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सोमवार, 2 नवंबर 2026

नवंबर 02, 2026

सबसे पहले का पदार्थ -सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

🙏🏻🕉️ *जय गुरूदेव* 🕉️🙏🏻 *183. सबसे पहले का पदार्थ कैसा है?* *प्यारी धर्मानुरागिनी जनता!*
मुझे यहाँ का आयोजन देखकर बड़ी प्रसन्नता हो रही है कि धर्म के अनुरागी लोग इस तरह शान्त भाव से बैठकर सत्संग करते हैं। मैं सत्संग के विषय पर थोड़ा-सा कहूँगा। सत्संग के विषय पर इसलिए कहूँगा कि मैं जहाँ जाता हूँ, सत्संग की सेवा के लिए जाता हूँ और आपके बुलाने के अनुकूल मैं यहाँ भी सत्संग सेवा करने आया हूँ। लोग मुझसे पूछा करते हैं कि पहले सत्संग की महिमा कहिए। मैं कहता हूँ कि-‘आप क्या चाहते हैं?’ सत्संग से सब कुछ मिलता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है- मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहि पाई।। सो जानब सत्संग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।। बहुत मजबूती के साथ उन्होंने कहा है-मति बुद्धि, सुबुद्धि; कीर्ति = यश; गति = मोक्ष; भूति = ऐश्वर्य; भलाई = भलपन; ये पाँचों पदार्थ मिल जाएँ तो और क्या उत्तम पदार्थ बाकी रह जाता है? ये सत्संग के प्रभाव से ही मिलते हैं। इन पांचों से बढ़कर और कुछ नहीं है संसार में। वैदिक ज्ञान में इससे विशेष यत्न और कोई नहीं है। ‘सत्’ कहते हैं-अपरिवर्तनशील पदार्थ को। जिसमें कभी परिवर्तन नहीं होता, वह क्या है? संसार में सब परिवर्तनशील है। लेकिन जिसका परिवर्तन नहीं होता, जिसका विनाश नहीं होता, वह क्या है? परमात्मा। परमात्मा के अतिरिक्त और कोई अपरिवर्तनशील पदार्थ नहीं है। उस ‘सत्’ के संग को सत्संग कहते हैं। संतों ने उस ‘सत्’ का बड़ा विशाल ज्ञान दिया है। हमलोगों के मुँह में जब से कुछ बोल आया, तब से ही राम-राम, शिव-शिव, वाह गुरु, शक्ति माता आदि कहकर हम पुकारते हैं, जिसके घर में जो रिवाज है। किंतु उस ‘सत्’ के स्वरूप का निर्णय क्या है, बहुत पीछे हमलोग जानते हैं। संतों से इसके लिए दरयाफ्त करें। संत कबीर साहब कहते हैं- श्रूप अखण्डित व्यापी चैतन्यश्चैतन्य । ऊँचे नीचे आगे पीछे दाहिन बायँ अनन्य ।। बड़ा तें बड़ा छोट तें छोटा मींही ँ तें सब लेखा । सब के मध्य निरन्तर साईं दृष्टि दृष्टि सों देखा ।। चाम चश्म सों नजरि न आवै खोजु रूह के नैना । चून चगून वजूद न मानु तैं सुभानमूना ऐना ।। जैसे ऐना सब दरसावै जो कुछ वेष बनावै । ज्यों अनुमान करै साहब को त्यों साहब दरसावै ।। जाहि रूह अल्लाह के भीतर तेहि भीतर क े ठाईं । रूप अरूप हमारि आस है हम दूनहुँ के साईं ।। जो कोउ रूह आपनी देखा सो साहब को पेखा । कहै कबीर स्वरूप हमारा साहब को दिल देखा ।। ‘सत्तपुरुष जिन जानिया सतगुरु ताका नाम’- ऐसे ये संत हैं, इसीलिए इनके यहाँ जाकर पूछते हैं। संतों के संग में रहकर, उनके अधीन में रहकर श्रवण करना भी सत्संग है। बाबा नानकदेवजी के पास जाता हूँ, तो उपदेश मिलता है- अलख अपार अगम अगोचरि, ना तिसु काल न करमा ।। जाति अजाति अजोनी संभउ, ना तिसु भाउ न भरमा ।। साचे सचिआर बिटहु कुरवाणु । ना तिसु रूप बरनु नहिं रेखिआ साचे सबदि नीसाणु ।। ना तिसु मात पिता सुत बंधप ना तिसु काम न नारी । अकुल निरंजन अपर परंपरु सगली जोति तुमारी ।। घट घट अंतरि ब्रह्मु लुकाइआ घटि घटि जोति सबाई । बजर कपाट मुकते गुरमती निरभै ताड़ी लाई ।। जंत उपाइ कालु सिरिजंता बसगति जुगति सवाई । सतिगुरु सेवि पदारथु पावहि छूटहि सबदु कमाई ।। सूचै भाडै साचु समावै विरले सूचाचारी । तंतै कउ परम तंतु मिलाइआ नानक सरणि तुमारी ।। गोस्वामी तुलसीदासजी के पास जाने से वे कहते हैं- व्यापक व्याप्य अखण्ड अनन्ता। अखिल अमोघ सक्ति भगवन्ता।। अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सब दरसी अनवद्य अजीता।। निर्मल निराकार निर्मोहा ।