सदगुरू मेंहीं
नवंबर 02, 2026
सबसे पहले का पदार्थ -सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज
🙏🏻🕉️ *जय गुरूदेव* 🕉️🙏🏻
*183. सबसे पहले का पदार्थ कैसा है?*
*प्यारी धर्मानुरागिनी जनता!*
मुझे यहाँ का आयोजन देखकर बड़ी प्रसन्नता हो रही है कि धर्म के अनुरागी लोग इस तरह शान्त भाव से बैठकर सत्संग करते हैं। मैं सत्संग के विषय पर थोड़ा-सा कहूँगा। सत्संग के विषय पर इसलिए कहूँगा कि मैं जहाँ जाता हूँ, सत्संग की सेवा के लिए जाता हूँ और आपके बुलाने के अनुकूल मैं यहाँ भी सत्संग सेवा करने आया हूँ।
लोग मुझसे पूछा करते हैं कि पहले सत्संग की महिमा कहिए।
मैं कहता हूँ कि-‘आप क्या चाहते हैं?’ सत्संग से सब कुछ मिलता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है-
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहि पाई।।
सो जानब सत्संग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।
बहुत मजबूती के साथ उन्होंने कहा है-मति बुद्धि, सुबुद्धि; कीर्ति = यश; गति = मोक्ष; भूति = ऐश्वर्य; भलाई = भलपन; ये पाँचों पदार्थ मिल जाएँ तो और क्या उत्तम पदार्थ बाकी रह जाता है? ये सत्संग के प्रभाव से ही मिलते हैं। इन पांचों से बढ़कर और कुछ नहीं है संसार में। वैदिक ज्ञान में इससे विशेष यत्न और कोई नहीं है।
‘सत्’ कहते हैं-अपरिवर्तनशील पदार्थ को। जिसमें कभी परिवर्तन नहीं होता, वह क्या है? संसार में सब परिवर्तनशील है। लेकिन जिसका परिवर्तन नहीं होता, जिसका विनाश नहीं होता, वह क्या है? परमात्मा। परमात्मा के अतिरिक्त और कोई अपरिवर्तनशील पदार्थ नहीं है। उस ‘सत्’ के संग को सत्संग कहते हैं।
संतों ने उस ‘सत्’ का बड़ा विशाल ज्ञान दिया है। हमलोगों के मुँह में जब से कुछ बोल आया, तब से ही राम-राम, शिव-शिव, वाह गुरु, शक्ति माता आदि कहकर हम पुकारते हैं, जिसके घर में जो रिवाज है। किंतु उस ‘सत्’ के स्वरूप का निर्णय क्या है, बहुत पीछे हमलोग जानते हैं। संतों से इसके लिए दरयाफ्त करें। संत कबीर साहब कहते हैं-
श्रूप अखण्डित व्यापी चैतन्यश्चैतन्य ।
ऊँचे नीचे आगे पीछे दाहिन बायँ अनन्य ।।
बड़ा तें बड़ा छोट तें छोटा मींही ँ तें सब लेखा ।
सब के मध्य निरन्तर साईं दृष्टि दृष्टि सों देखा ।।
चाम चश्म सों नजरि न आवै खोजु रूह के नैना ।
चून चगून वजूद न मानु तैं सुभानमूना ऐना ।।
जैसे ऐना सब दरसावै जो कुछ वेष बनावै ।
ज्यों अनुमान करै साहब को त्यों साहब दरसावै ।।
जाहि रूह अल्लाह के भीतर तेहि भीतर क े ठाईं ।
रूप अरूप हमारि आस है हम दूनहुँ के साईं ।।
जो कोउ रूह आपनी देखा सो साहब को पेखा ।
कहै कबीर स्वरूप हमारा साहब को दिल देखा ।।
‘सत्तपुरुष जिन जानिया सतगुरु ताका नाम’- ऐसे ये संत हैं, इसीलिए इनके यहाँ जाकर पूछते हैं। संतों के संग में रहकर, उनके अधीन में रहकर श्रवण करना भी सत्संग है। बाबा नानकदेवजी के पास जाता हूँ, तो उपदेश मिलता है-
अलख अपार अगम अगोचरि, ना तिसु काल न करमा ।।
