से क्या, यह भी आत्मा ही तो है। एक युवक ने कहा, 'आत्मा है तो फिर काटता क्यों है?'
एकनाथ ने कहा, 'तुमलोग सर्प को न मारो, तो वह तुम्हें क्यों काटेगा?' 
लोगों ने एकनाथ के कहने पर सर्प को छोड़
दिया। कुछ दिन बाद एकनाथ अँधेरे में स्नान करने जा रहे थे। तभी उन्हें सामने फन फैलाए खड़ा वहीं सर्प दिखाई
दिया।
 उन्होंने उसे बहुत हटाना चाहा, पर वह टस-से-मस नहीं हुआ। 
एकनाथ मुड़कर दूसरे घाट पर स्नान करने चले
गये। उजाला होने पर लौटे, तो देखा कि बरसात के कारण वहाँ एक गहरा गड्ढा हो गया था।
 सर्प ने न बचाया होता,
तो एकनाथ उस गड्ढे में गिर जाते। 
इस तरह उस सर्प ने अपने प्रति दयालुता का ऋण चुकाया।

सोमवार, 29 मार्च 2021

मार्च 29, 2021

सही क्षेत्र चुनने पर सफलता मिलेगी

-:सफलता अवश्य मिलती है
सही क्षेत्र चुनने पर व्यक्ति
का:-


नेपोलियन जीवन में सफलता और यश-सम्मान चाहता
था। उसे लगा कि साहित्य रचने से ऐसा हो पाना
संभव है। उसने ८ वर्षों तक लेखन कार्य किया, पर उसे अपेक्षित सफलता न मिल सकी। तब उसने अन्य क्षेत्रों में
अपना भाग्य आजमाने का निश्चय किया। वह सेना में सैनिक के रूप में भर्ती हुआ और वहाँ अपनी क्षमताओं को
बढ़ाने में लग गया। बढ़ते-बढ़ते एक दिन वह देश के एक प्रसिद्ध शासक के रूप में विख्यात हुआ। अपनी क्षमताओं
को पहचानने और उनका विकास करने से किसी भी व्यक्ति के द्वारा एसो ही प्रगति संभव है। किसी भी क्षेत्र में
असफलता मिलने पर निराश होकर बैठने से बेहतर है कि अन्य क्षेत्रों में प्रयोग किये जाएँ। सही क्षेत्र चुनने पर व्यक्ति
को सफलता अवश्य मिलती है

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

सितंबर 17, 2020

सदगुरू महर्षि मेंहीं परमहंस:मछली की देह अधिक पवित्र या तुम्हारी देह


 Maharshi mehi paramhans ji maharaj ki vani 

बीसवीं सदी के महान संत 

सतगुरु महर्षि मेंहीं  परमहंस जी 

महाराज की वाणी को पढें

 शांति की अनुभूति होगी और

 सत्संगी बंधुओं को लाभ मिल सके

 इसलिए शेयर करें ।।

आइये नीचे दिया गया है ।👇👇


🙏🙏।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।🙏🙏

*बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। 

महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।

धर्मानुरागिनी प्यारी जनता!

जितने लोग हैं, सब डर से काम करते हैं।

 किसान को होता है कि खेती का काम जिस-जिस समय में जो-जो होता है,

 उस-उस समय में काम नहीं करने से खेत नहीं उपजेगा। अन्न के लिए वस्त्र के लिए दुःख होगा, किसान को डर है। 

लोग कहते हैं कि वह स्वतंत्र है, किंतु नहीं, पेट का नौकर है।



ठीक समय पर खेती का काम नहीं करने से उसको दुःख होगा, इसी डर से धूप में खेती करता है, पानी में सड़-सड़कर काम करता है।

नौकरीवाले को अपने से ऊपर के हाकिम का डर रहता है कि ठीक से काम नहीं करने से नौकरी से अलग न कर देवे, ऊँचे से नीचे पद पर न दे देवे। 

लड़के को पिता का डर रहता है, शिक्षक या मौलवी साहब का डर रहता है

 कि नहीं पढ़ेंगे, तो ये लोग मारेंगे। 

बड़े होने पर जानते हैं कि ठीक से नहीं पढ़ने पर परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं होंगे, लज्जा होगी। 

किन्तु इसके साथ-साथ यह भी जानना चाहिए कि 

यह शरीर अवश्य छूटेगा, चाहे कब्र में गड़े या चिता में जले।

इसी के लिए संत कबीर साहब कहते हैं - ‘यह शरीर जल के बुदबुदे (बुलबुले) के समान है। बच्चे मर गए, जवान मर गए, बूढ़े मर गए। बूढ़े देह से मरते हैं, किंतु उनका मन नहीं मरता।