नित्य निरंजन सुख सन्दोहा।। प्रकृति पार प्रभु सब उरबासी ।ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ।। इहाँ मोह कर कारन नाही ं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ।। इस तरह संतों से हम ज्ञान पाते हैं। ईश्वर के संबंध में हमको सब मजहबों से विदित कराया गया है कि वह सबसे प्रथम का है, उससे पहले का और कुछ नहीं। सबसे पहले का जो परम सनातन पदार्थ है, वह कैसा है? प्रकृतिमण्डल को भरकर भी परे है। प्रकृति पार प्रभु सब उरबासी ।ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ।। विन्ध्याचल के उत्तर तीन संतों-कबीर साहब, गुरु नानक साहब तथा गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज को लोग विशेष रूप से जानते हैं। ईश्वर के संबंध में इन संतों के वचनों से जानने में आता है कि तीनों के वचन एक हैं। कबीर साहब ने ‘अनंत’, गुरु नानक साहब ने ‘अलख’, ‘अपार’ और गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी ‘अनन्त’ कहा। कबीर साहब ने कहा कि वह चेतन आत्मा को भी चेतन करनेवाला है। आगे पीछे, ऊपर नीचे अर्थात् सब तरफ वह है। सबसे बाहर और सबके भीतर है-‘है सबमें सबही तें न्यारा।’ गुरु नानकदेवजी ने ‘अलख -अपार’ कहकर अनन्त को ही जनाया है और उसपर अपने को न्योछावर करने कहा। सबसे पहले का पदार्थ कैसा है? सबसे पहले का पदार्थ कुछ-न-कुछ अवश्य होना चाहिए। जिसके अतिरिक्त कुछ अवकाश बच जाय, वह सबसे पहले का नहीं होगा। जो सबसे पहले का होगा, वह सर्वव्यापक और उससे भी परे होगा; उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा। जो असीम है, अनंत है, ऐसा पदार्थ सबसे पहले का होगा। ऐसा नहीं मानने से सब ससीम मानना होगा। तो प्रश्न हो जाएगा कि उससे परे क्या है? एक अनादि-अनंत कहे बिना प्रश्न हट नहीं सकता। जो अनादि-अनंत है, वह सबसे विशेष व्यापक होगा। जो सबसे विशेष व्यापक होता है, वह सबसे विशेष सूक्ष्म होता है। एक सेर बर्फ की व्यापकता से उसके पानी की और पानी से (उसको वाष्प बना लेने पर) उसके वाष्प की व्यापकता अधिक होगी। परमात्मा सबसे विशेष सूक्ष्म है, इसीलिए उसको ‘अलख अपार अगम अगोचरि’ कहा गया। ऐसे का संग बाहर संसार में नहीं हो सकता। संसार में हम जहाँ जाएँगे, शरीर-इन्द्रिय के साथ जाएँगे। हम बाहर संसार में जाकर ईश्वर का संग करें, हो नहीं सकता है। बाहर का ख्याल छोड़कर अन्दर की ओर चलें, तब उसका संग होगा। जैसे-जैसे हम अन्दर जाते हैं, शरीर और इन्द्रियां का ज्ञान छूटता जाता है। जाग्रत-स्वप्न के बीच तन्द्रा अवस्था होती है, उस समय मालूम होता है कि शक्ति भीतर की ओर खींचती है। जो अन्दर में प्रवेश करता है, वह इन्द्रियों के ज्ञान से छूटकर अपने स्वरूप को पाता है। ईश्वर का ज्ञान बहुत विस्तृत है, लेकिन मोटा-मोटी मैं कहता हूँ कि ईश्वर इन्द्रिय-ज्ञान से परे है। इसलिए बाबा नानकदेवजी ने ‘अलख, अगोचर’ आदि कहा है। आप संस्कृत ग्रंथों को वा अपनी भाषा के ग्रंथों को पढ़िए, सबमें मालूम होगा कि ईश्वर इनिद्रय-ज्ञान से बाहर है। इसलिए बाहर में ईश्वर का संग नहीं होता है। उनके संबंध में जो ज्ञान सुनते हैं, वह भी सत्संग है। ईश्वर के ज्ञान में, उनके रंग में जो मिले हुए हैं, वे भी संत सत्स्वरूप होते हैं। उनका संग भी सत्संग है। ईश्वर-प्राप्ति का यत्न संतों से मिलता है। हम अपने अंदर-अंदर चलकर ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं। अपने अंदर में जिन र्चिोंं को कोई पाता है, उनके लिए गुरु नानकदेवजी कहते हैं-‘घट घट जोति सबाई’ और कहते हैं, ‘साचे सबदि नीसाणु।’ रात्रि का अंत होने पर उषाकाल होता है। उस समय का प्रकाश सूर्य का है। उसके बाद के प्रकाश को अरुणोदय कहते हैं। इसके बाद सूर्य-दर्शन होता है। उसी तरह परमात्मा के प्रकाश को कोई तब पाता है, जब कोई परमात्मा का दर्शन पाता है। ‘साचे सबदि नीसाणु’ जो गुरु नानकदेवजी ने कहा है, यह कैसी बात है? प्राकृतिक ढंग से आप देखते हैं कि पहले बिजली चमकती है, फिर शब्द सुनते हैं। इसी तरह साधक पहले ज्योति को, फिर नाद को पाता है और तब परमात्मा को पाता है। जो परमात्मा के प्रकाश में अपने को ले जाता है, वह ईश्वर के दयादान को पहचानता है और परमात्मा के शब्द को भी वह पाता है। कबीर साहब ने कहा है कि- शब्द गह्यो जिव संशय नाहीं, साहब भयो तेरो संग । ईश्वर चेतन आत्मा के ज्ञान से जानने योग्य है, इन्द्रियों के ज्ञान से नहीं। कोई पूछे कि रूप क्या है? तो कह दीजिए कि जो आप आँख से देखते हैं। उसी तरह ईश्वर क्या है? तो जो चेतन आत्मा से जाना जाता है। इसी के प्रत्यक्ष ज्ञान को सत्संग कहते हैं। अभी एक विद्वान शवरी के विषय में कह रहे थे। श्रीराम ने शवरी से नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन किया है- प्रथम भगति सन्तन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।। गुरुपद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान । चौथी भगति मम गुन गन, करइ कपट तजि गान ।। मंत्र जाप मम दृढ़ विस्वासा। पंचम भजन सो वेद प्रकासा।। छठ दम सील विरति बहु कर्मा। निरत निरंतर सज्जन धर्मा।। सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मो तें सन्त अधिक करि लेखा।। आठवँ यथा लाभ सन्तोषा। सपनहुँ नहिं देखइ पर दोषा।। नवम सरल सब सन छल हीना। मम भरोस हिय हरष न दीना।। प्रथम भक्ति से मंत्र-जप तक सभी जानते हैं। इसमें जो सूक्ष्मता है, सुनिए- नित प्रति दरसन साधु के, औ साधुन के संग । तुलसी काहि वियोग तें, नहिं लागा हरि रंग ।। तो कहा- मन तो रमे संसार में, तन साधुन के संग । तुलसी याहि वियोग तें, नहिं लागा हरि रंग ।। साधु संग वा कथा प्रसंग, कहीं भी रहो, एक मन से सुनो। गुरु-सेवा मन से करो। मंत्र-जप करो, तो स्थिर मन से करो। तन थिर मन थिर वचन थिर, सुरत निरत थिर होय । कह कबीर इस पलक को, कलप न पावै कोय ।। साधु-संग में, कथा-प्रसंग में, गुरु-सेवा में, मंत्र-जप में, यश-कीर्तन में, सबमें मन की एकाग्रता चाहिए। छठी भक्ति में दमशीलता प्राप्त करने कहा। यह केवल विचार-ही-विचार से नहीं होता। मन को विचार से नियन्त्रित करो, ठीक है। लेकिन इतने से ही पूर्ण नियन्त्रित नहीं होगा। इसकी पूर्णता के लिए दूसरा साधन भी करो। विचारो कि इन्द्रियाँ विषयों की ओर कैसे जाती हैं? इन्द्रियों में चेतन की धारें होती हैं, तब इन्द्रियाँ विषयों की ओर जाती हैं। जब स्वप्न में इन्द्रियों से चेतन धाराएँ सिमट जाती हैं, तब इन्द्रियाँ बाह्य विषयों में नहीं जातीं। इसके लिए विशेष साधन दृष्टियोग है। मन और दृष्टि का बड़ा संबंध है। जहाँ दृष्टि की संलग्नता है, वहीं मन भी रहता है। इसलिए अपने देखने की शक्ति को बढ़ाओ। इतना बढ़ाओ कि दोनों में फर्क न रह जाय अर्थात् समेटकर देखो। केवल निशाने को देखो; जैसे अर्जुन केवल निशाने को ही देखता था। आज भी अच्छा निशाना करनेवाला ठीक-ठीक देखते हैं। गुरु नानकदेवजी ने कहा है-‘तारा चड़िआ लम्मा किउ नदरि निहालिआ राम’ तथा ‘निसि दामिनि जिउ चमकि चंदाइणु देखै। अहिनिसि जोति निरतंर पेखै।’ जब कोई यह देखता है, तब दमशीलता होती है। योगशास्त्र में ‘दम’ और ‘शम’-ये दो शब्द बड़ी कीमत के हैं। इन्द्रिय-निग्रह के साथ भी मनोनिग्रह होता है और केवल मन का भी साधन होता है। उस साधन को नादानुसंधान कहते हैं। नवधा भक्ति के अंदर जब हम सूक्ष्मता की ओर ध्यान देते हैं, तो छठी और सातवीं भक्ति ‘दम’ और ‘शम’ का साधन हो जाती है। शवरी को भगवान राम ने कहा-‘सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे।’ इससे आगे कुछ भी जानने का साधन नहीं है। भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि के दर्शन जिनको-जिनको हुए, उन लोगों ने कुछ माँगा अथवा भगवान ने ही कहा कि कुछ माँग लो। लेकिन शवरी के आगे लेन-देन कुछ नहीं और वह वहाँ गई, जहाँ से लौटकर कोई फिर आता नहीं। तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भई जहँ नहिं फिरै । शवरी की भक्ति में कोई कमी नहीं थी। ऐसा नहीं कि स्त्रीगण को गुरु की सेवा नहीं करनी चाहिए। बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम शवरी से कहते हैं-‘गुरु पद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान।’ नौवीं भक्ति के अंत में साधक उस परमात्मा को पाता है, जिससे पूर्ण सत्संग होता है। एक बात और कहूँ-हमारा यह शरीर एक नहीं है। इसके अंदर सूक्ष्म, कारण और महाकारण; ये तीन जड़ शरीर और हैं। इन चारों जड़ शरीरों से जब चेतन आत्मा छूटती हैं, तब परमात्म-दर्शन होते हैं। गुरु नानकदेवजी ने कहा है- काहे रे वन खोजन जाई । सरब निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई ।। ईश्वर सर्वत्र हैं, फिर दर्शन क्यों नहीं पाते? इसलिए कि हम जड़ शरीरों के आवरण से आवृत्त हैं। स्थूल शरीर के अंदर सूक्ष्म शरीर है। इस पर मैं एक कथा कहकर सत्संग समाप्त करूँगा। सत्यवान और सावित्री दम्पत्ति थे। सत्यवान के पिता के राज्यभ्रष्ट हो जाने के कारण वे जंगल में लकड़ी काटकर अपने माता-पिता और अपनी पत्नी का भरण-पोषण करते थे। एक दिन जंगल में लकड़ी काटते-काटते ही सिर-दर्द से बेचैन होकर वे बेहोश हो गए। संयोगवश सावित्री उस दिन उसके साथ ही में थी। उसने अपनी जंघा पर अपने पति का सिर रख लिया। सत्यवान का अंतिम समय जान यमदूत उसे लेने आए; किंतु सती स्त्री के तेज के सामने वे ठहर न सके। अंत में यमराज स्वयं आकर सत्यवान के स्थूल शरीर से उनके सूक्ष्म लिंग शरीर को निकालकर चलते बने। सावित्री यमराज के पीछे-पीछे अनुनय-विनय करती चली। यमराज ने प्रसन्न होकर सावित्री को इच्छित वरदान देकर सत्यवान के स्थूल शरीर में उनके सूक्ष्म शरीर को प्रवेशित कर दिया। फलस्वरूप सत्यवान जीवित हो उठे। इस संक्षिप्त कथा से समझाता हूँ कि पतिव्रता का तेज कितना है जानो। यमराज उसके पति को ले भी गए, तो लौटाकर दे दिया। हमारे देश में चाहिए कि स्त्रियाँ पतिव्रता हों और पुरुष एकपत्नी- व्रतधारी हों। जो पुरुष एकपत्नीव्रतधारी नहीं हैं, उसको पतिव्रता स्त्री नहीं मिल सकती। कर्महीन को ना मिलै, भली वस्तु को भोग । दाख पके मुख काक को, होत पाक का रोग ।। तुम अच्छे कर्मवाले बनो, तब अच्छे पदार्थ तुमको मिलेंगे। देश में स्त्रियाँ पतिव्रता हों और पुरुष एकपत्नीव्रतधारी हों। हमारे देश में जो आज इतना नैतिक पतन है, इसका कारण है कि हमारे देश में उस तरह की संतान नहीं सी है। पंच पापों से छूटकर रहे, तो देश में कल्याण होगा। जहाँ ये पंच पाप-झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार नहीं रहेंगे, वहाँ चोरी, डकैती, बदमाशी नहीं होगी। सभी शान्तिपूर्वक रहेंगे। पापों के करनेवाले से ईश्वर की भक्ति नहीं होगी। ईश्वर की भक्ति करनेवाले को पापों से छूटने का बल मिलता है और पापों से छूटने पर ईश्वर की भक्ति में बल मिलता है। *************** *यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत सुजागंज स्थित सिक्ख गुरुद्वारा में दिनांक 5.8.1962 ई0 के सत्संग में हुआ था।* *************** प्रिय सत्संगी बंधुओं पूरा प्रवचन पढ़ने के बाद शेयर करें 🙏