जाति अजाति अजोनी संभउ, ना तिसु भाउ न भरमा ।।
साचे सचिआर बिटहु कुरवाणु ।
ना तिसु रूप बरनु नहिं रेखिआ साचे सबदि नीसाणु ।।
ना तिसु मात पिता सुत बंधप ना तिसु काम न नारी ।
अकुल निरंजन अपर परंपरु सगली जोति तुमारी ।।
घट घट अंतरि ब्रह्मु लुकाइआ घटि घटि जोति सबाई ।
बजर कपाट मुकते गुरमती निरभै ताड़ी लाई ।।
जंत उपाइ कालु सिरिजंता बसगति जुगति सवाई ।
सतिगुरु सेवि पदारथु पावहि छूटहि सबदु कमाई ।।
सूचै भाडै साचु समावै विरले सूचाचारी ।
तंतै कउ परम तंतु मिलाइआ नानक सरणि तुमारी ।। गोस्वामी तुलसीदासजी के पास जाने से वे कहते हैं-
व्यापक व्याप्य अखण्ड अनन्ता। अखिल अमोघ सक्ति भगवन्ता।।
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सब दरसी अनवद्य अजीता।।
निर्मल निराकार निर्मोहा ।नित्य निरंजन सुख सन्दोहा।।
प्रकृति पार प्रभु सब उरबासी ।ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ।।
इहाँ मोह कर कारन नाही ं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ।।
इस तरह संतों से हम ज्ञान पाते हैं। ईश्वर के संबंध में हमको सब मजहबों से विदित कराया गया है कि वह सबसे प्रथम का है, उससे पहले का और कुछ नहीं। सबसे पहले का जो परम सनातन पदार्थ है, वह कैसा है? प्रकृतिमण्डल को भरकर भी परे है।
प्रकृति पार प्रभु सब उरबासी ।ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ।।
विन्ध्याचल के उत्तर तीन संतों-कबीर साहब, गुरु नानक साहब तथा गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज को लोग विशेष रूप से जानते हैं। ईश्वर के संबंध में इन संतों के वचनों से जानने में आता है कि तीनों के वचन एक हैं। कबीर साहब ने ‘अनंत’, गुरु नानक साहब ने ‘अलख’, ‘अपार’ और गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी ‘अनन्त’ कहा। कबीर साहब ने कहा कि वह चेतन आत्मा को भी चेतन करनेवाला है। आगे पीछे, ऊपर नीचे अर्थात् सब तरफ वह है। सबसे बाहर और सबके भीतर है-‘है सबमें सबही तें न्यारा।’ गुरु नानकदेवजी ने ‘अलख -अपार’ कहकर अनन्त को ही जनाया है और उसपर अपने को न्योछावर करने कहा।
सबसे पहले का पदार्थ कैसा है? सबसे पहले का पदार्थ कुछ-न-कुछ अवश्य होना चाहिए। जिसके अतिरिक्त कुछ अवकाश बच जाय, वह सबसे पहले का नहीं होगा। जो सबसे पहले का होगा, वह सर्वव्यापक और उससे भी परे होगा; उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा। जो असीम है, अनंत है, ऐसा पदार्थ सबसे पहले का होगा। ऐसा नहीं मानने से सब ससीम मानना होगा। तो प्रश्न हो जाएगा कि उससे परे क्या है? एक अनादि-अनंत कहे बिना प्रश्न हट नहीं सकता। जो अनादि-अनंत है, वह सबसे विशेष व्यापक होगा। जो सबसे विशेष व्यापक होता है, वह सबसे विशेष सूक्ष्म होता है। एक सेर बर्फ की व्यापकता से उसके पानी की और पानी से (उसको वाष्प बना लेने पर) उसके वाष्प की व्यापकता अधिक होगी। परमात्मा सबसे विशेष सूक्ष्म है, इसीलिए उसको ‘अलख अपार