निधड़क बैठा नाम बिनु, चेति न करै पुकार।

 यह तन जल का बुदबुदा, बिनसत नाहीं बार।। 

आज कहै मैं काल्ह भजूँगा, काल्ह कहै फिर काल।

 आज काल्ह के करत ही, औसर जासी चाल।। 

काल करै सो आज कर, आज करै से अब्ब। पल में परलै होयगा, बहुरि करैगा कब्ब।।

इससे शरीर भी बिगड़ जाता है और धर्म भी बिगड़ जाता है, 

धर्म के बिगड़ने से दुनिया में भी हँसी होती है और दुनिया छोड़ने पर नरक जाना पड़ता है।

साधु-संत जो भोजन करने के लिए बतायें, वह भोजन करो। जितना भोजन ठीक-ठीक पच जाय, उतना भोजन करो। 


जीभ-स्वाद के लिए धर्म का नाश मत करो। जीभ का स्वाद क्या है?

 वह तो आदत है, उसको अच्छा लगता है, किन्तु जो नहीं खाता, उसे पसन्द नहीं होता।

हमारे यहाँ दो धर्म हैं - एक धर्म में मांस-मछली नहीं खाने की बात है और दूसरे धर्म में मांस-मछली खाने की बात है। 

मांस-मछली खाने में कोई दोष भी लगा सकता है, किंतु नहीं खाने में कोई दोष नहीं लगा सकता।

 इसलिए जिसमें दोष नहीं लगावे, वही अच्छा है। जो लोग मांस-मछली नहीं खाते हैं, उनको दूसरे लोग जो मांस-मछली खाते हैं,

 नहीं कहते कि तुम नहीं खाते हो, इसलिए तुमको दोष लगेगा; बल्कि जो नहीं खाता है,

 वह उसे जो मांस-मछली खाता है, कहता है कि तुमको दोष लगेगा। उसको अधर्मी कहता है। 

खानेवाले को एक अच्छा कहता है, दूसरा अच्छा नहीं कहता। इसके लिए जिसको अच्छा नहीं लगता, क्यों खाया जाय? 

मुसलमानों के धर्म में है कि जबतक शगल (साधनाभ्यास) करते रहो, कोई चिकनी चीज नहीं खाओ। मांस-मछली नहीं खाओ। 


शगल करना एक दो दिन की बात नहीं है।

 शगल करते-करते सालों लग जाते हैं। जो साल-साल, कई सालों तक नहीं खाएगा, उससे फिर आप ही वह खाना छूट जाएगा।

 इस तरह उसमें भी मांस-मछली आदि का खाना मना है।

मछली की देह अधिक पवित्र है या तुम्हारी देह? चिड़िया की देह मनुष्य देह से उत्तम नहीं है। इसलिए 

अपने से नीच शरीर के मांस को अपनी ऊँची और पवित्र देह में डालना ठीक नहीं।

हमा आस्त = सब वही है। हमा अज आस्त = सब उससे है। सब वही है - यह अद्वैतवाद है। सब उससे है - इसमें द्वैतवाद है। हमलोगों के यहाँ अद्वैतवाद है, उसमें है - एक वही है।

मंसूर ने ‘अनलहक' कहा था।

जब दिल मिला दयाल से, तब कछु अंतर नाहिं। 

पाला गलि पानी मिला, यों हरिजन हरि माहिं।।

 - कबीर साहब

जैसे पाला गलकर पानी हो जाता है, उसी प्रकार ईश्वर से मिल जाने पर एक ही हो जाता है।


 संत कबीर साहब ने कहा -

बुन्द समानी समुँद में , यह जानै सब कोय।

 समुँद समाना बुन्द में, बूझै बिरला कोय।। 

निरबन्धन बन्धा रहै, बन्धा निरबन्ध होय।

 करम करै करता नहीं, दास कहावै सोय।।

झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार; इन पाँचों पापों को नहीं करने का बंधन रखो।

 एक ईश्वर पर विश्वास, उसकी प्राप्ति अपने अंदर होगी - इसका दृढ़ निश्चय रखना, गुरु-सेवा, सत्संग और ध्यान; इन पाँचों को करने का बंधन रखो।