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

फ़रवरी 19, 2026

“O Romeo” Movie Review & Story Breakdown – A Fresh Romantic Drama for Today’s Audience

Indian cinema continues to experiment with youth-centric love stories, and O Romeo is one such film that brings a blend of romance, modern emotion, and stylish presentation. Released in 2024, the film has been gaining attention for its refreshing casting, soulful music, and“O Romeo” Movie visually rich storytelling.
In this article, we explore the movie’s story, cast, themes, strengths, weaknesses, and overall verdict—helping you decide whether O Romeo deserves a place on your weekend watchlist.
⭐ Story Summary (Spoiler-Free)
O Romeo revolves around a young, charming boy whose life takes a sharp emotional turn when he unexpectedly falls in love. What begins as a simple romantic attraction slowly turns into a journey of heartbreak, healing, and self-discovery.
The film touches on themes like:
Modern relationships
Trust and misunderstandings
The search for true love in a superficial world
Youth emotions and identity
The director keeps the narrative light yet emotional, making it relatable for the younger audience.

🎭 Cast & Performances
The biggest highlight of O Romeo is its fresh cast. The lead pair delivers natural chemistry, giving authenticity to the romance scenes. Supporting actors also do justice to their roles, keeping the film engaging throughout.
Performance Highlights:
The hero shines in emotional scenes, especially during heartbreak sequences.
The heroine brings charm, innocence, and elegance to her character.
Side characters add humor and relatability without overshadowing the main story.
🎥 Direction, Cinematography & Music
🎬 Direction
The director presents the movie in a stylish yet simple way, making it easy to connect with its characters.
📸 Cinematography
One of the strongest aspects of the movie. Beautiful locations, soft color tones, and trendy shots give the film a fresh visual appeal perfect for Gen-Z viewers.
🎶 Music
Romantic melodies and emotional background scores add depth to the film. The songs are soothing and blend naturally with the storyline.

शनिवार, 12 अप्रैल 2025

अप्रैल 12, 2025

आनंद और मंगल की जड़ सत्संग हैं -संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