अगम अगोचरि’ कहा गया। ऐसे का संग बाहर संसार में नहीं हो सकता। संसार में हम जहाँ जाएँगे, शरीर-इन्द्रिय के साथ जाएँगे। हम बाहर संसार में जाकर ईश्वर का संग करें, हो नहीं सकता है। बाहर का ख्याल छोड़कर अन्दर की ओर चलें, तब उसका संग होगा। जैसे-जैसे हम अन्दर जाते हैं, शरीर और इन्द्रियां का ज्ञान छूटता जाता है। जाग्रत-स्वप्न के बीच तन्द्रा अवस्था होती है, उस समय मालूम होता है कि शक्ति भीतर की ओर खींचती है। जो अन्दर में प्रवेश करता है, वह इन्द्रियों के ज्ञान से छूटकर अपने स्वरूप को पाता है।
ईश्वर का ज्ञान बहुत विस्तृत है, लेकिन मोटा-मोटी मैं कहता हूँ कि ईश्वर इन्द्रिय-ज्ञान से परे है। इसलिए बाबा नानकदेवजी ने ‘अलख, अगोचर’ आदि कहा है। आप संस्कृत ग्रंथों को वा अपनी भाषा के ग्रंथों को पढ़िए, सबमें मालूम होगा कि ईश्वर इनिद्रय-ज्ञान से बाहर है। इसलिए बाहर में ईश्वर का संग नहीं होता है।
उनके संबंध में जो ज्ञान सुनते हैं, वह भी सत्संग है। ईश्वर के ज्ञान में, उनके रंग में जो मिले हुए हैं, वे भी संत सत्स्वरूप होते हैं। उनका संग भी सत्संग है।
ईश्वर-प्राप्ति का यत्न संतों से मिलता है। हम अपने अंदर-अंदर चलकर ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं। अपने अंदर में जिन र्चिोंं को कोई पाता है, उनके लिए गुरु नानकदेवजी कहते हैं-‘घट घट जोति सबाई’ और कहते हैं, ‘साचे सबदि नीसाणु।’
रात्रि का अंत होने पर उषाकाल होता है। उस समय का प्रकाश सूर्य का है।
उसके बाद के प्रकाश को अरुणोदय कहते हैं। इसके बाद सूर्य-दर्शन होता है। उसी तरह परमात्मा के प्रकाश को कोई तब पाता है, जब कोई परमात्मा का दर्शन पाता है।
‘साचे सबदि नीसाणु’ जो गुरु नानकदेवजी ने कहा है, यह कैसी बात है? प्राकृतिक ढंग से आप देखते हैं कि पहले बिजली चमकती है, फिर शब्द सुनते हैं।
इसी तरह साधक पहले ज्योति को, फिर नाद को पाता है और तब परमात्मा को पाता है। जो परमात्मा के प्रकाश में अपने को ले जाता है, वह ईश्वर के दयादान को पहचानता है और परमात्मा के शब्द को भी वह पाता है। कबीर साहब ने कहा है कि-
शब्द गह्यो जिव संशय नाहीं, साहब भयो तेरो संग ।
ईश्वर चेतन आत्मा के ज्ञान से जानने योग्य है, इन्द्रियों के ज्ञान से नहीं। कोई पूछे कि रूप क्या है? तो कह दीजिए कि जो आप आँख से देखते हैं। उसी तरह ईश्वर क्या है? तो जो चेतन आत्मा से जाना जाता है। इसी के प्रत्यक्ष ज्ञान को सत्संग कहते हैं।
अभी एक विद्वान शवरी के विषय में कह रहे थे।
श्रीराम ने शवरी से नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन किया है-
प्रथम भगति सन्तन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
गुरुपद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान ।
चौथी भगति मम गुन गन, करइ कपट तजि गान ।।
मंत्र जाप मम दृढ़ विस्वासा। पंचम भजन सो वेद प्रकासा।।
छठ दम सील विरति बहु कर्मा। निरत निरंतर सज्जन धर्मा।।
