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सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

फ़रवरी 24, 2025

बाहर में संत पथ नहीं -महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

जय गुरु आज सभी सत्संगी बांधों के लिए मैं संत सतगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का अमृत वाणी को लेकर आया हूं और उसे आप पढ़ करके आध्यात्मिक उन्नति करेंगे इसलिए इस प्रवचन को जरूर पढ़ें। 🙏🕉️ *जय गुरुदेव* 🕉️🙏 बाहर में संत-पथ नहीं है, अन्दर में है-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज *प्यारे लोगो!* आपलोग पढ़े-सुने होंगे- संत संग अपवर्ग कर, कामी भव कर पंथ । कहहिं संत कवि कोविद, श्रुति पुरान सदग्रंथ ।। संतों का रास्ता मोक्ष में जाने का है-मुक्ति में जाने का है। संतगण सांसारिक इच्छाओं को छोड़ दिए होते हैं। वे संसार में लसक (फँस) कर नहीं रह जाते। वे मोक्ष-मार्ग पर बिना अटक (रूक) के जाते हैं। परन्तु जो सांसारिक वस्तुओं में इच्छा रखते हैं, उनको मोक्ष-मार्ग में जाने में अटक रहता है। ‘जो जो करम कीउ लालच लगि, तिह तिह आपु बंधाइउ।’-नौवाँ गुरु तेग बहादुर का वचन है। जो-जो कर्मफल की इच्छा से किए, उन-उन कर्मों से अपने को बँधा लिया। जो सांसारिक इच्छाओं को नहीं त्याग सके, वे कर्म में फल इच्छा से लगे रहते हैं। उनको संत-पंथ पर जाने में अटक रहता है। धीरे-धीरे इच्छाएँ छूटती हैं। एक ही बार इच्छा नहीं छूटती। जबतक मन मण्डल से ऊपर चढ़ाई नहीं हो, तबतक इच्छा रहेगी ही। चाहे वह इच्छा सात्त्विकी ही क्यों न हो? इच्छा तीन प्रकार की होती है-तामसी, राजसी और सात्त्विकी। सात्त्विकी इच्छा ईश्वर की ओर ले जाती है। संसार में रहकर कुछ-न-कुछ इच्छा रहेगी। सात्त्विक कर्म का भी बन्धन होता है। इसलिए त्रय गुण से परे होने के लिए श्रीकृष्ण भगवान ने कहा था। त्रयगुण से परे तुरंत होना नहीं होता। क्रमशः तामस इच्छा को छोड़ते हैं, राजस को छोड़ते हैं और सात्त्विक में आते हैं। और अंत में इसको भी छोड़कर निस्त्रैगुण्य हो जाते हैं। संसार की वस्तुओं को त्यागने की इच्छा, फिर सात्त्विक इच्छा के त्यागने की इच्छा करो। उस इच्छा को भी छोड़ दो। इस तरह आगे बढ़ोगे। जबतक मन पर विजय नहीं है, तबतक इच्छा होती रहेगी। त्रयगुणातीत होने पर भी-संत होने पर भी, जबतक कोई संसार में रहेगा, संसार से सम्बन्ध रखेगा। संसार में रहकर संसार के सब कामों को छोड़कर रहे, असम्भव है। जैसे जाग्रत में काम करते हैं, उसके लिए इच्छा होती है। स्वप्न में भी इच्छा होती है, गहरी नींद में इच्छा नहीं होती, लेकिन हाथ-पैर का वा किसी अंग का संचालन गहरी नींद में होता है। किन्तु उस अवस्था में हाथ-पैर सिकोड़ने की इच्छा नहीं होती है। इसी तरह कर्म करके उसके फल की इच्छा संत लोग नहीं करते। उनसे राजस और तामस कर्म नहीं होगा, सात्त्विक कर्म होगा। जो मुमुक्षु हैं, उनको चाहिए कि इच्छा को रोकें, दमन करें। तामस इच्छा का त्याग करें। इसी तरह राजस कर्म का भी त्याग करें। सात्त्विक कर्म में बरतने पर भी सात्त्विकी इच्छा का त्याग करना चाहिए। यह पंथ-रास्ता कहने भर के लिए ही है कि ठीक है भी? रास्ता कहते हैं, र्चिं को-लकीर को। चाहे रास्ता चौड़ा हो वा चौड़ाई विहीन लम्बा हो। क्या है? वह लकीर है। इसी तरह जो मोक्ष का रास्ता है, वह लकीर है। लेकिन बहुत लम्बी लकीर है-चौड़ी लकीर नहीं है। रेखा के लिए पढ़े होंगे कि उसमें लम्बाई है, चौड़ाई नहीं। ठीक वैसा ही, जैसे विन्दु का स्थान है, परिमाण नहीं। लेकिन ऐसा विन्दु वा लकीर संसार में कोई देखा है? वह चश्मा जिसको पहनकर पतले-पतले अक्षरों को मोटे-मोटे रूप में देखता है, कितनी भी पतली लकीर खींचकर उस चश्मा से देखो, तो उसमें चौड़ाई मालूम होगी। संसार में ऐसी लकीर नहीं, जिसमें लम्बाई हो-चौड़ाई नहीं। ऐसी लकीर अन्दर का मार्ग है। मोक्ष में जाने का रास्ता लम्बा-ही-लम्बा है, चौड़ा नहीं। एक तो रास्ता बनाते हैं, चलने के लिए, दूसरा रास्ता चलते-चलते बनता है। जिस पर चला जाए, वह रास्ता है। संसार के रास्ते पर सवारी और पैर चलता है। मोक्ष के रास्ते पर न सवारी चलती है और न पैर चलता है, उसपर मन चलता है। संतों का ज्ञान अध्यात्म-ज्ञान छोड़कर नहीं रह सकता। अपने को समझो कि तुम कौन हो? तुम मन नहीं हो, शरीर नहीं हो। किन्तु कुछ ज्यादे पढ़े-लिखे लोग, जिनको आत्मा की स्थिति का ज्ञान नहीं होता, वे कहते हैं-‘शरीर ही शरीर है, शरीर बनने से ऐसा कुछ हो गया है।’ जिस विज्ञान से वे कुछ कहते-सुनते हैं, वह अध्यात्म से सम्बन्धित नहीं है। अध्यात्म-ज्ञान सिखाता है कि आत्मा अभिन्न है, अनात्मा भिन्न है। आत्मा और मन, इसको समझाने के लिए बहुत बात नहीं, थोड़ा कहना है। जैसे शरीर माया है, वैसे ही मन माया है। मन की बनावट माया से हुई है। इसका भी रहना नहीं होगा। शरीर के जीवन में मन और आत्मा का मिलाप है। ऐसा मिलाप कि जैसे दूध और घी का। दूध को देखो तो उसमें घी का पता नहीं। घी का काम दूध से नहीं होता और दूध का काम घी से नहीं होता। कोशिश करो तो दूध को मथकर घी अलग कर लोगे। तब जो काम घी से होगा, वह दूध से नहीं। यह प्रत्यक्ष देखोगे। दूध का छेना (पनीर) होगा, लेकिन घी का नहीं। उसी तरह मन और आत्मा के मेल से जो काम होता है, वह काम केवल मन या केवल आत्मा से होने योग्य नहीं है। मन और आत्मा का मिलाप है। बिना मन के हम काम नहीं करते। कहीं चलने के लिए, कुछ बोलने के लिए मन प्रेरण करता है। पहले मन चलेगा, पैर नहीं। संत कबीर साहब ने कहा है- बिन पाँवन की राह है, बिन बस्ती का देश । बिना पिण्ड का पुरुष है, कहै कबीर सन्देश ।। कहाँ से चलेगा? रास्ता शुरू कहाँ से होगा? जो जहाँ बैठा रहता है, वहीं से चलता है। यह मन कहाँ बैठा हुआ है? इस तन में मन कहँ बसै,निकसि जाय केहि ठौर । गुरु गम है तो परखि ले, नातर कर गुरु और ।। नैनों माहीं मन बसै, निकसि जाय नौ ठौर । गुरु गम भेद बताइया, सब संतन सिरमौर ।। -कबीर साहब जानिले जानिले सत्त पहचानिले, सुरति साँची बसै दीद दाना। खोलो कपाट यह बाट सहजै मिलै, पलक परवीन दिव दृष्टि ताना।। ‘दीद’ कहते हैं आँख को और ‘दाना’ कहते हैं तिल को। कैसे रास्ता पकड़ोगे? तो कहा-‘खोलो कपाट यह बाट सहजै मिलै।’ जाग्रत में आँख में, स्वप्न में कण्ठ में, सुषुप्ति में हृदय में और तुरीय में मूर्द्धा में वासा होता है। मोक्षमार्ग पर चलने के लिए जाग्रत अवस्था से चलना होगा। बाहर में संत-पंथ नहीं है, अन्दर में है। इसी पर मन चलता है। जो कोई यहाँ से चलना बताता है, ठीक बताता है, यह आज्ञाचक्र है। कोई कहे कि नीचे से क्यों नहीं चलो? तो नीचे से हठयोगी चलते हैं। नीचे में वे स्थान मानते हैं, जिसको मूलाधार चक्र कहते हैं, वे वहीं से आगे बढ़ते हैं। कोई कहते हैं कि पैर में भी तुम हो, वहीं से क्यों नहीं चलते? तो पैर से चलने के लिए कोई नहीं बताते। कोई मूलाधार से, कोई हृदय से और कोई आज्ञाचक्र से चलना बताते हैं। हृदय से चलनेवाले को मूलाधार से चलनेवाला कहता है कि मूलाधार से क्यों नहीं चलते? हृदय से चलनेवाला अन्य दूसरों से कहता है कि हृदय से क्यों नहीं चलते? आज्ञाचक्र से चलनेवाला कहता है कि जिस कर्म से तुम अपने को समेटोगे, वह कर्म हमारे पास भी है। क्या मूलाधार और क्या हृदय, सबसे समेटकर हम आज्ञाचक्र से चलते हैं। शिवजी ने कहा है कि ‘पंच पद्मों का जो-जो फल पहले कहा, सो समस्त फल आपही इस आज्ञा कमल के ध्यान से प्राप्त हो जाएगा।’ यानि यानि हि प्रोक्तानि पंच पद्मे फलानि वै । तानि सर्वानि सुतरामेतज्ज्ञानाद्भवन्ति हि ।। -शिव-संहिता संतों ने यहीं से अन्तर का रास्ता बताया है। रास्ता ज्योति का है और शब्द का है। *************** *यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट में दिनांक 3. 9. 1967 ई0 को साप्ताहिक सत्संग के अवसर पर हुआ था।* ***************