बीसवीं सदी के महान संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का प्रवचन को पूरा देखें 👇🙏👇 🙏🕉️ *जय गुरूदेव* 🕉️🙏 आनन्द और मंगल की जड़ : सत्संग* *प्यारे आत्मवत् प्रिय लोगो!* मुझको बुलावा में कहा गया था कि मैं चलकर सत्संग का उद्घाटन करूँ। सत्संग मुझे बहुत प्रिय है, गोया जीवन का आधार है। इस आधार के लिए बुलावा हो, मैं उपस्थित नहीं होऊँ, तो मेरे लिए बहुत हानि, लज्जा, अपयश और अवनति का काम होगा, इसलिए आया। आते ही वेद-मंत्रों का पाठ होते पाया, तो मैं समझा- वेद-मंत्र से ही उद्घाटन होगा। फिर मुझे कुछ कहना चाहिए, सो कहता हूँ। आजकल आपके प्रान्त में और दूसरे प्रांतों में भी गोस्वामीजी की रामायण का बड़ा प्रचार है। उसमें लोग पढ़ते हैं, आप भी पढ़ते होंगे- सत्संगति मूद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला।। अर्थ बहुत सीधा है, तब भी थोड़ा-सा कहता हूँ कि गोस्वामीजी ने यह कह दिया कि मुद कहते हैं-खुशी को। आनन्द और मंगल, दोनों की जड़ सत्संग है। सत्संग आनन्द और शुभ की जड़ है। गोया सत्संग से ही आनन्द औैर शुभ होता है। ऐसा कोई नहीं, जो शुभ नहीं चाहे और आनन्द नहीं चाहे। आनन्द और शुभ की जड़ ही मिल जाए, तब तो कहना ही क्या है! जहाँ सत्संग होता है, वे वहाँ से आनन्द पाते हैं और उनका कल्याण होता है। यह बहुत बड़ी बात है कि उन्होंने कहा-सत्संग की सिद्धि फल है कि सब साधन फूल हैं। फूल हों, फल नहीं लगे तो, पूरी संतुष्टि नहीं हो सकती। सत्संग की सिद्धि फल है, इसको समझाने की कोशिश करूँगा। ‘सत’ कहते हैं, जिसमें परिवर्तन नहीं हो, जिसकी स्थिरता रहे और अत्यन्ताभाव नहीं हो। परिवर्तन=बदल जाना, जैसे हमलोगों को शरीर है। बच्चे लोग बैठे हैं, इसी तरह हमलोगों का शरीर था, सुन्दरता और शक्ति चली गयी, फिर भी शरीर वही है; इस तरह परिवर्तन होता है। शरीर मर भी जाता है। कितने शरीर मर भी गए। कहते हैं कि पाँच तत्त्व का था, पाँचो तत्त्वों में मिल गया, तब भी रहा। कहते हैं प्रलय होता है और महाप्रलय भी होता है। प्रलय में कुछ रहता है और महाप्रलय में अत्यन्ताभाव हो जाता है। अत्यन्ताभाव होगा, तब वह सत्य नहीं है। सत्य क्या है? परिवर्तन हानेवाले पदार्थों में एक जीवनी शक्ति है, जिसको ज्ञानमय कहते हैं। उसको इसलिए चेतन कहते हैं, वह चेतन इस शरीर के अन्दर अंतःकरण के साथ रहता है और ब्रह्मतत्त्व-आत्मतत्त्व से भिन्न कोई रह नहीं सकता। शरीर मर गया, उसको जलाया गया, लेकिन ब्रह्मतत्त्व जलाया नहीं गया। इसी के लिए कहा गया है कि इसको हवा सुखाती नहीं, पानी भिंगाता नहीं, अस्त्र छेदता नहीं, अग्नि जलाती नहीं आदि। यह सत्य रह गया, इसलिए इसको ईश्वर का अंश कहते हैं- ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखरासी।। अपने यहाँ इसका बहुत विश्वास है कि शरीर को जलाया गया, चेतन आत्मा रही। यह अपने कर्मानुसार स्वर्ग-नरक भोगकर संसार में आती-जाती रहती है। शरीर के तरह इसका परिवर्तन नहीं होता। केवल आत्मा का कभी अभाव होता नहीं। कितने लोग चेतन और आत्मा को एक ही समझते हैं, लेकिन ऐसी बात नहीं। चेतन बदलता नहीं, लेकिन सृष्टि का पसार हुआ है, इसकी समाप्ति होगी, उस समय चेतन का भी विलीन हो जाना होगा। कभी-न-कभी अत्यन्ताभाव भी लोग मानते हैं, लेकिन आत्मा का अत्यन्ताभाव कभी होता नहीं। ‘सत्’ परा प्रकृति