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मो तें सन्त अधिक करि लेखा।।
आठवँ यथा लाभ सन्तोषा। सपनहुँ नहिं देखइ पर दोषा।।
नवम सरल सब सन छल हीना। मम भरोस हिय हरष न दीना।।
प्रथम भक्ति से मंत्र-जप तक सभी जानते हैं। इसमें जो सूक्ष्मता है, सुनिए-
नित प्रति दरसन साधु के, औ साधुन के संग ।
तुलसी काहि वियोग तें, नहिं लागा हरि रंग ।।
तो कहा-
मन तो रमे संसार में, तन साधुन के संग ।
तुलसी याहि वियोग तें, नहिं लागा हरि रंग ।।
साधु संग वा कथा प्रसंग, कहीं भी रहो, एक मन से सुनो। गुरु-सेवा मन से करो। मंत्र-जप करो, तो स्थिर मन से करो।
तन थिर मन थिर वचन थिर, सुरत निरत थिर होय ।
कह कबीर इस पलक को, कलप न पावै कोय ।।
साधु-संग में, कथा-प्रसंग में, गुरु-सेवा में, मंत्र-जप में, यश-कीर्तन में, सबमें मन की एकाग्रता चाहिए। छठी भक्ति में दमशीलता प्राप्त करने कहा। यह केवल विचार-ही-विचार से नहीं होता। मन को विचार से नियन्त्रित करो, ठीक है। लेकिन इतने से ही पूर्ण नियन्त्रित नहीं होगा। इसकी पूर्णता के लिए दूसरा साधन भी करो। विचारो कि इन्द्रियाँ विषयों की ओर कैसे जाती हैं? इन्द्रियों में चेतन की धारें होती हैं, तब इन्द्रियाँ विषयों की ओर जाती हैं। जब स्वप्न में इन्द्रियों से चेतन धाराएँ सिमट जाती हैं, तब इन्द्रियाँ बाह्य विषयों में नहीं जातीं। इसके लिए विशेष साधन दृष्टियोग है।
मन और दृष्टि का बड़ा संबंध है। जहाँ दृष्टि की संलग्नता है, वहीं मन भी रहता है। इसलिए अपने देखने की शक्ति को बढ़ाओ। इतना बढ़ाओ कि दोनों में फर्क न रह जाय अर्थात् समेटकर देखो। केवल निशाने को देखो; जैसे अर्जुन केवल निशाने को ही देखता था। आज भी अच्छा निशाना करनेवाला ठीक-ठीक देखते हैं। गुरु नानकदेवजी ने कहा है-‘तारा चड़िआ लम्मा किउ नदरि निहालिआ राम’ तथा ‘निसि दामिनि जिउ चमकि चंदाइणु देखै। अहिनिसि जोति निरतंर पेखै।’ जब कोई यह देखता है, तब दमशीलता होती है।
योगशास्त्र में ‘दम’ और ‘शम’-ये दो शब्द बड़ी कीमत के हैं। इन्द्रिय-निग्रह के साथ भी मनोनिग्रह होता है और केवल मन का भी साधन होता है। उस साधन को नादानुसंधान कहते हैं। नवधा भक्ति के अंदर जब हम सूक्ष्मता की ओर ध्यान देते हैं, तो छठी और सातवीं भक्ति ‘दम’ और ‘शम’ का साधन हो जाती है।
शवरी को भगवान राम ने कहा-‘सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे।’ इससे आगे कुछ भी जानने का साधन नहीं है। भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि के दर्शन जिनको-जिनको हुए, उन लोगों ने कुछ माँगा अथवा भगवान ने ही कहा कि कुछ माँग लो। लेकिन शवरी के आगे लेन-देन कुछ नहीं और वह वहाँ गई, जहाँ से लौटकर कोई फिर आता नहीं।
तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भई जहँ नहिं फिरै ।