शनिवार, 25 जनवरी 2025

जनवरी 25, 2025

मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

जयगुरु 🙏 सभी सज्जन वृंद से प्रार्थना है कि प्रवचन को पूरा पढ़ें आपके लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का प्रवचन को लेकर हाजिर हूं। 🙏🕉️ जय गुरूदेव 🕉️🙏 मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्यारे लोगो! जिस क्षेत्र में हमलोग सत्संग कर रहे हैं, वह बड़े महत्त्व का है। यहाँ भगवान बुद्ध बहुत सत्संग किया करते थे। यहाँ निकट ही वेणुवन में भगवान बुद्ध सत्संग कराया करते थे। यहाँ और भी पहाड़ पर उनका स्थान है। यह पुण्यभूमि है। आपलोग जो सत्संग-प्रेमी हैं, घर के कामों को छोड़कर, विहार के इस कठिन महँगाई के समय में भी खर्च करके यहाँ आए हैं। यह देखकर मेरे चित्त को बहुत ही प्रसन्नता होती है। हमलोग क्यों आए? इसलिए कि जहाँ ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध सत्संग करते थे, वहाँ सत्संग करें। सत्संग से हम क्या सीखते हैं? बच्चे खेल खेलने में-खिलौने में खुश होते हैं। वे कुछ वर्ष खुश रहते है। उनको समझाया-बुझाया जाता है, अभिभावक की ओर से उनको भय दिखाया जाता है, दबाव डाला जाता है और विद्याभ्यास में लगाया जाता है। जैसे- जैसे वे विद्याभ्यास में बढ़ते हैं, वैसे-वैसे उनके ज्ञान का विकास होता है। वे समझते हैं कि बचपन का खेल भले ही छूट गया। वह सदा का सुखदायक नहीं था। पढ़-लिख लेने के बाद कर्तव्य और अकर्तव्य को समझने लगते हैं तथा उचित विचार कर उचित कर्म को करते हैं। ऐसे ही वे चलते हैं। यहाँ ऐसे बच्चे हैं, जो देखते हैं कि केवल संसार के ही काम हैं। जो संसार के आगे का ख्याल नहीं रखते, वे भी बच्चे हैं। मैं कहूँगा, जिनको जीवन के बाद का ख्याल नहीं है, चाहे वे कितनी अधिक उम्र के हो गए हों, फिर भी वे बच्चे हैं, चाहे वे मेरी उम्र (83 वर्ष) के हों वा मेरी उम्र से अधिक के हों। विद्या से अनुचित और अनीति को समझते हैं, फिर भी उन्हीं में चलते हैं। किन्तु सत्संग से ज्ञान सीखकर जो संसार के बाद को भी सोचते हैं, उनको पता लगता है कि यह शरीर छोड़कर जाना है। लेकिन पता नहीं, कहाँ जाना है। जाना जरूर है। कहाँ जाना है? पता नहीं। रास्ता मालूम नहीं, स्थान मालूम नहीं, कितनी चिन्ता की बात है? इस बात को जो चेतते हैं, वे ही सयाने होते हैं। वे ही बालपन के खेल को छोड़ते हैं। इन्हीं बातों को समझाने के लिए संत लोग संसार में विचरते हैं। संतों ने संसार के खेल को देखा और कहा कि इसको छोड़ देना अच्छा है। एक बात तो यह है कि संसार के कामों से उपराम होना और दूसरी बात यह है कि संसार के कामों में लगे रहने पर भी संसार से उपरामता रहे। संसार के कामों में त्रुटि नहीं होने देकर उसमें उपरामता रहे, यह उत्तम है। जो संसार के कामों को छोड़कर रहते हैं, वे भी संसार के कामों और प्रबन्धों को छोड़कर नहीं रह सकते। मनुष्य को समझ में आवे कि रास्ता क्या है? जाना कहाँ है? सबसे उत्तम स्थान कहाँ है? यह भी संसार का ही काम है। और कामों से मन को हटा लिया जा सकता है, लेकिन इससे हटा नहीं सकते। बड़े-बड़े संतों, महात्माओं को ऐसा ही देखा गया। वे लड़ाई के मैदान में नहीं गए, खेती करने नहीं गए, नौकरी नहीं की, लेकिन यह काम अपने ऊपर ले लिया कि ‘चलना है रहना नहीं, चलना बिस्वाबीस।’ यह ख्याल देते रहे। चलना किस रास्ते से है। कहाँ जाना है? इस बात को समझाते हैं। यह समझाना निर्वाण में जाकर नहीं होता, संसार में रहकर ही करते हैं। दूसरे वे हैं, जो संसार के कामों को करते हुए अपने चेतते हैं और दूसरों को चेताते हैं, जैसे भगवान श्रीकृष्ण। भगवान बुद्ध संन्यासी हुए, औरों को भी उन्होंने संन्यासी बनाया। भगवान बुद्ध के समय में जितने संन्यासी हुए उतने किन्हीं के समय में नहीं। केवल संन्यासी ही नहीं बनाए, राजा और सेनापति भी उनके शिष्य थे। उनको उन्होंने संन्यासी नहीं बना लिया, उस तरह की शिक्षा दी। ‘कर ते कर्म करो विधि नाना। सुरत राख जहँ कृपानिधाना।। युद्ध भी करो और स्मरण भी करो। ‘तन काम में मन राम में।’ ‘करम करै करता नहीं, दास कहावै सोय।’ -कबीर साहब कर्म करते थे। उन्होंने अपने जीवन- यापन के लिए किसी दूसरे पर भार नहीं दिया। ‘थोड़ा बनिज बहुत ह्नै बाढ़ी उपजन लागे लाल मई।’ संतोष उनको बहुत था। थोड़ा-सा काम करते थे, अपना जीवन-यापन जिससे हो। मतलब यह कि जो संन्यासी हो जाते हैं, उनका कर्तव्य हो जाता है कि वे संसार के पार को बतावें। संसार में सदा रहना नहीं है। समर्थ रामदास ऐसे थे कि वे शिवाजी राव को चलाते थे। राजा को भी अपनी राय देते थे। शिवाजी ने कहा कि मैं तप करूँगा। समर्थ ने कहा- मैं तुम्हारा तप करता हूँ, तुम तलवार लो। गुरु गोविन्द सिंहजी महाराज ने दोनों काम करके दिखाया-भजन भी, तलवार भी। गुरु गोविन्द सिंहजी महाराज कभी अनीति में नहीं गुजरे। बेटे मर गए, लेकिन उन्होंने शोक नहीं किया। उन्होंने समय को देखा। संसार में युद्ध-ही-युद्ध होता है। वेद के उपदेश से यही मालूम हुआ कि इन्द्रिय का सुख, सुख नहीं है। संसार के पदार्थों में सुख नहीं, ईश्वर-भजन में सुख है। भगवान बुद्ध के वचन का धम्मपद ग्रन्थ से पाठ हुआ, उसमें भी यही आया, ‘ईश्वर-भजन करो’-ऐसा तो उसमें नहीं आया, लेकिन यह आया कि संसार के सुखों में आसक्त मत होओ। तब क्या करो? संसार के सुख में नहीं फँसकर, शरीर-सुख से जो विशेष सुख है, उस ओर चलो। निर्वाण की ओर चलो। यह संसार जो दीप-टेम के समान जलता है, सदा के लिए बुझ जाए, उधर चलो। हमलोग इन्हीं बातों को याद दिलाने और जो नहीं सुने हैं, उनको सुनाने के लिए यह सत्संग करते हैं। जिनको सत्संग का चसका लग जाता है, वे दूर-दूर से आते हैं। उनके मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग होता है। सुनकर लोग विद्वान होते हैं। भगवान बुद्ध ने जो वचन कहे थे, लोगों ने सुने, याद रखे। लिखे तो पीछे गए। उपनिषद् के पाठ में आया कि भवसागर को पार करने के लिए सूक्ष्म मार्ग का अवलम्बन करो। स्थूल रास्ते पर चलकर संसार भर ही रहोगे, बाहर नहीं जा सकते। संसार का मार्ग तो यह है कि यहाँ से कलकत्ता जाओ और कलकत्ता से यहाँ आओ। यह स्थूल मार्ग है। दूसरा मार्ग है कि शरीर छूटने के बाद-संसार से जाने के बाद आराम से रहना हो। इसके लिए जो उत्तम-उत्तम कर्म हैं, स्थूल दर्जे के ही हैं। फिर भी उत्तम हैं, उनको करो। सूक्ष्म मार्ग बहुत उत्तम है। ‘लखे रे कोई बिरला पद निर्वाण।’ यह बाहर में नहीं है, भीतर का रास्ता है। उसपर पैर से चला नहीं जाता। सूक्ष्म अवलम्ब लेकर चलना होता है। ‘बिन पावन की राह है, बिन बस्ती का देश। बिना पिण्ड का पुरुष है, कहै कबीर सन्देश।।’ इस सत्संग से ये ही सब बातें बतायी जाएँगी। मैं धीरे-धीरे बतलाऊँगा कि सूक्ष्म मार्ग कहाँ है, उसका आरम्भ कहाँ से है और अंत कहाँ है? मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं बतलाऊँगा कि जहाँ से आपको फिर लौटकर इस संसार में आना नहीं होगा। *************** *यह प्रवचन नालन्दा जिलान्तर्गत भगवान महावीर और भगवान बुद्ध के विहार स्थल राजगीर में 58वाँ अखिल भारतीय संतमत सत्संग का विशेषाधिवेशन दिनांक 28. 10. 1966 ई0 के प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था।* *************** अगर आप प्रवचन को पूरा पढ लिये है तो शेयर जरुर करें।

शनिवार, 11 जनवरी 2025

जनवरी 11, 2025

मन में बहुत प्रकार के संस्कार भरे पड़े हैं -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार मधेपुरा आप सभी के लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का दिव्य प्रवचन को लेकर आया हूं।आप अगर पूरा पढ़ते हैं तो आपका आध्यात्मिक उन्नति कीओर मन को जरूर प्रेरणा मिलेंगे। 🙏🕉️जय गुरूदेव 🕉️🙏 मन में बहुत प्रकार के संस्कार भरे पड़े हैं-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्यारे लोगो ! पूर्व की बात हमलोगों को स्मरण नहीं है, परंतु सद्ग्रन्थों से विदित होता है कि हमारे बहुत से जन्म हुए हैं। कितने जन्म हुए, यह संख्या में बतलाने योग्य नहीं है। किसी भी संख्या-करोड़, अरब बताने योग्य नहीं है; क्योंकि यह पृथ्वी, यह सूर्य, यह चन्द्र-सब बहुत पुराने हैं। इनकी रचना कब हुई, कोई ठीक-ठीक नहीं बता सकता। आज के लोग कुछ बताते हैं, लेकिन यह निश्चित नहीं है। हमलोग चार युगों की बात सुनते हैं। चार युग एक बार समाप्त होने पर एक चौकड़ी होती है। फिर कल्प और महाकल्प होते हैं। यह पुरानों के अनुकूल है। सृष्टि हुई है, लेकिन कब हुई है, कोई बता नहीं सकता। जबसे सृष्टि हुई है, तब से जीव-जन्तु हैं। हमलोगों के भी कितने जन्म हुए, ठिकाना नहीं। अन्दाज करके मालूम होता है कि हमारे बहुत जीवन गुजरें हैं; क्यांकि हमारे मन में बहुत संस्कार हैं। इस जन्म में कितने प्रकार के संस्कार में हम बरतते हैं-यह भी अन्दाज से बाहर है। फिर भी भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न संस्कार के देखे जाते हैं। जब लोग कुछ सयाने होते हैं और उनके संस्कार उदित होते हैं, तो इसी जन्म के सभी संस्कार हैं, कहा नहीं जाता। जो संस्कार इस जन्म में नहीं हुआ, उसके भी कर्म देखे जाते हैं। हमारे मन में बहुत प्रकार के ंसंस्कार भरे पड़े हैं। इसीलिए हमारे बहुत जन्म हुए। हमारे अन्दर जितने संस्कार उदित हुए, वे सब संस्कार सुख के लिए ही। सुख की खोज में पड़े, उसी के अन्दर दौड़े। जो ज्ञानवान हैं, उनके अन्दर में ज्ञान का उदय होता रहता है। यह ज्ञान का संस्कार पहले से ही है। कहा जाता है कि इस ज्ञान के पक्ष में बहुत जन्मों से रहे। शंकाराचार्य, भगवान बुद्ध बड़े-बड़े महात्मा हुए हैं। कबीर साहब, गुरु नानक साहब-ये सब ऐसे हुए कि बचपन से ही ज्ञान के पक्ष में चले। इसलिए कहना पड़ता है कि कई जन्मों से इनके अन्दर ज्ञान चला आता था, जो इस जन्म में उदित हुआ। साधारण मनुष्य विषय-भोग का संस्कार लेकर आते हैं और बचपन से उधर ही लगते हैं। वसन्त पंचमी में साल में एक बार हल की पूजा होती है। राजा लोग भी हल पकड़ लिया करते थे। सीताजी हल की पूजा के दिन ही निकली थीं, जबकि जनकजी हल जोत रहे थे। इसीलिए श्री जानकी जी को भूमिजा भी कहते हैं। जनकजी के हल की नोक लगने से घड़े से सीताजी निकली थीं। ढाई हजार वर्ष से कुछ पहले भगवान बुद्ध का जन्म हुआ। राजा शुद्धोधन हल जोतने गए थे। उस दिन बड़ा उत्सव था। भगवान बुद्ध को भी लेकर दाई वहाँ गई थी। दाई खेमे से बाहर निकली और फिर भीतर गई तो भगवान बुद्ध को ध्यानावस्थित उसने देखा और लोगों को भी दिखाया। ऐसा क्यों हुआ? बहुत से जन्मों से वे ध्यान करते चले आते थे। हम साधारण मनुष्य विषय-भोग का संस्कार लेकर आते हैं। इसलिए उस ओर बचपन से ही जाते हैं। कितने कुछ ज्ञान-चिन्तन और कुछ विषय- चिन्तन करते हैं। कितने बिल्कुल विषय-चिन्तन ही करते हैं, ज्ञान-चिन्तन नहीं। कितने में ज्ञान-चिन्तन की मात्रा अधिक और विषय-चिन्तन की मात्रा कम रहती है। अनेक जन्मों से लेकर आज भी हम सुख की ओर दौड़ते हैं। कितने विषय-सुख की ओर से धक्का खाकर फिर उसी ओर जाते हैं। कितने उस सुख की ओर से धक्का खाकर ज्ञान की ओर जाते हैं, विषयसुख की ओर से उनकी आसक्ति हटती है। आज के और पहले के संतों के ज्ञान से जानने में आता है कि विषय में सुख नहीं है। विषय पाँच हैं-रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द। इन पाँचों से फाजिल को कोई जानता नहीं है। इनसे अधिक संसार में कुछ है भी नहीं। इन विषयों में दौड़ते-दौड़ते थकते हैं, दुःख पाते हैं, फिर भी उधर ही दौड़ते हैं। साधु-सन्त कहते हैं और जिन्होंने अच्छा भजन किया है, वे भी कहते हैं कि बाहर विषय-सुख में मत दौड़ो। यहाँ कहाँ सुख है? सुख तुम्हारे अंदर है। उस ओर जाओ। विषय-सुख भोगते हुए मन सन्तुष्ट नहीं होता, अधिक चंचल होता है और इसी में दुःख होता है। मन बाहर-बाहर दौड़ता है, तो अन्दर प्रविष्ट नहीं होता है। संतों ने बताया कि बाहर विषयों से सन्तुष्ट तुम नहीं होओगे। इसे संतोष करो। सुख अन्दर में है। उधर चलो। तन्द्रा में अन्दर में रहते हो, तब कोई बाहर का विषय नहीं रहता, फिर भी तुम सुखी रहते हो, चैन मालूम होता है। तन्द्रा से कोई छूटता है, तो उसको दुःख लगता है। चैन तुम्हारे अन्दर है। मुख में मिसरी का टुकड़ा रहे और सो जाओ, तो उसकी मिठास तुमको मालूम नहीं होती। यदि स्वप्न में देखो कि नीम का पत्ता खा रहा हूँ तो नीम का स्वाद कड़ ूवा मालूम पड़ेगा, मिसरी की मिठास का स्वाद नहीं। चेतन भीतर में था, इसीलिए भीतर का ज्ञान होता था, बाहर का नहीं। अन्दर में सुख है। इसलिए अन्दर में चलो। अन्दर में कहाँ तक जा सकते हो? संतों ने और साधकों ने कहा कि अन्दर में चला जाता है। जब तुम स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत में नहीं रहते, तब तुरीय अवस्था में चलते हुए अन्दर का सुख पा सकते हो। जैसे-जैसे आगे बढ़ो, वैसे-वैसे अधिक सुख मिलता जाएगा। जहाँ चौथी अवस्था समाप्त हो जाएगी, वहाँ चलना भी समाप्त हो जाएगा। पहाड़ का अन्त उनकी चोटी पर होता है, इसी तरह तुरीय अवस्था का भी शिखर है। इसके शिखर पर चढ़ो, तो उसके आगे में क्या है, सो भी जानोगे। पहाड़ की चोटी पर रहने पर पहाड़ तुम्हारे पैर के नीचे रहेगा, ऊपर में पहाड़ नहीं रहेगा। इसी तरह चौथी अवस्था के ऊपर जाने पर फिर जाने के लिए स्थान नहीं रहता। इसी को गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं-‘देश काल तहँ नाहीं।’ जहाँ स्थान है, वहाँ समय है, और जहाँ समय है, वहाँ स्थान है। देश हो, काल नहीं; काल हो, देश नहीं-ऐसा हो नहीं सकता। इसको संतों ने विविध प्रकार से बतलाया है। संत दादूदयालजी महाराज ने कहा- अविगत अंत अंत अंतर पट, अगम अगाध अगोई । सुन्नी सुन्न सुन्न के पारा, अगुन सगुन नहिं दोई ।। वहाँ पहुँचने पर ही पता मिलता है कि यह ईश्वर है। वहाँ ईश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, यहाँ केवल विचार में ही। वे परमात्मा इन्द्रियज्ञान से परे हैं; मन, इन्द्रियों से परे हैं। मन इन्द्रियों से ऊपर उठकर ईश्वर को पा सकते हो। ईश्वर पाने के लिए अन्दर जाने का रास्ता संतों ने बताया। संत कबीर साहब कहते हैं- उलटि पाछिलो पैंड़ो पकड़ो पसरा मन बटोर । पसरे हुए मन को समेटो। जप से मन का सिमटाव होता है। जप से अधिक सिमटाव मानस ध्यान में होता है। पूरा सिमटाव एकविन्दुता में होता है। विन्दु में फैलाव नहीं है। इसीलिए विन्दु ध्यान की बड़ी महिमा है। हाथ-पैरवाला ईश्वर को जानेगा तो बड़ी मोटी बात है। शिवलिंग में, शालिग्राम में हाथ, पैर नहीं है। फिर ईश्वर क्यों मानते हो? इसका मतलब यह है कि केवल हाथ-पैरवाला ईश्वर होता है-ऐसा मत समझो। ऐसा सिमटाव हो कि एकविन्दुता प्राप्त हो जाए। जितने चित्र बनते हैं, विन्दुओं से। लकीर बनती है, विन्दुओं से। तेजो विन्दुः परं ध्यानं विश्वात्म हृदि संस्थितम् । अर्थात् हृदय स्थित विश्वात्म तेजस्वरूप विन्दु का ध्यान परम ध्यान है। उपनिषत्कार ने लिखा है। सबके अन्दर-अन्दर हृदय में यह विन्दु मौजूद है। ‘हृदय’ शब्द छाती के लिए नहीं, योगी लोग छठे चक्र को योगहृदय कहते हैं। यहाँ तक रूप है। संसार में रूप के बाद अरूप है। रूप स्थूल है और अरूप सूक्ष्म है। अरूप को प्राप्त करने के लिए अरूप अवलम्ब लो। अरूप अवलम्ब शब्द है। सबके अंदर शब्द गूंज रहा है। साधन करने वाला जानता है। इस शब्द का उद्गम परमात्मा है। जहाँ से यह शब्द उत्पन्न हुआ, वह परमात्मा है। कुछ बनाने में कम्प होता है। परमात्मा की मौज हुई सृष्टि बनाने में , उसमें शब्द हुआ। वह शब्द सृष्टि के अणु-अणु में प्रविष्ट है। शब्द-साधना करके जो परम पद को पाता है, वह वहाँ पहुँचता है, जहाँ से शब्द की उत्पत्ति हुई है। जहाँ से शब्द उत्पन्न हुआ, वहाँ शब्द की समाप्ति भी होती है। इसीलिए उपनिषत्कार ने कहा-‘निःशब्दं परमं पदम्।’ संतों ने कहा कि सुख खोजते हो, तो यहाँ (निःशब्दं परमं पदम् में) सुख मिलेगा। इसके लिए अनेक पीढ़ियों के संस्कार की, इन्द्रिय-निग्रह की, दीर्घोद्योग की तथा ध्यान और उपासना की सहायता अत्यन्त आवश्यक है। (देखें-लोकमान्य बालगंगाधर तिलक कृत ‘गीता रहस्य’ पृष्ठ 247) असली सुख अन्दर में मिलेगा, बाहर में नहीं। इसके लिए घर छोड़ने की जरूरत नहीं है। घर में रहो, काम करो और गुरु के बताए अनुकूल त्रैकालिक सन्ध्या अवश्य करो। रात में सोते समय भी कुछ करके सोओ। त्रैकालिक सन्ध्या अवश्य करो। सोना क्या है? गहरी नींद में जाना एक प्रकार से मरना है। मरने के पहले राम-राम कहो। इसलिए सोने के पहले कुछ जप-ध्यान करके सोओ। संसार के कामों को करते हुए भी ध्यान करो। ध्यान करते रहने से महा-से-महा संकट में भी कल्याण होगा। द *************** *यह प्रवचन बिहार राज्यार्न्तगत भागलपुर नगर के श्रीगंगातट-स्थित महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट में दिनांक 24. 4. 1966 ई0 के सत्संग में हुआ था।* *************** पूरा पढ़ने के लिए आपको बहुत बहुत साधुवाद!एक बात शेयर जरुर करें 🙏