कोटि कोटि तीरथ करै, कोटि कोटि करि धाम।

 जब लग संत न सेवई, तब लग सरै न काम।। 

जहँ आपा तहँ आपदा, जहँ संसय तहँ सोग।

 कह कबीर कैसे मिटे, चारो दीरघ रोगा।। 

अहं अग्नि हिरदे जरै, गुरु से चाहै मान। 

तिनको जम न्योता दिया, हो हमरे मेहमान।।

 -  संत कबीर साहब

🙏🙏🌷श्री सद्गुरु महाराज की जय🌷🌷🙏🙏


रविवार, 5 जुलाई 2020

जुलाई 05, 2020

संतसेवी जी महाराज का प्रवचन:गुरु पूर्णिमा पर विशेष


🙏🙏🏻गुरुपूर्णिमा की हार्दिक शुभ कामनाएँ🙏🏻🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
गुरुपूर्णिमा विशेष🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏श्री सदगुरु महाराज की जय 🙏🙏🙏🙏

"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देव: महेश्वर: |
गुरु: साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:||"

        यद्यपि आज रविवार है, तथापि विचारकर देखने से हमलोगों के लिए महामंगलवार है; क्योंकि गुरुवार है | गुरुवार यानी गुरु का दिन, गुरु-पूनम, गुरु-पूर्णिमा अर्थात गुरु-पुजन का पावनतम दिन |
 यों तो गुरुभक्तों के लिए गुरु-पूजन के सभी दिन पावन ही होते हैं;किन्तु आज की तिथि अपनी विशेष महत्ता रखती है|
                      आज महर्षि व्यासदेवजी की जन्मतिथि है | वे गुणवान्, विद्वान, शीलवान, बुद्धिमान, ज्ञानी, ध्यानी, तपस्वी, तेजस्वी, मनस्वी, अोजस्वी, यशस्वी, वर्चस्वी, त्यागी, विरागी तथा ईश्वरानुरागी थे | समासरूप में वे सभी सद्गुणों से सम्पन्न थे | उनका यथार्थ में नाम था - कृष्ण-द्वयपायन | वे पराशर मुनि के पुत्र थे | उन्होंने वेदों का विभाग और संपादन किया था | कहा जाता है कि अठारहो पुराण, महाभारत, भागवत और वेदांत आदि की भी रचना उन्होंने ही की | वे ईरान भी गए थे | वहाँ के विद्वानों से शास्त्रार्थ होने पर वे विजयी हुए थे | इन कतिपय कारणों से उनको जगद्गुरु की संज्ञा दी गई |

                जैसे सुर-गुरु बृहस्पतिजी के नाम पर बृहस्पतिवार को गुरुवार कहा जाने लगा, उसी भाँति जगद्गुरुजी का जन्म आषाढ़-पुर्णिमा को होने के कारण उसको गुरु-पुर्णिमा कहकर अभिहित किया गया | जगद्गुरु होने के कारण स्मृति के रूप में लोग उनकी जयंती मनाते हैं तथा इस अवसर पर गुरु-भक्तगण अपने-अपने गुरु का पुजन, अर्चन, वन्दन आदि किया करते हैं |

गुरु की महत्ता, वक्ता की वाणी का अथवा लेखक की लेखनी का विषय नहीं |
     यह स्वभावत: सिद्ध है कि  भौतिक अथवा आध्यात्मिक, कोई भी काम बिना गुरु के सुसंपन्न नहीं हो सकता | इस दृष्टि से भी गुरु का स्थान विशिष्ट होना स्वाभाविक है | 

गुरु की विशेषता की बातें :-
 संत सुन्दरदासजी की सुन्दर वाणी --
"गुरु बिना ज्ञान नहिं, गुरु बिन ध्यान नहिं,...
गुरु बिन बाट नहिं, कौड़ी बिन हाट नहिं,
सुन्दर प्रकट लोक, वेद यों कहतु हैं |

कविकुलकमलदिवाकर गोस्वामी जी की वाणी ---
"बिनु गुरु होइ कि ज्ञान, ज्ञान कि होइ बिराग बिनु |
गावहिँ वेद पुरान, सुख कि सहित हरि भगति बिनु ||"

संत कबीर साहेब ने कहा है --
"गुरु नाम है ज्ञान का, सिष्य सीख ले सोइ |
ज्ञान मरजाद जाने बिना, गुरु अरु सिष्य न कोई ||"

भगवान श्रीराम ने उपदेश और आदेश दिये ---
"नरतन भव बारिधि कहाँ बेरो |
         सन्मुख मरूत अनुग्रह मेरो ||
करनधार सदगुरु दृढ़ नावा |
          दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ||"