शवरी की भक्ति में कोई कमी नहीं थी। ऐसा नहीं कि स्त्रीगण को गुरु की सेवा नहीं करनी चाहिए। बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम शवरी से कहते हैं-‘गुरु पद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान।’ नौवीं भक्ति के अंत में साधक उस परमात्मा को पाता है, जिससे पूर्ण सत्संग होता है।
एक बात और कहूँ-हमारा यह शरीर एक नहीं है। इसके अंदर सूक्ष्म, कारण और महाकारण; ये तीन जड़ शरीर और हैं। इन चारों जड़ शरीरों से जब चेतन आत्मा छूटती हैं, तब परमात्म-दर्शन होते हैं। गुरु नानकदेवजी ने कहा है-
काहे रे वन खोजन जाई ।
सरब निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई ।।
ईश्वर सर्वत्र हैं, फिर दर्शन क्यों नहीं पाते? इसलिए कि हम जड़ शरीरों के आवरण से आवृत्त हैं। स्थूल शरीर के अंदर सूक्ष्म शरीर है। इस पर मैं एक कथा कहकर सत्संग समाप्त करूँगा।
सत्यवान और सावित्री दम्पत्ति थे। सत्यवान के पिता के राज्यभ्रष्ट हो जाने के कारण वे जंगल में लकड़ी काटकर अपने माता-पिता और अपनी पत्नी का भरण-पोषण करते थे। एक दिन जंगल में लकड़ी काटते-काटते ही सिर-दर्द से बेचैन होकर वे बेहोश हो गए। संयोगवश सावित्री उस दिन उसके साथ ही में थी। उसने अपनी जंघा पर अपने पति का सिर रख लिया। सत्यवान का अंतिम समय जान यमदूत उसे लेने आए; किंतु सती स्त्री के तेज के सामने वे ठहर न सके। अंत में यमराज स्वयं आकर सत्यवान के स्थूल शरीर से उनके सूक्ष्म लिंग शरीर को निकालकर चलते बने। सावित्री यमराज के पीछे-पीछे अनुनय-विनय करती चली। यमराज ने प्रसन्न होकर सावित्री को इच्छित वरदान देकर सत्यवान के स्थूल शरीर में उनके सूक्ष्म शरीर को प्रवेशित कर दिया। फलस्वरूप सत्यवान जीवित हो उठे।
इस संक्षिप्त कथा से समझाता हूँ कि पतिव्रता का तेज कितना है जानो। यमराज उसके पति को ले भी गए, तो लौटाकर दे दिया। हमारे देश में चाहिए कि स्त्रियाँ पतिव्रता हों और पुरुष एकपत्नी- व्रतधारी हों। जो पुरुष एकपत्नीव्रतधारी नहीं हैं, उसको पतिव्रता स्त्री नहीं मिल सकती।
कर्महीन को ना मिलै, भली वस्तु को भोग ।
दाख पके मुख काक को, होत पाक का रोग ।।
तुम अच्छे कर्मवाले बनो, तब अच्छे पदार्थ तुमको मिलेंगे। देश में स्त्रियाँ पतिव्रता हों और पुरुष एकपत्नीव्रतधारी हों। हमारे देश में जो आज इतना नैतिक पतन है, इसका कारण है कि हमारे देश में उस तरह की संतान नहीं सी है।
पंच पापों से छूटकर रहे, तो देश में कल्याण होगा। जहाँ ये पंच पाप-झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार नहीं रहेंगे, वहाँ चोरी, डकैती, बदमाशी नहीं होगी। सभी शान्तिपूर्वक रहेंगे। पापों के करनेवाले से ईश्वर की भक्ति नहीं होगी। ईश्वर की भक्ति करनेवाले को पापों से छूटने का बल मिलता है और पापों से छूटने पर ईश्वर की भक्ति में बल मिलता है।
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*यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत सुजागंज स्थित सिक्ख गुरुद्वारा में दिनांक 5.8.1962 ई0 के सत्संग में हुआ था।*
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