गुरुवार, 9 जनवरी 2025

जनवरी 09, 2025

बाहर फिरत विकल भय धायो-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार आपके लिए आराध्य देव का प्रवचन को लेकर हाजिर हूं।एक बार पूरा प्रवचन को जरूर पढ़ें 🙏🕉️ जय गुरूदेव 🕉️🙏 बाहर फिरत विकल भय धायो-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज *धर्मानुरागिनी प्यारी जनता!* इस समय के सत्संग में मैं ईश्वर-भक्ति के विषय में बोलूँगा। भक्ति के विषय में जो आप पहले से जानते हैं, हो सकता है मैं आपके अनुकूल कहूँ। अथवा उसके अतिरिक्त दूसरी तरह भी कह सकूँ। भक्ति की जानकारी के लिए पहले समझना चाहिए कि ईश्वर स्वरूपतः क्या है? इन्दियज्ञान से ईश्वर दूर है। चेतन आत्मा से ही जो पहचान में आवे, वही ईश्वर है। इन्द्रियों के ज्ञान में ईश्वर- स्वरूप का ज्ञान नहीं हो सकता; क्यांकि इन्द्रियज्ञान में जो आता है, सो माया है। माया उसको कहते हैं, जिसकी बदली होती है, जिसका विनाश होता है और जो असत्य है। ईश्वर की बदली नहीं, ईश्वर का विनाश नहीं। माया जड़ है। ईश्वर चेतन को भी चेतन करनेवाला परम चेतन है। केवल चेतन आत्मा से ईश्वर का दर्शन होगा। बाहर में कहीं भी ईश्वर का दर्शन नहीं होगा, क्योंकि बाहर में इन्द्रियों से ही काम होता है। जो इन्द्रियज्ञान में नहीं है, उसको इन्द्रियों से पावेंगे, ऐसी आशा दुराशा मात्र है। ईश्वर का दर्शन बाहर में मानते हैं, तो ज्ञान के खिलाफ होता है और उसकी सत्यता सिद्ध नहीं होगी। बाहर में ईश्वर का दर्शन नहीं होता। यह विचार देकर संतों ने कहा है-ईश्वर को अपने अन्दर खोजो। (गो0 तुलसीदासजी महाराज) जिनका सात काण्ड रामायण है। विनय-पत्रिका में लिखते हैं- एहि तें मैं हरि ज्ञान गँवायो । परिहरि हृदय कमल रघुनाथहिं,बाहर फिरत विकल भय धायो ।। अर्थात् बाहर में खोजते रहे, तो विकल होते रहे, हैरान होते रहे। कुछ लोग गोस्वामी तुलसीदासजी की जीवनी में लिखते हैं कि उनको बाहर में भी ईश्वर का दर्शन हुआ था। श्रीराम का दर्शन हुआ था। हनुमानजी से तुलसीदासजी ने प्रार्थना की कि मुझे राम के दर्शन कराइए। चित्रकूट में तब वे रहते थे। एक दिन वे चन्दन घिस रहे थे। उन्होंने देखा कि दो सुकुमार बालक आए हैं और चन्दन लगाने के लिए कह रहे हैं, तुलसीदासजी ने उन दोनों को तिलक लगा दिए, किन्तु वे पहचान न सके कि ये ही श्रीराम और लक्ष्मण हैंं। पुनः हनुमानजी से भेंट होने पर तुलसीदासजी ने कहा-‘मुझे राम के दर्शन नहीं हुए।’ हनुमानजी ने कहा-‘आपने पहचाना नहीं, जिन दो बालकों को आपने तिलक लगाए, वे ही राम और लक्ष्मण थे।’ तुलसीदासजी ने पुनः दर्शन करवाने के लिए उनसे प्रार्थना की। हनुमानजी ने कहा-‘अच्छा, फिर दर्शन होगा।’ उसके बाद तुलसीदासजी ने देखा कि दो सुन्दर किशोर बालक घोड़े पर जा रहे हैं। किन्तु इस बार भी वे पहचान न सके। हनुमानजी से भेंट होने पर उन्होंने समझाया- ‘घोडे़ पर जिन दो बालकों को आपने जाते देखा, वे ही दोनों बालक राम और लक्ष्मण थे।’ इस तरह गोस्वामी तुलसीदासजी राम और लक्ष्मण को देखकर भी पहचान न सके। यथार्थ में क्या ईश्वर-दर्शन ऐसा ही होता है कि ईश्वर-दर्शन हो और ज्ञान नहीं हो कि ईश्वरदर्शन हुआ? बाहर के दर्शन से, इन्द्रियां के ज्ञान से दर्शन होने पर वह परमात्मा का दर्शन नहीं होता। तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लिखा है- रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा।। नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा।। तुलसीकृत रामायण में योग का वर्णन भी किया है- सतगुरु ज्ञान विराग जोग के, विबुध बैद भव भीम रोग के।। मतलब यह कि रामचरितमानस में योग भी है, लेकिन देखने के लिए अन्तर्दृष्टि चाहिए। ‘उघरहिं विमल विलोचन ही के। मिटहिं दोष दुःख भव रजनीके।।’ इसको भी जानो। बाहर के दर्शन से क्या हुआ। कश्यप और अदिति ब्राह्मण थे और तप करने पर क्षत्रिय हुए। एक पद नीचे चले आए; क्योंकि क्षत्रिय, ब्राह्मण से नीचे होते हैं। माया दर्शन में माया के अंदर बहुत लाभ होता है। चमत्कारिक लोकों में जाना हो सकता है, लेकिन अपना ज्ञान नहीं होता। जबतक अपना दर्शन न हो, तबतक ईश्वर-दर्शन हुआ, कहा नहीं जा सकता। अन्दर में इसलिए दर्शन होगा कि जैसे-जैसे अन्दर जाओगे, बाहर की इन्द्रियों से छूटते जाओगे। स्वप्न में भी बाहर की इन्द्रियों से छूटा जाता है। यह विश्वास करना चाहिए कि अंतर्मुख होने से इन्द्रियों के ज्ञान से छूटते हैं। सुषुप्ति में भी इन्द्रियज्ञान से भिन्न रहते हैं। स्थूल शरीर मेेें जागने से ज्ञान होता है, उसमें तथा स्वप्न के ज्ञान से एवं सुषुप्ति के अचेतपन से भी छूटे रहोगे। यह अनुभूति की बात है, साधन की बात है। यही भक्ति-मार्ग में योग का स्थान आता है। भक्ति कहते हैं- सेवा करने को। किसी की आवश्यकता पूरी करनी, उनकी यह सेवा है। गंगा- सेवन करने लोग जाते हैं। वहाँ गंगा की सेवा क्या करो? गंगा में बकरी का बच्चा फेंकते हैं, लोग उसको लूटते हैं, यह भक्ति नहीं है। गंगाजल का स्पर्श करते हैं, पानी पीते हैं, उसकी हवा में रहते हैं; यह गंगा सेवन है। गंगाजी को कोई इच्छा नहीं, आप क्या सेवा कीजिएगा? जबसे ईश्वर का ज्ञान सुनकर वह ज्ञान प्राप्त करने लगे, तबसे ईश्वर-भक्ति आरम्भ हो गयी। ईश्वर की ज्योति भी आप देख सकें, तो मन पवित्र हो जाएगा। जो सत्संगी इसका यत्न जानते हैं, साधन-भजन करते हैं, अन्दर में कुछ भी पाते हैं, तब मन कैसा होता है, वे जानते हैं। वे पुनः-पुनः वैसा ही देखना चाहते हैं। जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाते हैं, ईश्वर का प्रकाश मिलता गया, गोया ईश्वर का आशीर्वाद आता गया। ईश्वर की खोज में अन्दर-अन्दर चलना ईश्वर की भक्ति है। भक्ति वहाँ समाप्त हो जाती है, जहाँ ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है। तुलसीदासजी को बाहर में दर्शन नहीं हुआ। दर्शन होने पर भी वे पहचान न सके। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं- निर्गुण रूप सुलभ अति, सगुण जान नहि कोय । सुगम अगम नाना चरित, सुनि मुनि मन भ्रम होय ।। इस पर लोग ध्यान नहीं देते। स्थूल पर ही लौ लगाए रहते हैं, आगे बढ़ना नहीं चाहते। चाहिए कि अंतर्मुखी होकर खोज हो। जो जहाँ बैठा रहता है, वह वहीं से चलता है। दृष्टि और मन को स्थिर करो। ‘बैठे ने रास्ता काटा। चलते ने बाट न पाई।।’ अन्दर में असली दर्शन होता है। अमायिक रूप का दर्शन करो। अन्दर चलने के लिए कबीर साहब ने कहा है-‘भक्ति का मारग झीना रे।’ उस पर चलने के लिए केवल चेतन आत्मा है। अपने को स्थूल दृष्टि में रखे हुए लोग सूक्ष्म दृष्टि में अपने को ले जाएँ। गुरु नानकदेवजी ने कहा है- भगता की चाल निराली । चाल निराली भगता केरी विखम मारगि चलणा ।। लबु लोभ अहंकार तजि त्रिसना बहुतु नाहीं बोलणा ।। ख्ांनिअहु तीखी बालहु नीकी एतु मारगि जाणा।। कठोपनिषद् में है- क्षूरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति । इसी बारीकी के कारण गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है- रघुपति भगति करत कठिनाई । कहत सुगम करनी अपार, जानइ सो जेहि बनि आई ।। जो जेहि कला कुसल ता कहँ, सो सुलभ सदा सुखकारी । सफरी सनमुख जल प्रवाह, सुरसरी बहइ गज भारी ।। ज्यों सर्करा मिलइ सिकता महँ, बल तें नहिं बिलगावै । अति रसज्ञ सूछम पिपीलिका, बिनु प्रयास ही पावै ।। सकल दृस्य निज उदर मेलि, सोवइ निद्रा तजि जोगी । सोइ हरि-पद अनुभवइ परम सुख, अतिसय द्वैत वियोगी ।। सोक मोह भय हरष दिवस निसि, देस काल तहँ नाहीं । तुलसिदास एहि दसा-हीन, संसय निर्मूल न जाहीं ।। सफरी की तरह सूक्ष्म हो जाओ। अपने को बहुत सम्भालो और सूक्ष्म में होकर उस तक पहुँचो। इसके लिए कला (विद्या) है, गुरु से भजन भेद लो और उसका अभ्यास करो। हमलोग अभी संसार के स्थूल तल पर हैं। सूक्ष्म की ओर बढ़ने के लिए शाम्भवी मुद्रा अथवा वैष्णवी मुद्रा का अभ्यास करो। अंदर चलने के लिए साधन लो और करो। संभव नहीं कि सूक्ष्म दृष्टि का अभ्यास नहीं हो सकेगा। अबतक जो ज्ञान हुआ है, साधन किया है, उसमें यह दृढ़ हो गया है। ‘थोड़ा बनिज बहुत ह्वै बाढ़ी उपजन लागे लाल मई ।’ ‘श्रद्धा किं? करिय जहँ प्रीति । लखि न अभाव होइ विपरीती।।’ अभाव होने पर विपरीत नहीं हो, विश्वास डिगे नहीं, करता चला जाय। लेकिन अन्धविश्वासी नहीं बनो। साधन करोगे, तो अन्धी श्रद्धा नहीं रहेगी। कभी कुछ भी सफाई आ जाय, तो अहोभाग्य है। थोड़ी भी शान्ति आ गई तो अहोभाग्य है। यह जल्दबाजी की बात नहीं है। रामचरितमानस की नवधा भक्ति में है- प्रथम भगति सन्तन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।। गुरुपद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान । चौथी भगति मम गुन गन, करइ कपट तजि गान ।। मंत्र जाप मम दृढ़ विस्वासा। पंचम भजन सो वेद प्रकासा।। छठ दम सील विरति बहु कर्मा। निरत निरंतर सज्जन धर्मा।। सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मो तें सन्त अधिक करि लेखा।। आठवँ यथा लाभ सन्तोषा। सपनहुँ नहिं देखइ पर दोषा।। नवम सरल सब सन छल हीना। मम भरोस हिय हरष न दीना।। संतों का संग, कथा-प्रसंग, गुरु-सेवा, ईश्वर का गुणगान, मंत्र-जप; इस प्रकार पाँच भक्ति तक मन लगाने पर ही जोर है। छठी भक्ति में दमशील बनने कहा। शम-दम छोड़ दो तो योग कहाँ रहा? इन्द्रिय-निग्रह से मन सांसारिक विषयों को छोड़ता हैं सांसारिक विषयों को छोड़ने से निर्विषय की ओर होना होता है। तब ‘एहि तन कर फल विषय न भाई’ हो जाता है। मतलब यह कि छठी भक्ति में इन्द्रिय निग्रह होता है। सातवीं भक्ति है, मनोनिग्रह के लिए। मनोनिग्रह में एकाग्रता होती है और मन से चेतन आत्मा का संग छूट जाता है। यह अन्दर का रास्ता है। इस रास्ते में चलने को भक्ति कहते हैं। इसके अलावा जो भक्ति है, वह मनोनिग्रह के लिए ही है। पहले स्थूल उपासना करो। चाहे आप विष्णु की उपासना करो, शिव की उपासना करो वा शक्ति आदि की उपासना करो। इससे कुछ थोड़ा सिमटाव होता है; क्योंकि जिस रूप का ध्यान करोगे, उसमें कुछ सिमटाव होगा। श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा है कि- पहले मेरे सम्पूर्ण शरीर का, बाद में चेहरे का और फिर शून्य में ध्यान करो। दृष्टियोग से रूप का ज्ञान होता है और शब्दयोग से अरूप का ज्ञान होता है। आकाश में बिजली चमकती है, लेकिन ठोकर पहले लगती है। पहले ठोकर लगती है, आवाज होती है, फिर बिजली चमकती है। आदि में शब्द है, फिर ज्योति। कम्प और शब्द ऐसा है कि उसको कोई अलग-अलग नहीं कर सकता। शब्द के अभ्यास में जो खिंचाव है, उससे खिंचकर परमात्मा तक पहुँचा जाता है। चुम्बक सत्त शब्द है भाई, चुम्बक शब्द लोक ले जाई । लेइ निकारि होखै नहिं पीरा, सत्त शब्द जो बसै शरीरा ।। -दरिया साहब, बिहारी आदि नाम पारस अहै, मन है मैला लोह । परसत ही कंचन भया, छूटा बंधन मोह ।। -कबीर साहब ईश्वर तक पहुँचने के लिए नाम-भजन करो। नाम-भजन का भेद जानो। श्रवणात्मक ध्वन्यात्मक वर्णात्मक विधि तीन । त्रिविध शब्द अनुभव अगम, तुलसी कहहिं प्रवीण।। भेद जाहि विधि नाम महँ, बिनु गुरु जान न कोइ । तुलसी कहहिं विनीत वर, जां बिरंचि सिव होइ ।। बन्दउँ राम नाम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।। विधि हरिहर मय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो।। -गोस्वामी तुलसीदासजी मुँह से, मन से जो कहते-सुनते हो, वह निर्गुण शब्द नहीं है। नाम रूप दुई ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी।। -गोस्वामी तुलसीदासजी शब्द शब्द सब कोइ कहै, वो तो शब्द विदेह । जिभ्या पर आवै नहीं, निरखि परखि करि देह ।। -कबीर साहब वर्णात्मक नाम से ईश्वर की पहचान नहीं होती। जाति नाम और सिफाती नाम राधास्वामी पन्थ के दूसरे गुरु ने कहा था। झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार; इन पंच पापों को मत करो। मनुस्मृति में अष्ट घातकों की चर्चा की है अर्थात् मारने की आज्ञा देनेवाला, मारनेवाला, टुकड़ा-टुकड़ा करनेवाला, बेचनेवाला, खरीदनेवाला, पकानेवाला, परोसनेवाला और खानेवाला; ये अष्ट घातक हैं। पण्डितजी कहते हैं कि खाने में दोष नहीं है, ऐसा भी लिखा है। मैं कहता हूँ- नहीं खाय तो महाफल होगा, ऐसा भी लिखा है। तो खानेवाले तो महाफल से वि०चत रहेंगे। एक योगी ने लिखा कि जल-जन्तु वा पशु के गुण उसके मांस में रहते हैं, उसके खानेवाले में पाशविक वृत्ति हो जाती है। एक महीने मांस-मछली नहीं खाओ और तब तुम्हारा मन कैसा रहता है, देखो और दूसरे महीने में खाकर देखो कि कैसा रहता है? दोनों को मिलाओ तो आप स्वयं छोड़ दोगे। महात्मा गाँधीजी ने अण्डा खाने के लिखा, सो लोगों ने पकड़ लिया। लेकिन अण्डा नहीं खाने के विषय में जो उन्होंने कहा, उसको माननेवाले कोई नहीं। हमलोगों को स्वराज्य प्राप्त है, लेकिन सुराज्य नहीं है। यह सुराज्य लाना जनता के हाथ में है। पंच पापों को छोड़ने से स्वराज्य में सुराज्य होगा। ईश्वर सर्वव्यापक हैं, ऐसा हमलोग मानते हैं। कितनों का ख्याल है कि ईश्वर सर्वव्यापक नहीं हैं। कोई कहते हैं कि निर्गुण ब्रह्म को अपने तईं का भी ज्ञान नहीं हैं। जैसे चार चीजें मिलाकर गण्डा होता है, उसी तरह से बहुत से अणु चैतन्य को मिलाकर ईश्वर होता है।’ ये सब गलत बातें हैं। लोगां को इन प्रचारों से बचना चाहिए। ईश्वर-भक्ति का मोटा प्रचार भी बहुत होता है। मोटी भक्ति भी नहीं छोड़ो और सूक्ष्म भक्ति को भी नहीं छोड़ो। राम के उपासक शिव के उपासक नहीं हैं, ऐसा कहना संकीर्ण बुद्धि का काम है। शिव के उपासक राम के उपासक या भक्त नही हैं, संकीर्णता है। पहले सगुण, पीछे निर्गुण उपासना होती है। अनेक निर्गुणों के ऊपर के निर्गुण को जानो। सांख्य दर्शन के अनेक निर्गुण पुरुषों के ऊपर एक ही एक निर्गुण है। इसीलिए हम उनको जानें। जिस निर्गुण ब्रह्म को अपने तईं का ज्ञान नहीं हैं, ऐसे प्रचार से बचो। निर्गुण तक पहुँचने के लिए निर्गुण शब्द को अवश्य पकड़ो। शब्द की समाप्ति जहाँ हो गई, तब ‘निःशब्दं परमं पदम्’ हो जाएगा। झूठ सब दुर्गुणों का थैला है। झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार-इन पापों से बचो। कोई बड़ा है, लेकिन उसकी झुठाई पकड़ी जाय, तो उसका सारा बड़प्पन दूर हो जाएगा। द *************** *यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट के निकट गंगा तट पर 58वाँ वार्षिक महाधिवेशन के अवसर पर दिनांक 12. 4. 1966 ई0 को अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* *************** पूरा प्रवचन को पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद और साधुवाद! और अधिक से अधिक शेयर करें

मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

दिसंबर 31, 2024

योगी देवता के पद से भी आगे बढ़ जाते हैं -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार आप सभी धर्मप्रेमी के महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का दिव्य प्रवचन लेकर आया हूं। सद्गुरु महाराज का प्रवचन जीवन को नयी आध्यात्मिक पर ले जाने वाला है।इसे पूरा पढ़ें 🙏🕉️ जय गुरूदेव 🕉️🙏 योगी देवता के पद से भी आगे बढ़ जाते हैं-संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! आपलोग शान्तिप्रिय बनें। शान्ति कैसे प्राप्त हो, यह इस सत्संग से जानें। सत्संग में भक्ति के बारे में कहा जाता है, ईश्वर-स्वरूप का ठीक- ठीक निर्णय बताया जाता है। आपके अपने-अपने घरों में, ईश्वर संबंधी कोई- न-कोई शब्द बच्चों को रटाते हैं। यह बहुत अच्छी रिवाज है। ईश्वर को अनेक मानना गलती है। क्या! ईश्वर अनेक हो सकते हैं? जो भक्त ईश्वर को अनेक मानते हैं, वे कम जानते हैं। ईश्वर दो हो नहीं सकते, यह एकदम असम्भव है। अनेक ईश्वर को मानने की साम्प्रदायिक भावना आपस में झगड़े पैदा कर देती है। यथार्थ में ईश्वर एक ही हैं। नाम और रूप अनेक हैं। उपनिषद् का यह ज्ञान बहुत उत्तम है- वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ।। -कठोपनिषद् , अध्याय 2, वल्ली 2 अर्थात् जिस प्रकार इस लोक में प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है। ब्रह्म या आत्मा एक-ही-एक है, वह वायु के ऐसा सर्वव्यापक है और सर्व से परे भी है। ईश्वर का न केन्द्र होता है और न परिधि। जीव केन्द्र और परिधियुक्त है। ईश्वर केन्द्र और परिधि से परे है। उसकी सीमा कहीं नहीं होती है। उसी एक को राम, शिव, विष्णु आदि कहते हैं। यह नाम, रूप माया है। ‘नाम रूप दुइ ईश उपाधी।’ (गोस्वामी तुलसीदासजी) पशु-योनि में जो मन रहता है, वही मन मनुष्ययोनि में भी रहता है। इसीलिए पशु-योनि का संस्कार मनुष्यों में पाया जाता है। जीवात्मा परमात्मा का अभिन्न अंश है। यह अंश आवरण के कारण से माना जाता है। कितना भी बड़ा रूप बना लो, वह रहेगा आकाश के अंदर ही। ईश्वर माया के रूप को भरकर उससे बाहर कितना है, कोई नहीं कह सकता। ईश्वर इन्द्रियों को व्यक्त नहीं, परन्तु आपको व्यक्त है। जो कोई योगी होता है, वह देवता के पद से भी आगे बढ़ जाता है। जहाँ जाकर ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ होता है। मनुष्य वहाँ तक जा सकता है। परमात्मा की भक्ति हम माया रूप पाने के लिए नहीं, उनके स्वरूप को पाने के लिए करें। मनु-शतरूपा को माया रूप का दर्शन हुआ, लेकिन उनका कष्ट नहीं छूटा। इससे छूटने के लिए अमायिक रूप का दर्शन चाहिए। उन्हें आत्मा से ही पहचान सकेंगे। आत्मा को अपनी कैवल्य-दशा में आना चाहिए। शरीर माया से निर्मित घर है। इसको जबतक हम पार नहीं कर जाएँ, तबतक हम कैवल्य-दशा को प्राप्त नहीं कर सकते। अंदर चलने के लिए ध्यानाभ्यास करो। किसी रूप का ध्यान स्थूल ध्यान है। रूप ध्यान से सिमटाव होता है और सूक्ष्म ध्यान करने की योग्यता प्राप्त होती है। ध्यान करने के लिए कहीं घर छोड़कर भागने की आवश्यकता नहीं। कर्म करो और ध्यान भी करो। सज्जनों के धर्मानुकूल चलो। पंच पापों से रहित को सज्जन कहते हैं। दमशीलता का अभ्यास करो। दमशील इन्द्रियों को रोकने का स्वभाववाला होता है। दमशील केवल विचार से नहीं हो सकते। मन की सूतें इन्द्रियों से लगी हुई है। ध्यान से मन को इन्द्रियों की घाटों से समेटा जाता है। द *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 26. 12. 1965 ई0 के अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* ******* प्रवचन को पूरा पढ़ने के लिए आपका आभार। शेयर जरुर करें

शनिवार, 28 दिसंबर 2024

दिसंबर 28, 2024

योग के आरंभ का नाश नहीं होता -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार सभी धर्मप्रेमी के लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का प्रवचन लेकर हाजिर हूं। पूरा पढ़ें 🙏🕉️ *जय गुरूदेव* 🕉️🙏 योग के आरम्भ का नाश नहीं होता *प्यारे लोगो!* जो अचेत पड़ा हुआ हो, वह कुछ समझे बूझे-ऐसा नहीं हो सकता है। इसलिए संत- महात्मागण कहते हैं कि तुम सचेत हो जाओ। विषयों में लवलीनता अपने को अचेत रखना है। विषयों में लवलीनता नहीं हो, यह असम्भव नहीं है। पंच विषयोपभोग काल में जो जाग्रत दशा रहती है, उसमें थोड़ी-सी सचेतता है। तीन अवस्थाओं के अंदर हमलोग स्वभावतः गुजरते रहते हैं। इसमें विषय लवलीनता रहती है। जिस तरह ये तीनों अवस्थाएँ होती रहती हैं, उसी तरह एक चौथी अवस्था भी है। यह अवस्था योगी को प्राप्त होती है। जिन्होंने इसे पाने की ठीक विधि जानकर अभ्यास किया, उन्हें अवश्य ही इस अवस्था का ज्ञान होता है। चौथी अवस्था में यह स्थूल संसार खो जाता है। जैसे इस साधारण जागने की अवस्था में स्वप्नावस्था खो जाती है। केवल वाक्य-ज्ञान में निपुण होने से कोई विषयों से अनासक्त नहीं हो सकते। हमलोग सात्त्विक, राजस एवं तामस कर्म करते हैं। सात्त्विक कर्म का परिणाम वहाँ तक पहुँचाता है, जहाँ पहुँचकर तीनों गुणों से बाहर हुआ जाता है। तामस कर्म नीचे-नीचे की योनियों के भोगों को भोगता है। सात्त्विक कर्म ईश्वर की उपासना ही है। ईश्वर की उपासना इस तरह से करें कि वह हमें तीनों अवस्थाओं से ऊपर उठा सके। चौथी अवस्था का भेद बतानेवाले गुरु चाहिए। ऐसे गुरु के मिलने पर ही वह साधन हो सकेगा। पापों से छूटना ध्यान से ही हो सकता है और कर्मों से नहीं हो सकता। सुकर्मों को करते हुए जो ध्याना- भ्यास करते हैं, वही कर्मों के बंधनों से छूटते हैं। यदि शैल समं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम् । भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ।। -ध्यानविन्दूपनिषद् अर्थात् यदि अनेक योजनों तक फैले हुए पहाड़ के समान भी पाप हो तो वह ध्यानयोग से नष्ट हो जाता है। जिस कर्म का परिणाम दुःखद हो वा आवागमन करानेवाला हो, वह पाप है। ध्यान, लव लगाने को कहते हैं। कोई भी क्यों न हो, ध्यान सभी कर सकते हैं। ध्यान की युक्ति गुरु से सीखनी चाहिए। मैंने जो थोड़ा-सा अभ्यास किया है, उससे मुझे विश्वास हो गया है। इस अभ्यास में चलते रहो-अनवरत रूप से चलते रहो। अंत में वही होगा, जो संतों को प्राप्त हुआ है। ध्यानयोग के द्वारा सिमटाव होता है। सिमटाव से ऊर्ध्वगमन होता है। द्वैत का जहाँ तक विस्तार है, यदि ध्यान-योग से वहाँ तक की सीमा को पार कर गए तो सारे कर्मों-कर्म बंधनों से छूट जाता है। ध्यान-योग का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। एक-एक डेग चलते रहने से कितने कोस निकल जाते हैं, इसी तरह थोड़ा-थोड़ा नित्य नियमित रूप से ध्यानाभ्यास करते रहने से अवश्य लाभ होगा। ध्यानाभ्यासी का जब-जब जन्म होगा, मनुष्य योनि में ही जन्म होगा। इसका संस्कार कभी नष्ट नहीं होगा। भगवान कृष्ण ने कहा-‘योग के आरम्भ का नाश नहीं होता।’ भक्ति बीज बिनसै नहीं, जो युग जाय अनंत । ऊँच नीच घर जन्म ले, तऊ संत को संत ।। संतों की वाणी से दिलाशा होती है। अपने को पवित्र रखना चाहिए। *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 25. 12. 1965 ई0 के प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था।* इस प्रवचन को पूरा पढ़ें और शेयर करें 🙏