योगशिखोपनिषद् में कहा गया है ---
"कर्णधारं गुरुं प्राप्य तदवाक्यं प्लववदृढम् |
अभ्यासवासना शक्त्या तरन्ति भवसागरम् ||"

           अर्थात् गुरु को कर्णधार (मल्लाह) पाकर और उनके वाक्य को दृढ़ नौका पाकर अभ्यास वासना की शक्ति से भव-सागर को लोग पार करते हैं |

संत चरणदासजी की दृष्टि में ---
"पितु सूँ माता सौ गुना, सुत को राखै प्यार |
मन सेती सेवन करै, तन सूँ डाँट अरु गार ||
माता सूँ हरि सौ गुना, जिनसे सौ गुरुदेव |
प्यार करैं औगुण हरैं, चरणदास शुकदेव ||"

सरलह्रदया सहजोबाई की वाणी ---
"हरि ने मो सूँ आप छिपायौ |
  गुरु दीपक दे ताहि दिखायौ ||"

और हमारे गुरुदेव (महर्षि मेँहीँ) कहते हैं ---
 हरदम प्रभु रहैं संग, कबहुँ भव दुख न टरै |
भव-दुख गुरु दें टारि, सकल जय जयति करै ||

गुरुदेव के आदेश का पूर्ण रूप से पालन करना ही गुरु-पूर्णिमा का पूर्णरूपेण पर्व मनाना है | अतएव जितने अंश में हम उनकी आज्ञा का पालन कर पाएँगे, उतने ही अंश में इस त्योहार का मनाना माना जा सकेगा |
जिस दिन हम उनके निर्देश का पूर्णरूप से पालन कर सकेंगे, यथार्थ में वही गुरु-पूर्णिमा का पावनतम पर्व होगा |
            संत सदगुरु के विमल वचन को अमल में लाकर हम अपने को निर्मल बनावें | वस्तुतः यह लोक या परलोक, कहीं भी गुरु के समान और दूसरा उपकारी नहीं हो सकता |

गुरु-पूर्णिमा पूर्ण गुरु का परिचायक है और यह पूरे गुरु की यकद दिलाता है।
जीवन्मुक्त परम् संत पुरुष पूरे और सच्चे सद्गुरु  कहे जाते हैं।
ऐसे पूरे और पहुँचे हुए सद्गुरु कक मिलना परम् प्रभु सर्वेश्वर के मिलने के तुल्य है।

गुरुदेव के आदेश का पूर्णरूपेण से पालन करना ही गुरु-पूर्णिमा का पूर्णरूपेण पर्व मनाना है।
अतएव जितने अंश में हम उनकी आज्ञा का पालन कर पाएँगे, उतने ही अंश में  इस त्योहार का मनाना माना जा सकेगा।
जिस दिन हम उनके निर्देशन का पुर्णरूप से पालन कर सकेंगे, यथार्थ में वही गुरू-पर्णिमा का पावनतम पर्व होगा

गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान बताया गया है क्यों? इसलिए कि गुरु में तीनों देवों के कार्य करने की क्षमता परिलक्षित होती है।

 दीपक घर के अंदर प्रकश करता है, चंद्रमा रात्रि को आलोक करता है और सूर्य दिन में अपनी किरण विकीर्णित कर बाह्य जगत को प्रकाशित करता है; लेकिन पूरे गुरु अपने शिष्य के अन्तस्तम का निवारण कर उसे प्रकाशपुंज से आपूरित करते हैं।
इतना ही नहीं,वे तीनों लोकों में व्याप्त ब्रह्म की प्राप्ति करा देने में भी सक्षम होते हैं।

 पूर्णिमा की सारी रात  प्रकाशमयी होती है, उसी तरह पूरे गुरु का लौकिक और लोकोत्तर जीवन प्रकाशपूर्ण होता है।

ऐसे गुरु के संग से शिष्य का जीवन भी प्रकाशमय हो जाता है।
पूरे गुरु का संग करनेवाले का अनंग तंग नहीं करता; क्योंकि वह अभंग रूप में गुरु का अंतरंग भक्त होता है।

गुरु और शिष्य की जो परंपरा है, आदिकाल से चली आ रही है।
जब से सृष्टि है, तब से गुरु हैं, तब से शिष्य है, कोई सीखानेवाले है,कोई सीखने वाला है

आप हाथी को देखते हैं, उसके पैर के चिन्ह में सभी जीवों के पद-चिह्न समा जाते हैं।
उसी तरह एक गुरु पूजा में सबकी पूजा हो जाती है।