के नाम से, अक्षर के नाम से विख्यात है। नाशवान पदार्थ को क्षर पुरुष कहते हैं और अनाश को अक्षर पुरुष कहते हैं। इन दोनों से जो उत्तम है, वह पुरुषोत्तम है। गीता में इन तीनों का वर्णन है। पुरुषोत्तम में भी न परिवर्तन होता है, न अत्यन्ताभाव होता है। प्रलय, महाप्रलय में इसका कुछ बिगड़ता नहीं। अक्षर पुरुष, चेतन पुरुष, परा प्रकृति का कभी-न-कभी अत्यन्ताभाव होता है, लेकिन यह भी ‘सत्य’ है। और आत्मतत्त्व का कभी परिवर्तन नहीं होता, न अत्यन्ताभाव होता है, यह भी ‘सत्य’ है। उस सत् का इस सत् से मेल हो, यही है सत्संग का फल। चेतन आत्म-तत्त्व का अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त करो। शुद्ध आत्म-तत्त्व-ब्रह्मतत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान हो, सत्संग की यही सिद्धि सत्संग करते-करते जड़-चेतन की भी गाँठ जाए; यह जड़ है, यह चेतन है-ठीक-ठीक पहचान में आ जाए और फिर आत्मतत्त्व का भी पहचान हो; यह सत्संग की सिद्धि है। लेकिन यह बाहर नहीं, अन्दर में होगा। और सब साधन फूल हैं, इसलिए कि संसार में यशस्वी होते हैं, यश की सुगन्धि फैलती है, वे संसार में प्रतिष्ठित होते हैं और यह है कि आत्मतत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। इसके लिए ध्यान-भजन करना, ज्ञान अर्जन करना, योगाभ्यास करना, भक्ति करनी-ये सब साधन फूल हैं। जो इसको ग्रहण करते हैं तो संसार में सच्चरित्र होते हैं। उनकी सच्चरित्रता की बड़ाई है, वह तमाम होने लगती है। गोया यह है, यह बाहर की सिद्धि है। अंतर में साधन करते-करते जड़-चेतन और शुद्ध आत्मतत्त्व को-तीनों को अलग-अलग कर प्रत्यक्ष जानते हैं, यह फल है। जो बराबर सत्संग करते हैं, उनके लिए है- मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहि जतन जहाँ जेहि पाई।। सो जानब सत्संग प्रभाऊ। लोकहु बेद न आन उपाऊ।। बुद्धि, यश, मुक्ति, ऐश्वर्य और भलपन; जब कभी जहाँ कहीं, जिस किसी उपाय से जिसने पाया है, वह सत्संग के प्रभाव से हुआ, जानना चाहिए। लोक और वेद में इसके मिलने का उपाय नहीं। ये पाँच पदार्थ सत्संग करते-करते मिलते हैं। जिनको ये पाँच चीजें मिल जाएँ, संसार में उसको कुछ बाकी नहीं रह जाता है। वे स्वयं लाभान्वित होते हैं और संसार को लाभ पहुँचाते हैं। सत्संग ज्ञानमयी यज्ञ है। गीता में कहा गया है कि द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ है। यहाँ भी होगा। ये शुभ के लिए करते हैं। सबसे बड़ा शुभ है-ईश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान होना। यह भी सभी प्राप्त कर लेंगे, जो सत्संग करते रहेंगे। कबीर साहब ने कहा- सत्संग से लागि रहो रे भाई । तेरी बनत बनत बन जाई ।। मैंने जो आन्तरिक सत्संग करने के लिए कहा है, वह बड़ा विस्तार है। वह ध्यान से होता है। स्थूल ध्यान को लोग जानते हैं, सूक्ष्म ध्यान कम लोग जानते हैं। सूक्ष्म ध्यान में भी रूप ध्यान और अरूप ध्यान है। जो कोई जानते हैं, वे करें; जो नहीं जानते हैं, जानकर करें। इन्हीं शब्दों के साथ मैं उद्घाटन करता हूँ, सबका कल्याण चाहता हूँ। *************** *यह प्रवचन बाँका जिलान्तर्गत गाँव पैर में दिनांक 8. 4. 1970 ई0 को अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* *************** पूरा पढ़ें और दूसरों को भी शेयर जरुर करें।