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

जुलाई 08, 2022

अंतर अजब बिलास-महर्षि हरिनंदन परमहंस जी महाराज

श्री सद्गुरवें नमः
आचार्य श्री रचित
पुस्तक "पूर्ण सुख का रहस्य" से लिया गया है।एक बार अवश्य पढ़ें 👇👇👇👇👇👇👇👇
: पूर्ण सुख का रहस्य
https://youtu.be/wmoLWGUsh_U
https://youtu.be/wmoLWGUsh_U
गो० तुलसीदासजी महाराज ने संतों के उत्कृष्ट गुणों का वर्णन करते हुए रामचरितमानस में लिखा है
 षट्विकार जित अनघ अकामा 
अचल अकिञ्चन सुचि सुख धामा ॥
 अमित बोध अनीह मितभोगी । 
सत्यसार कवि कोविद जोगी ॥

अर्थात् सन्त जन छः विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य) को जीते हुए, निष्पाप, वासना-रहित, स्थिरबुद्धि, धन-त्यागी, पवित्र, सुख के धाम, अति विशेष ज्ञानवान, इच्छा-रहित, अल्पभोगी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान और योगी होते हैं।

उपर्युक्त विशिष्ट गुणों को धारण करनेवाले संतजन परमात्मा रूपी धन को पाकर पूर्णकाम हो जाते हैं। उनके मन में संसार के अन्य किसी पदार्थों को पाने की चाहना नहीं होती। उन संत महापुरुषों के अतिरिक्त संसार के अन्य सभी लोगों के मन में विविध पदार्थों को पाने की चाहना बराबर होती रहती है।

सर्वसाधारण लोगों के मन में उस वस्तु को पाने की लालसा होती है, जो वस्तु उसे सुखदायक प्रतीत होती है। धन-सम्पत्ति, भोग-सामग्री, राज-पाट, पद-प्रतिष्ठा, स्त्री-पुत्र आदि की प्राप्ति में लोगों को सुख का बोध होता है, इस कारण स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में इन सभी वस्तुओं को पाने की चाहना होती है।

धन-सम्पत्ति वगैरह भरपूर मात्रा में उपलब्ध रहने पर भी अगर उसे और अधिक पाने की चाहना मन में रहती है, तो यह चाहना अपने में कमी का बोध कराती है और जहाँ कमी है, वहाँ पूर्ण सुख भला कैसे हो सकता है।

सांसारिक वस्तु लोगों को कितनी ही अधिक मात्रा में प्राप्त क्यों न हो जाय, उसकी प्राप्ति से उनकी लालसा की समाप्ति नहीं होती, बल्कि उनकी वह लालसा अधिकाधिक बढ़ती जाती है। जिस प्रकार धधकती हुई आग में घी डालने से वह बुझती नहीं और अधिक प्रज्वलित हो जाती है। गो० तुलसीदासजी महाराज ने 'विनय-पत्रिका' में लिखा है

बुझे न काम अगिनि तुलसी कहुँ, विषय भोग बहु घी ते। चाहना की पूर्ण रूप से समाप्ति आत्मसाक्षात्कार होने पर ही होती है। जिस आत्मा का साक्षात्कार होने पर सब चाहनाओं की समाप्ति हो जाती है, उसके संबंध में सद्ग्रंथों में कहा गया है कि उसी परम तत्त्व के आधार पर सम्पूर्ण सृष्टि टिकी हुई है। वह आत्म-तत्त्व इस विश्व-ब्रह्माण्ड में सर्वत्र समष्टि रूप में व्यापक होकर उससे कितना अधिक बाहर है, यह कोई बतला नहीं सकता। ऋषिओं और संतों ने उस परम तत्त्व को 'परमात्मा' कहकर अभिहित किया है।

वह सर्वव्यापी परमात्मा बड़ा ही विलक्षण है। उसकी विलक्षणता का वर्णन गो० तुलसीदासजी महाराज ने रामचरितमानस में इस प्रकार किया है

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु कान। कर बिनु करम करइ विधि नाना ॥ आनन रहित सकल रस भोग । बिनु बानी बकता बड़ जोगी ॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ धान बिनु बास असेखा ॥ असि सब भाँति अलौकिक करनो । महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ॥ ऐसे विलक्षण कर्म करनेवाले परम प्रभु परमात्मा की अद्भुत

• सामर्थ्य का बखान करते हुए गो० तुलसीदासजी महाराज ने कहा है कि उन प्रभु राम में असंख्य कामदेव के समान सुन्दरता है, करोड़ों दुर्गा के समान शत्रुओं का नाश करने की शक्ति है। वे परमात्मा सौ करोड़ इन्द्र के समान विलास करनेवाले और सौ करोड़ आकाश के समान परिमाण-रहित अवकाशवाले हैं। सौ करोड़ पवन के समान बड़े बली और सौ करोड़ सूर्य के समान प्रकाशवाले हैं। उनमें सौ करोड़ चन्द्रमा के समान शीतलता है तथा असंख्य काल के समान वे अत्यन्त कठिन, दुर्गम और अपार हैं। अपरिमित अग्नि के समान कठिनता से धरने के योग्य, अनगिनत पाताल के समान गहरे, अनगिनत यमराज के समान भयंकर, अनगिनत असंख्य तीर्थ के समान बहुत अधिक पवित्र, करोड़ों हिमालय के समान स्थिर और असंख्य समुद्रों के समान गहरे हैं। अनगिनत कामधेनु के समान समस्त इच्छाओं को पूर्ण करनेवाले और करोड़ों सरस्वती के समान बहुत अधिक चतुर तथा अनगिनत ब्रह्मा के समान सृष्टि करने में प्रवीण हैं। अनगिनत विष्णु के समान पालन करनेवाले और अनगिनत रुद्र के समान संहार करनेवाले हैं। सौ करोड़ कुबेर के समान धनवान और सौ करोड़ माया के समान छल की खान
तथा करोड़ों शेषनाग के समान भार-धारण करनेवाले हैं। इस तरह परम प्रभु परमात्मा की अद्भुत सामर्थ्य का बखान करते हुए गो० तुलसीदासजी महाराज ने अन्त में कहा है कि जिस तरह सूर्य को सौ करोड़ जुगनुओं के समान कहने में सूर्य की हीनता होती है, उसी तरह अपरिमित शक्तिवाले उस परम प्रभु परमात्मा के लिए सभी उपमाएँ अत्यन्त तुच्छ हैं। वास्तव में उन परम प्रभु परमात्मा की उपमा के योग्य और कुछ नहीं है। उनके समान वे ही हैं।

उस अद्भुत सामर्थ्य से युक्त परम प्रभु परमात्मा के स्वरूप का वर्णन हमारे परमाराध्य गुरुदेव महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज ने इस प्रकार किया है- 'जो परम तत्त्व, आदि-अन्त-रहित, असीम, अजन्मा, अगोचर, सर्वव्यापक और सर्वव्यापकता के भी परे है, उसे ही सर्वेश्वर, सर्वाधार मानना चाहिए तथा अपरा (जड़) और परा (चेतन); दोनों प्रकृतियों के पार में अगुण और सगुण-पर, अनादि-अनन्त-स्वरूपी, अपरम्पार शक्तियुक्त, देशकालातीत, शब्दातीत, नामरूपातीत, अद्वितीय, मन-बुद्धि और इन्द्रियों के परे जिस परम सत्ता पर यह सारा प्रकृति मंडल एक महान यंत्र की नाई परिचालित होता रहता है, जो न व्यक्ति है और न व्यक्त है, जो मायिक विस्तृतत्व-विहीन है, जो अपने से बाहर कुछ भी अवकाश नहीं रखता है, जो परम सनातन, परम पुरातन एवं सर्वप्रथम से विद्यमान है, सन्तमत में उसे ही परम अध्यात्म-पद वा अध्यात्म-स्वरूपी परम प्रभु सर्वेश्वर (कुल्ल मालिक) मानते हैं।'

जो सर्वशक्तिमान परम प्रभु परमात्मा अत्यन्त सघनता के साथ समस्त प्रकृति-मण्डल में व्यापक होकर उससे बाहर भी हैं, वे ही परम प्रभु अंश रूप से सब शरीरों में विद्यमान हैं; किन्तु उनका वह अंश मायिक आवरणों से आच्छादित रहने के कारण 'जीवात्मा' कहलाता है।

जीवात्मा जबतक शरीर में विद्यमान रहता है, तबतक शरीर तथा शरीरस्थ सभी इन्द्रियाँ सक्रिय जान पड़ती हैं अर्थात् देखना, सुनना, खाना, पीना, उठना, बैठना इत्यादि क्रियाएँ होती रहती हैं। शरीर में विद्यमान वही चेतन तत्त्व जब शरीर से निकल जाता है, तब शरीर और शरीरस्थ सभी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं। ऐसा होने पर लोग कहते हैं कि अमुक व्यक्ति मर गया।शरीर से जीवात्मा के निकल जाने पर शरीर नष्ट हो जाता है; परन्तु जीवात्मा का नाश नहीं होता। परम प्रभु परमात्मा का अंश होने के कारण यह जीवात्मा भी अविनाशी है। यह अविनाशी जीवात्मा एक शरीर के नष्ट हो जाने पर पुनः दूसरे शरीर को ठीक उसी प्रकार धारण कर लेता है, जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण कर लेता है। श्रीमद्भगवद्गीता के निम्नांकित श्लोक से इस कथन की सम्पुष्टि हो जाती है

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

ईश्वर - परमात्मा का अंश-रूप यह जीवात्मा यद्यपि अविनाशी, चेतन, मल-रहित (निर्मल) तथा सहज सुख की राशि है, तथापि मायिक आवरणों से युक्त हो जाने के कारण इस जीवात्मा को अपने सहज स्वरूप का विस्मरण हो गया है। शरीर का संग हो जाने के कारण यह मायिक सुखों का भोगी हो गया है। मायिक सुख स्वल्प, परिमित तथा विनाशी होने के कारण जीवात्मा को इससे पूर्ण सुख प्राप्ति नहीं हो पाती। की

संत-महापुरुष बतलाते हैं कि अगर पूर्ण सुख प्राप्त करना चाहते हो, तो परम प्रभु परमात्मा के धाम में चलो। उस परम प्रभु परमात्मा के धाम में जाने का मार्ग बाहर में नहीं है। वह मार्ग तुम्हारे अपने ही अन्दर में है।

परमाराध्य गुरुदेव महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज उस मार्ग के सम्बन्ध में कहते हैं कि वह अन्तर का मार्ग, जिसपर चलकर परमात्मा के धाम में पहुँच होती है, बड़ा ही अद्भुत है; लेकिन बिना सन्त सद्गुरु की शरण में गये उस अद्भुत मार्ग की जानकारी नहीं हो सकती

बिन दया सन्तन की 'मेंहीं', जानना इस राह को । हुआ नहीं होता नहीं, वो होनहारा है नहीं । परम दयालु गुरुदेव उस मार्ग की जानकारी करा देते हैं, जिसपर चलकर बहुत सुख मिलता है। गुरुदेव कहते हैं
[अद्भुत अन्तर की डगरिया, जापर चलकर प्रभु मिलते ॥ टेक ॥ दाता सतगुरु धन्य धन्य जो राह लखा देते । चलत पंथ सुख होत महा है, जहाँ अझर झरते ॥ अमृत ध्वनि की नौबत झहरत, बड़भागी सुनते । सुनत लखत सुख लहत अद्भुती, 'मेंहीं' प्रभु मिलते |

उस अन्तर- पथ पर अमृत की वर्षा होती है अर्थात् उस अन्तर-पथ पर चलनेवालों को ब्रह्मज्योति और ब्रह्मनाद की प्राप्ति होती है, जिससे अद्भुत सुख मिलता है; लेकिन जो बड़भागी होते हैं, वे ही अन्तर- पथ पर उस ब्रह्मनाद को सुन पाते हैं और उसके सहारे वे परम प्रभु परमात्मा के धाम में पहुँचकर परम सुख वा पूर्ण सुख को प्राप्त कर लेते हैं।
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महर्षि हरिनंदन बाबा कुप्पाघाट: https://www.youtube.com/playlist?list=PLud4sU56FoLnOF1jHHnl6Ad-wEtItI_Bs