गुरु की कृपा के प्रसाद से ही आत्मा का आनंद प्राप्त होता है और अनंत ज्ञान उदित हित है।
 
 

सभी सत्संगी बंधुओं को गुरु पूर्णिमा की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं ।।
सदगुरू महराज से यही  प्रार्थना करता हूँ कि 
हम सब कृपा बनाये रखियेगा।
सतगुरु एक आप ही  सहारा है इस संसार में ।
सत पथ पर अग्रसर होंऊ।

सोमवार, 29 जून 2020

जून 29, 2020

भगवान बुद्ध का उपदेश :जैसा संग वैसा रंग

भगवान बुद्ध के वचन 
भगवान बुद्ध का उपदेश 

भगवान् बुद्ध ने जेतवन में यह कथा भिक्षुओं को ' सुनाई - बहुत दिनों की बात है।

वाराणसी के राजा के यहाँ एक हाथी था।
यों तो राजा के यहाँ हजारों हाथी थे और उनमें बड़े - बड़े डील - डौलवाले गजराज भी थे , और सीखे हुए हाथी भी थे ; किन्तु जिस हाथी की चर्चा की जायगी , वह एक विचित्र हाथी था।
वह अत्यन्त सीधा , सुशील और बुद्धिमान् था।
उस हाथी ने भूलकर भी कभी उपद्रव नहीं किया , न उसने कभी कोई हानि पहुँचायी।
बच्चे उससे खेलते थे और सभी उस हाथी से प्रसन्न रहते थे।
वह सबसे खेलता था मानव और सबको आनन्द पहुँचाता बुरे था।
दूर - दूर तक उसके गुणों की ख्याति थी और राजा उसके आराम का विशेष है , प्रबन्ध रखता था।
वह दूसरे हाथियों से अलग रहता था।
उसके लिए ऋतुओं  के अनुकूल भोजन और आराम का ध्यान रखा जाता था।
एक समय की बात है।
अँधेरी रात थी।
सर्वत्र सन्नाटा था।
हाथी एक घने वृक्ष के नीचे आराम कर रहा था।
उसके महावत दूर पर अपनी कोठरी में सो रहे थे।
घोर निर्जनता थी।
इसी समय चोरों का एक दल कहीं से आया और उस वृक्ष के निकट ही बैठ गया , जिस वृक्ष के नीचे हाथी बँधा हुआ था।
चोरों ने आपस में वार्तालाप आरंभ किया।
एक चोर बोला ' भाइयो , हमे दया , क्षमा आदि के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए।
हमारे सामने इस समय जो भी आ जायेगा , वह हमारा बैरी है।
हम तत्काल उसकी जान ले लेंगे।
यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो वह हमारी जान का ग्राहक बन जायेगा।
दया करना या क्षमा करना भयानक दोष है।
इस बुरी आदत के चलते हम विपत्ति में फंस सकते हैं।
हमें अपनी मजबूत मुट्ठी में भयंकर अस्त्र रखना चाहिये।
 जो भी मुकाबले में आवे , हम तुरन्त उसका खात्मा कर दें।
जिस घर पर हम छापा मारें , वहाँ भी सबसे पहले हमें घरवालों का खुन कर देना चाहिय।
यदि कोई छोटा बच्चा भी रोने लगे तो उसे फौरन दो टुकड़े कर देना चाहिये।
हाथी चोरों वार्तालाप सुनता रहा।
चोर लगातार वहाँ आते - जाते रहे और इसी तरह की चर्चा करते रहे।
कितने कितने खून किये इसकी भी चर्चा होती थी।
हाथी के दिमाग में चोरों का वार्तालाप घरकर गया।
उसका स्वभाव बदल गया।
उसने एक दिन एकाएक उग्ररूप धारण करके महावत का संहार कर दिया।
वह गाँव की ओर दौड़ा।
हाहाकार मच गया।
बहुत - से व्यक्ति मारे गये और कितने घर उजड़ गयेl
लोग उस हाथी से असावधान रहते थे ; क्योंकि वह अत्यन्त सीधा और प्रेमी स्वभाव का था।
इस विश्वास के चलते बहुतों ने धोखा खाया अपनी जान गंवाई या हाथ - पैर तुड़वाये।
राजा ने जब यह संवाद सुना 
तब वह अत्यन्त दु : खित हो गया।
ऐसा सौम्य  और प्यारा हाथी एकाएक इतना भयंकर कैसे हो गया !
राजा कारण का पता लगवाना चाहता था।
वह हाथी को मरवा देने के पक्ष में न था।
उनका मन कहता था कि हाथी निर्दोष है।
किसी - किसी तरह हाथी को बाँधा गया।
पशु चिकित्सक बुलवाये गये।
जाँच से पता चला कि हाथी को कोई रोग नहीं है।
यह और भी आश्चर्य की बात थी जब कोई बीमारी नहीं है तब फिर एकाएक इतना सीधा और प्यारा हाथी ऐसा उद्धत कैसे बन गया।
राजा के दरबार में स्वयं भगवान् बुद्ध ही पूर्व - जन्म में दरबारी थे।
उन्होंने कहा कि यदि महाराज का आदेश हो तो मैं पता लगाने का प्रयत्न करूं कि हाथी का स्वभाव एकाएक कैसे बदल गया ! राजा का आदेश पाकर दरबारी अपनी जाँच का काम आरंभ किया।
उन्हें पता चला कि कुछ चोर नित्य हाथी के निकट के वृक्ष के नीचे आकर बैठते हैं और वे आपस में बातें भी किया करते हैं दरबारी ने छिपकर चोरों की बातें सुनी।
जिसे सामने देखो , उसे मार डालो आदि - आदि।
हमें खून करना चाहिये , दया करना मूर्खता है।
दरबारी समझ गये।
हाथी ने अपने कोमल दिमाग से इसी बातों को ग्रहण किया और वह राक्षस बन गया।
श्रवण शक्ति में कितना बल होता है , कितनी शक्ति होती है ; यह जानकर दरबारी अवाक हो गये।
जब रोज - रोज की बुरी बातों ने हाथी के दिमाग को भी बदल दिया तब फिर मानव की क्या बिसात है?
दरबारी ने पहरेदार बैठाकर चोरों को खदेड़ दिया और वहीं पर कुछ ऐसे आदमियों को रात में बैठाया जो जोर - जोर से बातें करने लगे- हिंसा महापाप है।
क्षमा , दया और प्रेम ईश्वर की देन है।
जीवमात्र पर प्रेम रखना , स्वप्न में भी किसी को पीड़ा न पहुँचाना सबसे बड़ा धर्म है ..... इत्यादि।
हाथी पिछली बातें भूलने लगा और वह इन नई बातों को ध्यान से सुनता हुआ शान्त हो गया।
उसकी भयानकता मिट गयी और कुछ ही दिनों में वह फिर इतना शान्त और प्रेमी बन गया कि नगर निवासी चकित हो गये।
बुरी बातों का असर बहुत ही जोरों से हृदय पर पड़ता है और मानव को राक्षस बना देता है।
बुरे उपदेश कान का विष है।
मुँह से खाया हुआ विष एक ही व्यक्ति का जान लेता है ; किन्तु कानों से जो विष  खाया जाता है वह पूरे के पूरे खानदान समाज या देश को ही मार डालता है।