बुधवार, 22 जून 2022

जून 22, 2022

अंतर अजब बिलास-महर्षि हरिनंदन परमहंस जी महाराज

पूज्य
आचार्य श्री महर्षि हरिनंदन परमहंस जी महाराज का प्रवचन 👇👇👇 पुस्तक 👇👇👇👇👇 -------------:अन्तर अजब बिलास:---------- सभी लोगों को ईश्वर ने बनाया। संसार के सभी जीवों का सृजन करनेवाले भी वे ही हैं। हमें जो कुछ भी चाहिए, उसे देनेवाले भी परमात्मा ही हैं। हम जो कुछ ग्रहण कर रहे हैं- अन्न, जल, हवा- सब कुछ के निर्माता भी वे ही हैं। यह सब परम प्रभु परमात्मा से प्राप्त करके भी हमारी स्थिति क्या है? हम शरीररूपी जेलखाने में पड़े हुए हैं। शरीर और संसार के कैदी बने हुए हैं। आप जैसा चाहते हैं, वैसा हो नहीं पाता। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन होता है, उसी तरह से जीवन में सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख का क्रम लगा हुआ है। दुःख कोई नहीं चाहता, फिर भी वह आता है और उसे हमें भोगना पड़ता है, उसपर हमारा कोई वश नहीं होता। हम जैसा नहीं चाहते हैं, वैसा हो जाता है। ईश्वर-परमात्मा की मौज के सामने किसी की एक नहीं चलती। हम दुःखी होते हैं। ऐसा कबतक होता रहेगा? जबतक हम बंधन में रहेंगे। ईश्वर की जो मौज होगी, उसी के अन्तर्गत हमें रहना पड़ेगा। हमने फूस के छप्परवाले मकान बनाये, सोचा उसी में गुजर-बसर होगी, आँधी आयी और छप्पर उड़ गया, कच्चा मकान ढह गया। खेत-बगीचों में अच्छी फसल लगायी, पत्थर (ओले) गिरे और सारी फसल बर्बाद हो गयी। जैसा नहीं चाहते थे, वैसा हो गया। हम स्वाभाविक रूप से दुःखी हुए। ऐसा तबतक होता रहेगा, जबतक संसार में रहेंगे; क्योंकि संसार में एकरूपता नहीं रहती। आप चाहें कि दिन ही हो, रात न हो, तो यह संभव नहीं है। दिन हुआ है, तो रात भी होगी ही; सुख मिला है, तो दुःख होगा ही। यह संसार का नियम है। सुख में हम हर्षित होते हैं और दुःख में विलाप करते हैं। गो० तुलसीदासजी महाराज ने लिखा है- जड़ हरषहिं सुख दुख बिलखाहीं। दोऊ सम धीर धरे मन माहीं ॥ यह सुख-दुःख सबके जीवन में आते हैं। ये दिन-रात की तरह जीवन में साथ लगे रहते हैं। सामान्य मनुष्य ही नहीं, शरीर धारण करके जब-जब भगवान भी इस पृथ्वी पर अवतरित हुए, उन्हें भी दारुण दुःख झेलने पड़े। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने राजसी सुख प्राप्त किया, तो वनवास का दुःख और पत्नी वियोग की पीड़ा भी सही, सम्राज्ञी सीताजी को वन-वन भटकना पड़ा और लक्ष्मणजी ने शक्तिवाण की मर्मतुद पीड़ा भोगी । द्वापर में पाण्डवों ने बारह वर्षों के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास में कौन-सी पीड़ा न भोगी होगी। राज-सुख में रहनेवाले पाण्डवों ने कितना कष्ट झेला होगा, यह अकल्पनीय है। राजा नल भी द्यूतक्रीड़ा में अपना राज-पाट सव हार गये। उन्हें भी अपनी पत्नी के साथ एक धोती में जंगलों की खाक छाननी पड़ी। कितनी विपदा उन्होंने वनवास में सही, ठिकाना नहीं। जंगल में पति-पत्नी दुर्योग से राह भटक गये और अलग-अलग हो गये। कहाँ राज सुख और कहाँ यह दुर्दशा! वे वर्षों बाद मिले। वर्षों बाद उन्हें अपना राज्य भी पुनः प्राप्त हुआ। महाभारत में इसकी लंबी कथा है। अतीव सुख में रहनेवाले बड़े लोगों के जीवन में जब दुःख आते हैं, तो वे दुःख भी बड़े होते हैं। साधारण लोग ऐसी विपदाएँ, ऐसे दुःख को सह नहीं सकते। जीवन में हमेशा एक-सी स्थिति नहीं रहती सूरदासजी महाराज ने लिखा है संपति विपति विपति सों संपति, देह धरे को यहै सुभाई। शरीर धारण करने का यही स्वभाव है। सबके जीवन में ऐसा होता है। सुख-दुःख की आँख-मिचौनी से हम बच नहीं सकते, भाग नहीं सकते। कहाँ भागेंगे? संसार और शरीर दोनों ही कैदखाने हैं। हम तो स्वयं शरीररूपी कैदखाने को ढोते फिरते हैं। मृत्यु की मार झेलकर फिर इसी कैदखाने में आ जाते हैं, संसाररूपी कैदखाने में पहुँच जाते हैं। इससे छूट नहीं पाते, जिसमें दैविक, दैहिक और भौतिक-त्रय ताप लगे ही रहते हैं। ईश्वरीय कोप से उपजता है दैविक ताप। रोग-व्याधि से क्लांत हुए शरीर को दैहिक ताप सताता है। एक जीव द्वारा दूसरे जीव को पहुँचनेवाला कष्ट भौतिक ताप कहलाता है। इन त्रय तापों के अलावा एक ताप और है, जिसे झेलने के लिए मनुष्य अभिशप्त है, वह है- मानसिक ताप । काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सर, द्वेष, छल, कपट, पाखंड से उत्पन्न पीड़ा मानसिक ताप देती है। इस ताप से चित्त हमेशा अशांत और व्यथित रहता है। यह सब तबतक होता रहेगा, जबतक हम शरीर और संसार के बंधन में बँधे रहेंगे। प्रश्न उठता है कि इन बंधनों से हम कैसे छूटें? गो० तुलसीदासजी महाराज ने बताया है गुरु बिनु भवनिधि तरै न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥ ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देव ही क्यों न हों, गुरु की कृपा के बिना कोई भी संसार-सागर के पार नहीं उतर सकता। यही सहजोवाई भी कहती हैं हरि ने जन्म दियो जग माहीं। गुरु ने आवागमन छुटाहीं ॥ अर्थात् ईश्वर ने हमें यह मानव-शरीर तो दिया लेकिन बारंबार जन्म-मरण का अपार दुःख सहना पड़ता है, उस दुःख से छुटकारा दिलानेवाले गुरु ही होते हैं। हरि ने पाँच चोर दिये साथा। गुरु ने लई छुटाय अनाथा ॥ ये पाँच चोर हमारी पाँच ज्ञान-इन्द्रियाँ हैं। इनको ही चोर कहा। इसलिए कि इन्हें जो ग्रहण नहीं करना चाहिए, जिसे ग्रहण करके अन्त में दुःख ही दुःख होता है, ये उसे ही ग्रहण करती हैं, उसी दिशा में जाती हैं। आँखें रूप, कान शब्द, नाक गन्ध, जिह्वा रस और त्वचा स्पर्श ग्रहण की ओर हमेशा प्रवृत्त रहती हैं। इन पाँचों ज्ञान-इन्द्रियों की इस प्रवृत्ति से होता क्या है? हमलोग रोज पाठ करते हैं- 'मृगवारि सम सबहीं प्रपञ्चन्ह, विषय सब दुखरूप हैं।' उस ओर जाकर ये इन्द्रियाँ केवल दुःख ही दुःख का कारण बनती हैं; फिर भी ये बारंबार उधर ही उन्मुख रहती हैं। शरीर की ये पाँचो इन्द्रियाँ पाँच चोर हैं-'हरि ने पाँच चोर दिये साथा। गुरु ने लई छुटाय अनाथा ॥' गुरु इनसे छूटने का यत्न बतलाते हैं, ताकि ये इन्द्रियाँ उन विषयों की ओर नहीं जायें। आँख में चेतनधार आती है, तब आँख इन्द्रिय देखती है बाहर की ओर। कहते हैं, इस तरह से साधन करो कि चेतनवृत्ति का सिमटाव हो जाय। अगर आँख में चेतन-धार न आये, तो आँख इन्द्रिय बाहरी विषय की ओर प्रवृत्त नहीं होगी। विषयों से प्राप्त सुख क्षण-भर में दुःख में परिवर्तित हो जाता है। जैसे किसी प्रिय जन के आगमन की प्रसन्नता (आँखों द्वारा देख लेने का हर्ष), उसकी पीड़ा जानकर तत्काल दुःख में बदल जाती है। पुत्र की प्राप्ति पर अपार सुख हुआ; किन्तु उसकी मृत्यु हो गई, तो उतनी ही भीषण पीड़ा हो गयी। कहाँ रहा सुख? तो सब विषय दुःख रूप हैं। इस तरह इन्द्रियों से प्राप्त सुख उसकी समाप्ति पर दुःख में बदल जाते हैं। अतः इन्द्रियों से होनेवाले सुख में दुःख भी लगा हुआ है। इन्द्रियों के माध्यम से जिस ओर जाकर सुख ही नहीं, दुःख भी हो जाता है, उस ओर से इन्द्रियों को लौटाना चाहिए। जो नहीं देखना चाहिए, जो ग्रहण नहीं करना चाहिए, उसे ही इन्द्रियाँ देखना और ग्रहण करना चाहती हैं; इसीलिए उन्हें चोर कहा गया है। गुरु ही इसका भेद बतला सकते हैं कि इन्द्रियों की तृष्णा से कैसे छूटा जा सकता है। ऐसा विलक्षण ज्ञान देनेवाले गुरु हैं 'हरि ने रोग भोग उरझायौ, गुरु जोगी कर सबै छुटायौ ।' संसार में रहकर रोग, भोग, भय सब कुछ होता है, गुरु ही इससे छूटने का उपाय बतलाते हैं। सहजोबाई कहती हैं- राम तजूँ पै गुरु न बिसाऊँ।' सहजोबाई के गुरु थे चरणदासजी महाराज। उनकी वाणी में हमलोगों ने सुना है गुरु बिन और न जान, मान मेरो कहो। चरण दास उपदेश, विचारत ही रहो ॥ कहते हैं, गुरु के समान और कोई नहीं। उन्होंने कारण वेद रूप गुरु होहिं, कि कथा सुनावहीं। बतलाया पंडित को धरि रूप, कि अर्थ बतावहीं ॥ वेदों में बहुत तरह की बातें हैं। गुरु भी ज्ञानस्वरूप होते हैं। वे वेद के समान ज्ञान की बातों को कहते जाते हैं, विविध कथाएँ, उपदेश वे सुनाते हैं, समझाते हैं। वेद को पढ़कर सब कोई उसके रहस्य को समझ नहीं पाते, पंडित (ज्ञानी) ही उसके अर्थ को समझा पाते हैं, वैसे ही गुरु भी ज्ञान की गूढ़ बातों को, संतों के कथनों को, उनके रहस्य को बतला समझा देते हैं। कल्पवृक्ष गुरुदेव मनोरथ सब सरौं । कामधेनु गुरुदेव छुधा तृस्ना हरें ।। जिस तरह कल्पवृक्ष के नीचे जाने से सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और कामधेनु के द्वारा सब तरह का भोजन प्राप्त होता है, ठीक वैसे ही गुरु की शरण में जानेवाले की सभी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं। जो गुरु को सदा याद रखते हैं, वे गुरु की शरण में हैं। जौं गुरु बसै बनारसी, शिष्य समुंदर तीर। एक पलक बिसरै नहीं, जो गुण होय शरीर॥ गुरु का शरीर चाहे दूर हो; परन्तु जो मन को गुरु के पास रखते हैं, समझिये कि वे गुरुरूपी कल्पवृक्ष की छाया में हैं। उनके मन में जो इच्छा होगी, वह पूर्ण होगी। गुरु की शरण में रहनेवाले को कोई कमी नहीं होती। गुरु सब कुछ देनेवाले हैं। जिन लोगों ने गुरु महाराज को प्रत्यक्षतः देखा है, उन्हें स्मरण होगा कि भक्त और श्रद्धालु जन नाना प्रकार की चीजें उनके लिए ले आते थे और वे चाहते थे कि उनके अर्जन में से थोड़ा-कुछ गुरुदेव की सेवा में लगे । ऐसे श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित चीजों कि संख्या इतनी अधिक होती थी कि गुरु महाराज के सेवक ही नहीं, उनके आस-पास के लोग भी तृप्त हो जाते थे। ऐसा कुछ भी नहीं था, जो उनको अलभ्य हो । राजा-महाराजा को भी जो दुर्लभ होता है, वह सन्तों के पास परमात्मा की दया से सहज ही आता है। गुरु सब कुछ देनेवाले होते हैं। अनेक देवताओं की कृपा से जो प्राप्त हो सकता है, उसे गुरुदेव अकेले ही देनेवाले हैं। गंगा सम गुरु होय, पाप सब धोवहीं । सूरज सम गुरु होय, तिमिर हरि लेवहिं ॥ गंगा के लिए कहा गया है कि वह पाप धोनेवाली है। बाहर की गंगा में स्नान करके कोई पाप मुक्त हो जाये, ऐसा नहीं होता। जो गुरु की शरण में पड़े रहते हैं, वे पापों से मुक्त हो जाते हैं। तो फिर गंगा का उदाहरण क्यों दिया गया? संत लोग कहते हैं कि 'बाहर में जो आप गंगा देखते हैं, सिर्फ वही गंगा नहीं है। गंगा अवश्य पाप धोनेवाली है; लेकिन वह कौन-सी गंगा है? 'गगन धार गंगा बहै, कहैं संत सुजाना हो।' अपने अन्दर में जो गंगा है, वही असली गंगा है। उस गंगा में जो स्नान करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। सन्तों ने आन्तरिक ज्योति और नादरूपी गंगा का उदाहरण दिया है। गुरु भी गंगा के समान सब पापों को धोनेवाले हैं। और 'सूरज सम गुरु होय, तिमिर हरि लेवहीं।' रात्रि का अंधकार दूर करने की सामर्थ्य किसे है? यह सामर्थ्य एकमात्र सूर्य में है, किसी और में नहीं। ठीक उसी तरह अज्ञान का जो घनान्धकार है, उसे दूर करने की सामर्थ्य सिर्फ गुरुदेव में है। गुरु महाराज कहते हैं-'तन-मन और धन को अर्पित करके गुरु चरणों की सेवा करो।' हम आसक्त होकर नहीं रहें-न तन में आसक्ति, न धन की आसक्ति और न मन में अहंकार की भावना। आसक्ति तजकर और सब कुछ गुरु के चरणों में अर्पित करके उनकी सेवा करें। गुरु महाराज की वाणी में आया है तन मन धन को अरपि, गुरूपद सेव करो। 'मेँहीँ' आज्ञा पालि, दुस्तर भव सुख से तरो ॥ वे कहते हैं कि अगर ऐसा करोगे, तो यह जो दुस्तर है, बड़ा भयंकर है, उसे सुख से तर जाओगे, पार कर जाओगे। जब अर्पित करेंगे तन, मन, धन को, तब गुरुदेव इस संसार सागर से पार कर देंगे, जिस संसार के लिए संत राधास्वामी ने कहा है कि भवसागर धारा अगम, खेवटिया गुरु पूर। नाव बनाई शब्द की, चढ़ बैठे कोइ सूर॥ यह संसार-सागर बड़ा भयंकर है। इसे कोई अपने आप तर नहीं सकता। अपना कोई बल नहीं, शक्ति नहीं, सामर्थ्य नहीं कि भवसागर को पार कर सकें। इसीलिए तो हमलोग रोज प्रार्थना करते हैं कि 'पर निज बल कछु नाहिं है, जेहि बने कमाई ।' गुरुदेव ही पार लगानेवाले होते हैं। कैसे पार लगायेंगे? जैसे हम विपत्ति में पड़ जाते हैं,तो लोगों को पुकारते हैं, लोग आते हैं और सहायता कर देते हैं। किसी का पाँव कीचड़ में फँस गया, उसने आवाज दी और लोगों ने उसे संकट से उबार लिया। उसी तरह से हम संसार सागर में, भव-पंक में धँसे हुए हैं। यहाँ लोगों को पुकारने से सहायता नहीं मिलेगी; क्योंकि संसार के समस्त जीव तो इसी पंक में धँसे हुए हैं। सन्त सद्गुरु ही हमारी पुकार सुनकर सहायता कर सकते हैं, वे ही संसार-सागर से, भव-पंक से जीव का उद्धार करनेवाले हैं। गुरु महाराज की वाणी का जो पाठ हुआ कि 'तुम साहब रहमान हो, रहम करो सरकार। भवसागर में हौं पड़ो, खेइ उतारो पार॥' 'रहमान कहते हैं, बहुत कृपा करनेवाले को, बहुत दया करनेवाले को। गुरु रहमान हैं, दयालु हैं, वे ही अनुग्रह करके इस संसार समुद्र से पार करनेवाले हैं। सूरदासजी महाराज भी कहते हैं- 'नीर अति गंभीर माया, लोभ लहरि तरंग।' वे संसार-सागर से उबारने के लिए प्रार्थना करते हैं अबके माधव मोहि उधारि । मगन हौं भव अंबु निधि में, कृपासिंधु मुरारि ॥ वे कहते हैं- 'मैं तो अज्ञानता के कारण इस भव-सागर में आ पड़ा हूँ और इसी में मग्न हूँ। आप कृपासिंधु हैं, दया करके हे माधव! मुझे उबारिये। इस संसार समुद्र में मायारूपी जल भरा हुआ है। संसार समुद्र का लंघन मेरे वश की बात नहीं है।' 'नीर अति गंभीर माया' - माया रूपी जल अगाध है, इसे पार करना संभव नहीं है। जो इसमें आ पड़ता है, इसे ही सत्य समझने लगता है और इसी में रमा रहता है। 'लिये जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग।' यह लोभ हमें खींचते हुए अगाध जल में लिये जा रहा है, जिसमें 'गहे ग्राह अनंग'। 'अनंग' कहते हैं कामदेव को काम की इच्छा को । इस अगाध जल में अनंग है, जिसने हमें पकड़ रखा है। 'मीन इन्द्रिय अतिहि काटत, मोह अघ सिर भार।' इन्द्रियरूपी मछलियाँ हमें काटती हैं, जैसे बच्चा भूख लगने पर माता को काटता-नोचता है, ठीक उसी तरह इन्द्रियाँ भी अपने-अपने भोग के लिए हमें पीड़ित करती हैं। आँख सुन्दर रूप देखना चाहती है, कान अच्छा शब्द सुनना चाहता है, नासिका सुगन्ध चाहती है, जिह्वा अच्छा रस चाहती है और त्वचा स्पर्श-सुख के लिए लालायित रहती है, जिस ओर जाकर दुःख ही दुःख होता है। सन्त राधास्वामीजी महाराज कहते हैं हे इन्द्रियन तुम भोग दिवानी, क्यों फँसो काल की फाँस । हे इन्द्रियो ! तुम भोग की ओर जा तो रही हो; लेकिन उस ओर जाने से काल के फंदे में फँसोगी। जैसे मछली चारे के लोभ में वंशी में फँस जाती है, उसी तरह तुम भी फँस जाओगी। जल्दी से अब मुख को मोड़ो, अंतर अजब विलास । जैसे बने तैसे करो कमाई, धर चरनन विश्वास ॥ वे कहते हैं कि बाहर से अपने मुख (वृत्ति, ख्याल) को मोड़ो। तुम्हारे अन्दर में अद्भुत सुख है- 'अन्तर अजब विलास'। जिस तरह से हो सके, कमाई करो; अपने अन्दर का वह धन प्राप्त करो, जो परम सुख देनेवाला है। इस कमाई को करने का ज्ञान देनेवाले संत सद्गुरु ही हैं, अन्य किसी से यह ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। गुरु महाराज की वाणी के अन्तिम चरण में हमने अभी-अभी सुना है- 'गुरु की अमित बलिहार।' सत्य है कि गुरु की महिमा अपरंपार है, उनसे बड़ा अपना कोई हितैषी नहीं है। अतः हमें चाहिए कि गुरु की शरण ग्रहण करें। उनके चरणों में अटल श्रद्धा रखें। हमारा मन भाग-भाग जाता है। इस चंचल और भाग-भाग जानेवाले मन के लिए सन्त कबीर साहब ने कहा है सिपाही मन दूर खेलन मत जैये । दूर खेलन से मनुवाँ दुखित होय... हमारा मन संसार की ओर भाग जाता है, बाहरी बातों को सोचने लग जाता है। गुरु महाराज के निकट रहकर भी दूर-दूर चला जाता है। संत कबीर साहब यही कहते हैं कि मन को दूर ले जाओगे, विषयों की ओर ले जाओगे, तो दुःख होगा। बाहर की ओर मत जाओ। अपने आपको बाहर से मोड़कर अन्दर की ओर करो, तब शाश्वत सुख की प्राप्ति होगी, शांति की प्राप्ति होगी। यह तब होगा, जब हम गुरु महाराज के चरणाश्रित होकर रहेंगे। जबतक उनके चरणाश्रित होकर नहीं रहेंगे, अपने अन्दर के सुख की प्राप्ति नहीं होगी। 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 कमेंट जरुर करें वीडियो प्रवचन 👇👇👇 https://www.youtube.com/playlist?list=PLud4sU56FoLnOF1jHHnl6Ad-wEtItI_Bs