🙏🙏🙏🙏🏻श्री सद्गुरूवे नमः 🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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भगवान बुद्ध के वचन को पढें और जीवन में उतारने का प्रयास करें और अधिक से अधिक शेयर करें जिससे और सत्संगी बंधुओं को लाभ मिल सके अंत कमेंट्स देना ना भूलियेगा 

सोमवार, 15 जून 2020

जून 15, 2020

स्वामी श्रीधर बाबा का उपदेश

बीसवीं सदी के महान संत सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज के प्रिय और प्रधान शिष्यों में सबसे महत्वपूर्ण से स्वामी श्रीधर जी महाराज का अमृत वचन आज आप लोगों के सामने प्रस्तुत है जो बहुत ही सख्त नियम और कानून कानून को पाबंदी से मानते थे और पालन भी करवाते थे और वह साधना पद्धति में कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे आइए उसका पचोर प्रवचन को पढ़कर जीवन को प्रेरित करने का निश्चय ले👇👇👇

संस्कार ही जीवन है। 
संस्कार ही अगले जीवन को बनाता है। 
मानव-तन पाकर अच्छे गुणों को धारण करें।
 जो ईश्वर के भक्त होना चाहते हैं, उनको गुणग्राही होना चाहिए।
 मोह-जनित जितने भ्रम हैं, सबको सत्संग-भजन करके काट डालें।

           ज्ञान को मजबूत करने के लिए बारंबार सत्संग करना चाहिए। 
अत्यंत प्रेम से सत्संग में लगकर मन की मैल को धोइए।अंतःकरण को निर्मल करने के लिए सत्संग-भजन करना चाहिए। 
भजन करने से मनोविकारों से ऊपर उठ जाते हैं। 
सत्संग करने से कौए के समान कटु बोलनेवाले कोयल के समान मधुर बोलने लगते हैं। 
सत्संग करने से बगुले के समान विषयी आदमी हंस के समान गुणग्राही हो जाते हैं।
 सत्संग पाकर यदि हम नहीं सुधरें, तो बहुत बड़ा अभाग्य है। ज्ञान ही पारस है, मन लोहा है। 
योगी भी बहुत बार जन्म लेते हैं; लेकिन ध्यानाभ्यास करते-करते पापों से मुक्त हो जाते हैं, 
तब किसी पापकर्म में नहीं फंसते हैं, 
जैसा कि वर्णन है -

    बिधिबस सुजन कुसंगति परहीं।
    फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।।

इन सब बातों पर हम सबों को ध्यान देना चाहिए।
 स्वामी श्रीधर जी महाराज का प्रवचन का यह अंश यहां पर समाप्त हुआ अगले अंश लेकर हाजिर होऊंगा तब तक आप इसको पढ़कर मनन करें 
मनन करने के बाद जीवन में उतारने का प्रयास करें श्रीधर जी महाराज ने बहुत ही सरल सरल शब्दों में रहस्यमय ढंग से और जो गुरु महाराज ने बताया था 
उसको अक्षर से पालन किया और पालन करते हुए अपने जीवन को उसी में ढाल लिया 
और गुरु महाराज ने कहा कि जो मैं हूं वह श्रीधर है अर्थात दोनों में कोई अंतर नहीं कहने का भाव हुआ
 कि जिस तरह से हम लोग गाते हैं कि हम प्रभु प्रभु एक ही होए द्वद्व  अरे द्वैत रहे नहीं कोई अर्थात सब एक मेक होकर गए और इसी तरह आप भी हो सकते हैं 
प्रवचन को पढ़कर के जीवन में उतारने का प्रयास करें और सदगुरु महाराज के जो युक्ति है जो मार्ग है जो पद्धति है उसको अगर नियम अनुसार करेंगे श्रद्धापूर्वक करेंगे 
सदाचार का पालन करते हुए करेंगे तो अवश्य ही लोक और परलोक दोनों बदलेगा दोनों सड़ जाएगा और अंत में मोक्ष भी मिलेगा 
इसलिए आप इसी तरह का और भी प्रवचन पढ़ने के लिए नीचे में ढेर सारा प्रवचन गुरु महाराज का है शाही स्वामी का है और संतसेवी बाबा का है आप जाकर के सभी का पढ़ सकते हैं 
और उस का गहन अध्ययन करके मन कर के जीवन में उतारें
 और अपना जीवन को संवारने का प्रयास करें यही मेरा एक सोच है 
और इसी पद्धति के साथ यह सेवा थोड़ा सा करने का प्रयास किया हूं ..
जय गुरु
                         

 

सोमवार, 8 जून 2020

जून 08, 2020

Swami vivekanand speech 4

SWAMI VIVEKANAND SPEECH 
साधारण मनुष्यों में सुषुम्ना निम्नतर छोर में बंद रहती है, उसके माध्यम से कोई कार्य नहीं होता। योगियों का कहना है कि— 
इस सुषुम्ना का द्वार खोलकर उसके माध्यम से स्नायुप्रभाव चलाने की एक निर्दीष्ट साधना है। 
तब उस केंद्र में एक प्रतिक्रिया होती है। स्वयंक्रिय केंद्रों (automatic centres) में उन प्रतिक्रियाओं का फल केवल गति होता है पर सचेतन केंद्रों (conscious centres) में पहले अनुभव और फिर बाद में गति होती है। सारी अनुभुतियाँ बाहर से आयी हुई क्रियाओं की प्रतिक्रिया मात्र है।
 तो फिर स्वप्न में अनुभूति किस तरह होती है? उस समय तो बाहर की कोई क्रिया नहीं रहती।
इसलिए स्पष्ट है कि विषयों के अभिघात से उत्पन्न हुई स्नायविक गतियाँ शरीर के किसी-न-किसी स्थान पर अवश्य अव्यक्त भाव से रहती है।
 उपरोक्त बातों को एक उदाहरण से समझा जा सकता है जैसे— हमलोग किसी एक नगर को देखते हैं। 
नगर नामक बाह्य वस्तु के आघात की जो प्रतिक्रिया है,उसी से उस नगर की अनुभूति होती है अर्थात उस नगर की बाह्य वस्तु द्वारा हमारे अंतर्वाही स्नायुओं में जो गति-विशेष उत्पन्न हुई है 
उससे मस्तिष्क के भीतर के परमाणुओं में एक गति उत्पन्न हो गयी है। आज बहुत दिन बाद भी वह नगर मेरी स्मृति में आता है। 
इस स्मृति में भी ठीक वही व्यापार होता है पर अपेक्षाकृत हल्के रूप में लेकिन जो क्रिया मस्तिष्क के भीतर उस प्रकार मृदुतर कंपन ला देती है वह भला कहाँ से आती है? 
यह तो कभी नहीं कहा जा सकता है कि वह उसी पहले के विषय-अभिगात से उत्पन्न हुई है। 
अतः स्पष्ट है कि — विषय-अभिघात से उत्पन्न गतिप्रवाह या संवेदनाएँ शरीर के किसी स्थान पर कुण्डलीकृत होकर विद्यमान है और उनकी क्रिया के फलस्वरूप ही स्वपन्न अनुभूतीरूप  मृदु प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होती है।
SWAMI VIVEKANAND SPEECH 