बुधवार, 4 अगस्त 2021

अगस्त 04, 2021

विषयों का उपभोग किस रूप में-सदगुरु मेंहीं

।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।
 विषयों का उपभोग किस रूप में?
 (साभार – सत्संग-सुधा सागर)

बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि।
 महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।

धर्मानुरागिनी प्यारी जनता!
आपलोग अपने-अपने जीवनकाल में बरत रहे हैं। 
यह जीवनकाल कबतक रहेगा, कोई ठिकाना नहीं। सम्भव है कोई 50 वर्ष, कोई 80 वर्ष, कोई 100 वर्ष और कोई ज्यादे भी रहे। 
किंतु इस जीवन-काल के पहले भी समय समाप्त हो जाय, संभव है। यह जीवनकाल एक शरीर का है। 
आप शरीर नहीं हैं। 
बाहर की इन्द्रियाँ नहीं, भीतर की इन्द्रियाँ भी नहीं हैं। समस्त इन्द्रियों और शरीर के परे आप हैं।
इन्द्रियाँ सह शरीर जड़ हैं। किसी भी मृत शरीर में ज्ञान नहीं रहता है। जीवित शरीर में ज्ञान रहता है। 
यह ज्ञानमय पदार्थ चेतन आत्मा है।

 गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लिखा है –
 ईश्वर अंश जीव अविनाशी। 
चेतन अमल सहज सुखरासी।।

आप ईश्वर-अंश हैं, अविनाशी हैं, चेतन हैं। एक शरीर का जीवन बहुत थोड़ा है। आप अजर, अमर, अविनाशी हैं। इस मरणशील शरीर में आपका रहना है, यह रहना कबसे है, ठिकाना नहीं।
 आपने एक ही शरीर को नहीं, अनेक शरीरों को भोगा है। प्रत्येक शरीर का जीवनकाल कुछ-न-कुछ रहा है। आपने अनेकों शरीर को भोगा है और फिर इस शरीर को भोग रहे हैं। एक शरीर का जीवन सौ, सवा सौ वर्ष का है और आपका जीवन अनंत है। 
एक शरीर के जीवन में जीवन भर आप सुखी रहना चाहते हैं। परंतु दुःख आए बिना बाज नहीं रहता। जैसे दिन के बाद रात, रात के बाद दिन, इसी तरह सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख अनवरत रूप से आते रहते हैं। 
इन दुःखों को छुड़ाने के लिए लोग बहुत उपाय करते हैं; किंतु दुःख पीछा नहीं छोड़ता।

एक शरीर के दुःख को दूर करने का काम करते हैं, यह अच्छा करते हैं। किंतु आपके स्वयं का जो जीवन है, उस सुख के लिए भी सोचें।
 इसके लिए लोग ख्याल नहीं करते।
लोग एक पहर, आधे पहर के दुःख को पसन्द नहीं करते हैं, उसे अच्छा नहीं कहते हैं; तब लम्बे जीवन के दुःख को मिटाने के लिए कोशिश नहीं की जाय, ठीक नहीं।
यह शरीरवाला जीवन इहलोक और परलोक में कब तक होता रहेगा, ठिकाना नहीं।
 इस लोक-परलोक से छूटने के लिए जबतक यत्न नहीं किया जाय, तबतक दुःख उठाते रहना होगा। स्वर्ग में भी दुःख नहीं छोड़ता। 
ऊँचे-ऊँचे स्वर्ग-लोक में भी समय बंधा रहता है। जबतक कर्मफल है, तबतक वहाँ का सुख भोगते हैं। 
फिर वह समय बीतने पर वहाँ से लौटाया जाता है। 
इस आवागमन का चक्र बहुत लम्बा है।
 इससे तबतक नहीं छूटते, जबतक शरीर में रहने का जीवन समाप्त न किया जाय। इसलिए 
सबको चाहिए कि अमर जीवन के लिए कोशिश करें।
 यह जीवन शरीर-रहित जीवन है। 
शरीर-रहित जीवन परमात्मा में रहना है। 
वहाँ से कभी हटना नहीं है। कर्मफलों को पार करके ही कोई वहाँ पहुँच सकता है। 
इसका यत्न मनुष्य-शरीर में करना चाहिए।
संसार में जितने शासित देश हैं, सबके शासक चाहते हैं कि हमारे देश के रहनेवाले सुखी रहें। उनके बहुत प्रयास करने पर भी जितना सुख होना चाहिए, उतना सुख नहीं ला सकते। 
केवल हमारा देश ही नहीं, संपूर्ण संसार के लोग पूर्ण सुखी नहीं हैं।
 केवल इसी युग में नहीं, सब युगों की बात है।
भगवान श्रीराम त्रेतायुग में राज्य करते थे। उनका इतना सुन्दर प्रबंध था कि प्रजा सुखी थी। किंतु वहाँ दुःख नहीं था, ऐसी बात नहीं। 
इतना अधिक सुख था कि उस सुख में दुःख बिला जाता था। इन सुखों को ही भगवान श्रीराम ने पूर्ण नहीं समझा। इसलिए उन्होंने सबलोगों को बुलाकर शिक्षा दी।
आजकल भी लोग समझने लगे हैं कि केवल भौतिक सुख से पूर्ण सुखी कोई नहीं हो सकता।
 आध्यात्मिक सुख से पूर्ण सुखी होंगे। आध्यात्मिक सुख वह है, जो इन्द्रियों के सुख में नहीं है। वह परमात्मा का सुख है।
इन्द्रियों और शरीरों के भोग में वह सुख नहीं है। वह चेतन आत्मा से भोगने में सुख है। उस ओर चलने के लिए अपने को बहुत पवित्र करके रहना पड़ता है। यह केवल शारीरिक पवित्रता नहीं। 
शारीरिक पवित्रता के सहित मन-बुद्धि की पवित्रता है, मन में कुविचार न आवे, मन बुराई की ओर न जाए, तब अंतःकरण की पवित्रता है, ऐसा समझना चाहिए।
 अंतःकरण की पवित्रता में यह गुण है कि इससे संसार में भी प्रतिष्ठा होती है। यदि मन बुरे-बुरे कर्मों को करना चाहे, इन्द्रियों को बुरे-बुरे कर्मों की ओर प्रेरण करता है तो वह बहुत झंझट में पड़ता है। 
धनीमानी होते हुए भी उसकी प्रतिष्ठा नहीं होती। किंतु जो अंतःकरण की पवित्रता से रहता है, तो धनी नहीं होने पर भी, विद्वान नहीं होने पर भी लोग उनकी प्रतिष्ठा करते हैं। अंतःकरण की शुद्धिवाले को संसार में और परलोक में-दोनों में सुख होगा। 
भगवान श्रीराम ने इन्हीं बातों को समझकर आध्यात्मिक शिक्षा दी है।
 भगवान श्रीराम ने कहा -
बड़े भाग मानुष तनु पावा। 
सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा।।
 अर्थात्‌ बड़े भाग्य से मनुष्य-शरीर मिला है। यह शरीर देवताओं को दुर्लभ है, ऐसा सद्ग्रंथों ने भी गाया है। ऊँचे कुल, धनवान, बलवान हैं, इसलिए आपका बड़ा भाग्य है, ऐसा नहीं कहा। बल्कि मनुष्य-शरीर मिला है, इसलिए बड़ा भाग्य है।
 लोग समझते होंगे कि मनुष्य देवता को पूजते हैं, देवता मनुष्य शरीर क्यों चाहेंगे। उपनिषद्‌ की एक कथा है। उपनिषद्‌ उसको कहते हैं, जिसमें प्राचीनकाल के ऋषियों ने अपना विचार प्रकट किया था।
 उपनिषद्‌ की कथा इस प्रकार है -
 एक समय ब्रह्माजी के पास देव, दानव और मानव तीनों गए। तीनों ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की कि हमलोगों को उपदेश दिया जाय। 
ब्रह्माजी ने तीनों को अपने उपदेश में मात्र 'द’ कहा।
 इसमें ब्रह्माजी ने देवों को ‘दमन’ अर्थात्‌ इन्द्रिय-दमन, दानव को ‘दया’ और मानव को ‘दान’ की शिक्षा दी। मनुष्य से देवता माया की शक्ति अधिक रखते हैं।
 किंतु दमनशील का स्वभाव उनमें नहीं है। 
इसीलिए मनुष्य का शरीर वे चाहते हैं कि मनुष्य शरीर मिलने से इन्द्रिय-दमन होगा।
 अर्जुन स्वर्ग गए थे। उनकी सुन्दरता देखकर वहाँ की अप्सरा उन पर मोहित हो गई। उसने एकान्त में अपनी मनोभावना अर्जुन के सामने प्रस्तुत की, परंतु अर्जुन अविचल रहे। इसपर उस अप्सरा ने असंतुष्ट होकर अर्जुन को शाप दिया।
 देवताओं को इन्द्रिय-दमन की शक्ति नहीं है। यहाँ ही देखिए, जिसको धन है, वे किस तरह रहते हैं। हो सकता है, कोई-कोई धनवान संयमी हों।
जिनको भोग्य पदार्थ विशेष मिलते हैं, उनको विषय-विलास विशेष रहता है।
 देवताओं में इन्द्रियों के भोग भोगने की शक्ति विशेष है। इसलिए इन्द्रियों के भोग में बहुत प्रवृत्त होते हैं।
जब मनुष्य ब्रह्मा के पास गए तो, उनको ब्रह्मा ने द' की शिक्षा दी। मनुष्य ने समझा कि ब्रह्मा ने 'द’ कहकर दान देने की शिक्षा दी है। 
हम मनुष्यों में बड़ी कृपणता है। तनबल, बुद्धिबल, धनबल सबको चुराते हैं। तन, मन, धन से दूसरों की भलाई नहीं करते हैं।
इसीलिए ब्रह्माजी ने इन कृपणता को दूर करने के लिए द' कहकर दान देने कहा। फिर आपने भगवान राम के उपदेश में सुना - 'साधन धाम मोक्ष कर द्वारा।' अर्थात्‌ 
यह शरीर साधन का घर है। जो साधन करना चाहे, इस शरीर में रहकर हो सकता है।
 जिस तरह एक कोई भण्डार हो, उससे जो लेना चाहो, ले लो। उसी तरह यह शरीर साधनों का भण्डार है। इससे जो कीजिए, सो होगा। आप सर्कसवाले को देखते होंगे, कैसा-कैसा खेल दिखाता है, यह सब साधन उन्होंने किया है। यह तो स्थूल साधन है। हमारे यहाँ ऋषि, मुनि, योगी लोग हो गए हैं। 
उन लोगों ने इन्द्रियों को दमन किया है, जिनको दमन करना कठिन है। इस शरीर में मोक्ष का द्वार भी है।
 शरीर के जितने तल हैं, संसार के भी उतने ही तल हैं। जब हम स्थूल शरीर में रहते हैं, तो हम स्थूल संसार में रहते हैं। उसी तरह से 
सूक्ष्म, कारण, महाकारण आदि शरीरों के भी जिस तल पर रहते हैं, संसार के भी उसी तल पर रहते हैं। शरीर के जिस तल को छोड़ते हैं, संसार के भी उस तल को छोड़ते हैं।
जो शरीर के सभी तलों से ऊपर उठ जाते हैं, वे संसार के सभी तलों से परे हो जाते हैं।
 जो शरीर से निकलता है, वह संसार से भी छूट जाता है।
 जाग्रत से जब हम स्वप्न अवस्था में जाते हैं तो स्थूल शरीर का ज्ञान नहीं रहता है, तो स्थूल संसार का भी ज्ञान नहीं रहता है। पिण्ड को पार करो तो ब्रह्माण्ड को भी पार कर जाओगे। 
इसलिए ऐसा कोई रास्ता मिले, जिससे इस शरीर से, संसार से छूटा जाय। इस शरीर में छोटे-छोटे बहुत छिद्र हैं, बड़े-बड़े नौ - आँख के दो, नाक के दो, कान के दो, मुँह का एक और मल-मूत्र के दो छिद्र हैं। 
छोटे-छोटे छिद्र झरोखे हैं। यह शरीर नौ द्वारों का घर है। नौ द्वारों में से एक भी द्वार ऐसा नहीं है, जिससे शरीर से छुटकारा मिले, मोक्ष मिले। 
ये सब द्वार भीतर से बाहर जाने को हैं और वह द्वार जिससे भीतर प्रवेश कर सकते हैं, दसवाँ द्वार है।
 वह आपकी आँख के पास है।
 आपलोग शिवजी की प्रतिमा में तीन आँखें देखते होंगे। 
शिवनेत्र इसलिए कहलाता है कि जो उसको प्राप्त करता है, उसका कल्याण होता है।
 यह रास्ता ब्रह्म की ओर जाने का है।
गुरु नानक साहब ने कहा -
 नउ दरवाजे नवै दर फीके रसु अमृतु दसवै चुअीजै।
और - 
नउ दर ठाके धावतु रहाए दसवैं निज घरि वासा पाये।
 इन नौ द्वारों में रहते हुए आप कल्याण नहीं पाते हैं, दसवें द्वार में जाए, तब बहुत कल्याण होगा। 
दसवें द्वार में जाने के लिए बड़ी एकाग्रता की जरूरत होती है।
 एकाग्रता में शान्ति आती है।
 आपलोग जब जगने से सोने के लिए कोशिश करते हैं तो एक अवस्था आती है, जिसको तन्द्रा कहते हैं, उस समय शरीर कमजोर होता जाता है, शक्ति भीतर की ओर खिंचती जाती है। उस समय कुछ सुनते हैं और कुछ भूलते हैं। किसी इन्द्रिय का वहाँ स्वाद नहीं है। अंदर सरकाव में चैन मालूम होता है।
 सोने के समय मन की चंचलता छूटती है। यदि मन में कोई चिन्ता लगी हो तो नींद नहीं आवेगी।
 सोने के समय अंदर प्रवेश करते समय सब ख्याल छूटते जाते हैं, एक चैन मालूम होता है, यह तो स्वाभाविक सबको होता है। 
जो कोई भजन करता है, उसको विचित्र आनंद मालूम होता है।
 संत कबीर साहब ने कहा है –
भजन में होत आनंद आनंद।
 बरसत बिसद अमी के बादर, भींजत है कोइ संत।।
 जो अंतर की ओर चलता है, वह संसार की ओर से छूटता है, जो संसार की ओर से छूटता है, वह परमात्मा की ओर जाता है।
 जो उस दसवें द्वार से गुजरता है, वह मोक्ष की ओर जाता है, वह भक्ति करता है। दसवें द्वार की ओर जाना भक्ति करनी है। 
जिसने इस मनुष्य शरीर को पाकर अपना परलोक नहीं सुधारा, वह दुःख पाता है। परलोक दो तरह के होते हैं - एक स्वर्गादि और दूसरा मोक्ष।
 यहाँ परलोक स्वागादि के लिए है। 

इसीलिए भगवान श्रीराम ने कहा -
 सो परत्र दुःख पावइ, सिर धुनि धुनि पछताय।
 कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं, मिथ्या दोष लगाय।।
 अर्थात्‌ जो मनुष्य-शरीर पाकर अपना कल्याण नहीं कर लेते हैं, वे अंत में दुःख पाते हैं और सिर धुन-धुनकर पछताते हैं। वे काल, कर्म और ईश्वर को झूठ ही दोष देते हैं। 
ईश्वर की बड़ी कृपा है कि मनुष्य का शरीर मिला है।
 ईश्वर की विशेष कृपा को आप प्राप्त कर सकते हैं, जब आप परमात्मा का भजन कीजिए। काल आपके अधिकार में है। 
समय को सोकर, बैठकर खो सकते हैं, कुछ काम करके बिता सकते हैं, ईश्वर-भजन करके बिता सकते हैं। समय किसी को कुछ करने में रोकता नहीं है।
कर्म का भी दोष देना बेकार है। अपने प्रारब्ध को अपने से ही बनाना होता है। 
इसलिए काल, कर्म, ईश्वर को दोष देना उचित नहीं। 

फिर भगवान श्रीराम ने कहा -
एहि तन कर फल विषय न भाई। 
स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदाई।।
 स्वर्ग में भी पुण्य के अंत में दुःख ही होता है। 
विषय-सुख से अपने को निवृत्त करो।
 स्वर्ग-सुख का लालच भी छोड़ो।
 पशुओं के शरीर में भी इन्द्रियों के सुख का भोग है। मनुष्य भी यदि इन्द्रियों के भोगों में बरते तो पशु से क्या विशेषता हुई?
 भगवान राम ने कहा - 
पंच विषयों से पर पदार्थ के लिए चेष्टा करो अर्थात्‌ परमात्मा को प्राप्त करने कहा।
 भगवान राम ने कहा -
नरतन पाइ विषय मन देहीं। 
पलटि सुधा ते सठ विष लेहीं।।
ताहि कबहुँ भल कहहिं न कोई।
 गुंजा ग्रहइ परसमनि खोई।।
 मनुष्य-शरीर पाकर जो विषय में मन लगाता है, वह अमृत छोड़कर विष लेता है। 

आगे भगवान श्रीराम कहते हैं -
आकर चारि लाख चौरासी।
 जोनि भ्रमत यह जीव अविनासी।।
अंडज, पिण्डज, स्वेदज और ऊष्मज; इन चार खानियों में 84 लाख योनियाँ हैं।
 माया की प्रेरणा से काल, कर्म, स्वभाव, गुण के घेरे में पड़कर सदा अविनाशी जीव घूमा करता है।
 मनुष्य 84 लाख योनियों को भोगते हुए आया है। इसलिए इससे छूटने का उपाय करो।
 इससे छूटने का उपाय है - वायु, नाव और मल्लाह। ईश्वर की कृपा 'सन्मुख मरुत’ या अनुकूल पवन है। अनुकूल इसलिए कि नाव को पश्चिम जाना चाहिए, किंतु नदी का बहाव पूरब की ओर ले जाता है।
 यदि पुरबैया हवा चल पड़े तो वह हवा उसको पूरब की ओर जाने से रोकती है। 
उस नाव पर मल्लाह पाल टाँग देता है, तब नाव भाठे से सिरे की ओर चली जाती है। 
मनुष्य-शरीर नाव है, ईश्वर की कृपा अनुकूल वायु है और सद्गुरु मल्लाह हैं। 
सद्‌गुरु वह है, जो सद्ज्ञान में बरते, जो दूसरों को सद्ज्ञान देता हो, सत्स्वरूप परमेश्वर का भजन करता हो और दूसरों को भजन करने का प्रेरण देता है।

 मुक्ति मारग जानते साधन करते नित्त।।
 साधन करते नित्त सत्त चित्त जग में रहते।
 दिन दिन अधिक विराग प्रेम सत्संग सो करते।।
 दृढ़ ज्ञान समुझाय बोध दे कुबुधि को हरते। 
संशय दूर बहाय संतमत स्थिर करते।।
 'मेँहीँ‘ ये गुण धर जोई, गुरु सोई सतचित्त।
 मुक्ति मारग जानते साधन करते नित्त।।

 सदगुरु मल्लाह हैं। जो इन साज-सामानों को पाकर अपना कल्याण नहीं कर लेते हैं, वे कृत-निन्दक, मंदमति और आत्महत्या के दोष को पाते हैं।
 इसलिए लोगों को चाहिए कि भगवान श्रीराम के उपदेश को मानें और विषय को छोड़कर निर्विषय की ओर चलें।

 जैसे दवाई की मात्रा के अनुसार दवाई-सेवन करते हैं, इसी तरह संसार में रहने के लिए दवाई के रूप में विषयों का उपभोग कीजिए, उसमें आसक्त नहीं होइए।
संत लोग जो कहते हैं, उनके अनुकूल चलना चाहिए। यदि भला भी होना चाहो और बुराई भी करो तो कैसे हो सकता है।
 इत्रदान में गोबरवाली अंगुलि देना ठीक नहीं। 
ईश्वर का भजन करना चाहते हो, तो अपने अंतःकरण को शुद्ध करो।
 अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए अपने को पापों से बचाओ। पापों से बचने के लिए झूठ छोड़ो। 
झूठ ऐसा झोला है, जिसमें सब पाप छिपा रहता है।
 कोई पाप चुराकर करो तो वह प्रकट हो जाएगा। रामकृष्ण परमहंसजी ने कहा है कि 
पाप और पारा को कोई हजम नहीं कर सकता है।
 जैसे कोई छिपकर पारा खा ले तो वह शरीर को फोड़कर निकल जाता है। उसी तरह से छिपकर किया हुआ पाप भी कभी-न-कभी प्रगट हो ही जाता है। 
चोरी, नशा, हिंसा, व्यभिचार मत करो।
 स्त्री-पुरुष का अनैतिक संबंध जोड़ना व्यभिचार है। वैवाहिक मर्यादा को तोड़कर अनैतिक संबंध जोड़ने- वाली नारी व्यभिचारिणी है और अनैतिक संबंध जोड़नेवाला पुरुष व्यभिचारी है। 
तम्बाकू भी नशा है। 
संत कबीर साहब ने कहा है –
भाँग तम्बाकू छूतरा, अफयूँ और शराब।
 कह कबीर इनको तजै, तब पावै दीदार।।

इतना ही नशा नहीं है।
मद तो बहुतक भाँति का ताहि न जानै कोय। 
तन मद मन मद जाति मद, माया मद सब लोय।।
 विद्या मद और गुनहु मद, राजमद्द उनमद्द। 
इतने मद को रद्द करै, तब पावै अनहद्द।।

झूठ को तुरत छोड़ो। ऐसा नहीं कि आज पाँच झूठ बालते हैं, तो कल चार झूठ बोलेंगे। हिंसाओं से बचो।

 अष्टघातक मनुजी ने बताए हैं –
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी।
 संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः।।

अर्थात् 1. पशुवध की आज्ञा प्रदान करनेवाला, 
2. शस्त्र से मांस काटनेवाला,
 3. मारनेवाला, 
4. बेचनेवाला, 
5. मोल लेनेवाला, 
6. मांस पकानेवाला, 
7. परोसने के लिए लानेवाला, 
8. खानेवाला; ये आठो घातक हिंसा करनेवाले ही कहलाते हैं। 
हिंसा के सिलसिले में मत्स्य-मांस नहीं खाओ। 
दूसरी बात यह है कि आपका शरीर पवित्र है और पशु-पक्षी का शरीर अपवित्र है।
पवित्र शरीर में अपवित्र जीव-जन्तुओं का मांस लेना ठीक नहीं। संसार में इतने मीठे-मीठे फल हैं, मिठाइयाँ हैं कि मनुष्य उतने खा नहीं सकते।
हिंसा दो तरह की है - वार्य और दूसरा अनिवार्य। 
वार्य हिंसा से बचा जा सकता है। 
अनिवार्य हिंसा से कोई बच नहीं सकता।
 कृषि कर्म में जो हिंसा होती है, वह अनिवार्य है।
 कृषि द्वारा यदि अन्न का उत्पादन नहीं हो तो लोग भूखों मर जायँ। लोग कहा करते हैं कि 
बिना मत्स्य-मांस खाए शरीर स्वस्थ नहीं रहता; लेकिन इस विचार को महात्मा गांधी ने नहीं माना।
 एक बार कस्तूरबा गांधी बीमार हो गई थी। उनको इतनी कमजोरी आ गई थी कि जिसके लिए डॉक्टर ने गोश्त का शिरवा खाने के लिए कहा था।
 गांधीजी ने कहा - ‘कस्तूरबा स्वतंत्र है, वे अपनी जीवनरक्षा के लिए गोश्त का शिरवा लेना चाहें, ले सकती हैं।’ 
लेकिन जब महात्मा गांधी ने उनसे पूछा तो कस्तूरबा गांधी ने कहा - ‘मैं आपकी गोद में मर जाऊँगी, लेकिन गोश्त का शिरवा नहीं खा सकती।’ 
गांधीजी ने स्वयं कस्तूरबा का प्राकृतिक इलाज किया, जिससे वे बहुतांश में स्वस्थ हो गईं। 
लेकिन भोजन में नमक का छोड़ना आवश्यक था। कस्तूरबा गांधी छोड़ने में असमर्थ थी। 
महात्मा गांधी ने कहा - ‘अब मैं भी नमक नहीं खाऊँगा।’ उन्होंने स्वयं नमक खाना छोड़ दिया। 
लाचार होकर कस्तूरबा ने भी नमक खाना छोड़ दिया। फिर वे पूर्ण स्वस्थ हो गई।
मांस-मछली खाने से बलवान होंगे, यह बात मानने योग्य नहीं।
 मथुरा के चौबे मत्स्य-मांस नहीं खाते। 
उनका थप्पड़ किसी को कान में लग जाय, तो बहरा ही बना देगा।
 मारवाड़ी लोग आपके यहाँ हैं। वे मत्स्य-मांस नहीं खाते, कितने अच्छे-अच्छे शरीरवाले हैं। 
बिना मत्स्य-मांस के ही उनके रोगों का इलाज होता है।
 किसी के घर में चोर-डाकू आवे तो उससे लड़ना चाहिए। देश के काम के लिए हमारे योग्य बलवाले उस दुष्ट को रोकें। 
जिस हिंसा की मनाही है, वह वार्य हिंसा के लिए है, अनिवार्य हिंसा से बचने के लिए नहीं। 
शौक से हिंसा मत करो।
 बकरे मारनेवाले को देखा कि मरने के छह महीने पूर्व उनको ऐसा भ्रम होने लगा कि बकरी सींग से मारने आती है। एक शौकीन हिंसा करनेवाले के लिए दो लाख रुपये खर्च किए गए, लेकिन वे बचे नहीं। 
कर्मफल अमिट है।

 संत कबीर साहब ने कहा है -
 *कहता हूँ कहि जात हूँ कहा जो मान हमार। 
जाका गर तू काटिहौ, सो फिर काट तोहार।। 
मांस मछरिया खात है, सुरा पान से हेत।
 सो नर जड़ से जाहिंगे, ज्यों मूरी की खेत।।
 यह कूकर को खान है, मानुष देह क्‍यों खाय।
 मुख में आमिख मेलता, नरक पड़े सो जाय।।

 किसी की चीज बिना उसके दिए मत लो। चोरी-डकैती मत करो। पंच पापों से यदि बचकर रहो, तो देश में चैन हो जाय। पाप करने के कारण ही देश में चैन नहीं है। 
चोरी, डकैती, व्यभिचार आदि पाप करते रहने से कैसे चैन हो सकता है।
 भारत में पहले घर में ताला नहीं लगाया जाता था। आज क्‍या हो गया है? 
स्वराज्य हुआ, लेकिन सुराज नहीं हुआ है। 
पंच पापों को छोड़िए और ईश्वर-भजन कीजिए। 
तभी कल्याण होगा।
 संतों ने सबके उपकार के लिए कहा है। पसंद पड़े तो कीजिए, नहीं पसंद हो तो नहीं कीजिए।
 उसका जो फल होगा, वह भोगिए। 
मेरा कोई बल नहीं है कि जबर्दस्ती कहेंगे कि कीजिए ही।
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 यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत महर्षि मेँहीँ नगर, कुशहा तेलियारी ग्राम में दिनांक 28.6.1955 ई० को अपराह्न सत्संग में हुआ था।
श्री सद्गुरु महाराज की जय

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