जिस केंद्र में विषय-अभिघात से उत्पन्न संवेदनाओं के अवशिष्ट अंश या संस्कार मानो संचित से रहते हैं,उसे मूलाधार कहते हैं और उस कुण्डलिकृत क्रियाशक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं।* हो सकता है गतिशक्तियों का अवशिष्ट अंश भी इसी जगह कुण्डलीकृत होकर संचित है क्योंकि गंभीर अध्ययन और बाह्य वस्तुओं पर मनन के बाद शरीर के जिस स्थान पर मूलाधार चक्र (sacral plexus) अवस्थित है वह तप्त हो जाता है।  अब यदि इस कुण्डलिनी-शक्ति को जगाकर उसे ज्ञात-भाव से सुषुम्ना नली में से प्रभाहित करते हुए एक केंद्र से दूसरे केंद्र को ऊपर लाया जाय,
 तो वह ज्यों-ज्यों विभिन्न केंद्रों पर क्रिया करेगी, त्यों-त्यों प्रबल प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होगी।जब शक्ती बिल्कुल सामान्य अंश किसी स्नायुतंतु के भीतर से प्रवाहित होकर विभिन्न केंद्रों में प्रतिक्रिया करता है तब वही स्वप्न अथवा कल्पना के नाम से अभिहित होता है। लेकिन जब मूलाधार में संचित विपुलाययन शक्तिपुँज दीर्घकालव्यापी तीव्र ध्यान के बल से उद्वुद्ध होकर सुषुम्ना मार्ग में भ्रमण करता है
 और विभिन्न केंद्रों पर आघात करता है तो उस समय एक बड़ी प्रबल प्रतिक्रिया होती है,जो स्वप्न अथवा कल्पनाकालीन प्रतिक्रिया से तो अनंतगुणी श्रेष्ठ है ही, पर जाग्रतकालिन विषयविज्ञान की प्रतिक्रिया से तो अनंतगुणी प्रबल है। यही अतीन्द्रिय अनुभूति है।
   SWAMI VIVEKANAND SPEECH 
जब वह शक्तिपुंज समस्त ज्ञान के समस्त संवेदनाओं के केंद्रस्वरूप मस्तिष्क में पहुँचता है,तब संपूर्ण मस्तिष्क मानो प्रतिक्रिया करता है और इसका फल है ज्ञान का पूर्ण प्रकाश या आत्मसाक्षात्कार। कुण्डलिनी-शक्ति जैसे-जैसे एक केंद्र से दूसरे केंद्र को जाती है
 वैसे-ही-वैसे मन का एक-एक परदा खुलता जाता है और तब योगी इस जगत की सुक्ष्म या कारणरूप में उपलब्धि करते हैं और तभी विषयस्पर्श से उत्पन्न हुई संवेदना और उसकी प्रतिक्रियारूप जो जगत के कारण,उनका यथार्थ स्वरूप हमें ज्ञात हो जाता है।
 उसके बाद हम सारे विषयों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं क्योंकि कारण को जान लेने पर कार्य का ज्ञान निश्चित ही होगा। 
       यह प्रवचन को पढें शांति की अनुभूति होगी और सत्संगी बंधुओं को लाभ मिल सके इसलिए शेयर करें 
  

“O Romeo” Movie Review & Story Breakdown – A Fresh Romantic Drama for Today’s Audience

Indian cinema continues to experiment with youth-centric love stories, and O Romeo is one such film that brings a blend of romance, modern...