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

फ़रवरी 25, 2025

मेरे बिना तुम

तुम्हारी हंसी बता रही है कि तुम मेरे बिना खुश रह सकती है। मेरे सामने तुम जरूर ही नाखुशी का दिखावा करती है।। यह तो दुनिया का रीत ही है इसमें तुम क्या कर सकती है। मेरा क्या है हम तो परदेसी हैं इसमें तुम क्या कर सकती हैं।। मेरे बिना सबके सामने हंसना बोलना बहुत कुछ सिखाती है। मैं तुम्हारे जीवन में नहीं भी रहे जीवन खुशी से जी सकती है।। मुझसे बात बात में रोना पीछे में खुशी से जिंदगी जीना बताती है। सच तो यह है जिंदगी में इस तरह से जीना खूबसूरती कहलाती है।। कभी भी यह नहीं सोचना मेरे बिना मेरी जान खुश नहीं रह सकती है। यह दुनिया बड़ी है खुशी देने के लिए मेरे बिना भी खुशी-खुशी रह सकती है।। तरुण,तरुणी में रोना क्या खुशी से जिंदगी बितानी है। तनावमुक्त जीना ही असली जिंदगानी कहलाती है।।

सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

फ़रवरी 24, 2025

बाहर में संत पथ नहीं -महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

जय गुरु आज सभी सत्संगी बांधों के लिए मैं संत सतगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का अमृत वाणी को लेकर आया हूं और उसे आप पढ़ करके आध्यात्मिक उन्नति करेंगे इसलिए इस प्रवचन को जरूर पढ़ें। 🙏🕉️ *जय गुरुदेव* 🕉️🙏 बाहर में संत-पथ नहीं है, अन्दर में है-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज *प्यारे लोगो!* आपलोग पढ़े-सुने होंगे- संत संग अपवर्ग कर, कामी भव कर पंथ । कहहिं संत कवि कोविद, श्रुति पुरान सदग्रंथ ।। संतों का रास्ता मोक्ष में जाने का है-मुक्ति में जाने का है। संतगण सांसारिक इच्छाओं को छोड़ दिए होते हैं। वे संसार में लसक (फँस) कर नहीं रह जाते। वे मोक्ष-मार्ग पर बिना अटक (रूक) के जाते हैं। परन्तु जो सांसारिक वस्तुओं में इच्छा रखते हैं, उनको मोक्ष-मार्ग में जाने में अटक रहता है। ‘जो जो करम कीउ लालच लगि, तिह तिह आपु बंधाइउ।’-नौवाँ गुरु तेग बहादुर का वचन है। जो-जो कर्मफल की इच्छा से किए, उन-उन कर्मों से अपने को बँधा लिया। जो सांसारिक इच्छाओं को नहीं त्याग सके, वे कर्म में फल इच्छा से लगे रहते हैं। उनको संत-पंथ पर जाने में अटक रहता है। धीरे-धीरे इच्छाएँ छूटती हैं। एक ही बार इच्छा नहीं छूटती। जबतक मन मण्डल से ऊपर चढ़ाई नहीं हो, तबतक इच्छा रहेगी ही। चाहे वह इच्छा सात्त्विकी ही क्यों न हो? इच्छा तीन प्रकार की होती है-तामसी, राजसी और सात्त्विकी। सात्त्विकी इच्छा ईश्वर की ओर ले जाती है। संसार में रहकर कुछ-न-कुछ इच्छा रहेगी। सात्त्विक कर्म का भी बन्धन होता है। इसलिए त्रय गुण से परे होने के लिए श्रीकृष्ण भगवान ने कहा था। त्रयगुण से परे तुरंत होना नहीं होता। क्रमशः तामस इच्छा को छोड़ते हैं, राजस को छोड़ते हैं और सात्त्विक में आते हैं। और अंत में इसको भी छोड़कर निस्त्रैगुण्य हो जाते हैं। संसार की वस्तुओं को त्यागने की इच्छा, फिर सात्त्विक इच्छा के त्यागने की इच्छा करो। उस इच्छा को भी छोड़ दो। इस तरह आगे बढ़ोगे। जबतक मन पर विजय नहीं है, तबतक इच्छा होती रहेगी। त्रयगुणातीत होने पर भी-संत होने पर भी, जबतक कोई संसार में रहेगा, संसार से सम्बन्ध रखेगा। संसार में रहकर संसार के सब कामों को छोड़कर रहे, असम्भव है। जैसे जाग्रत में काम करते हैं, उसके लिए इच्छा होती है। स्वप्न में भी इच्छा होती है, गहरी नींद में इच्छा नहीं होती, लेकिन हाथ-पैर का वा किसी अंग का संचालन गहरी नींद में होता है। किन्तु उस अवस्था में हाथ-पैर सिकोड़ने की इच्छा नहीं होती है। इसी तरह कर्म करके उसके फल की इच्छा संत लोग नहीं करते। उनसे राजस और तामस कर्म नहीं होगा, सात्त्विक कर्म होगा। जो मुमुक्षु हैं, उनको चाहिए कि इच्छा को रोकें, दमन करें। तामस इच्छा का त्याग करें। इसी तरह राजस कर्म का भी त्याग करें। सात्त्विक कर्म में बरतने पर भी सात्त्विकी इच्छा का त्याग करना चाहिए। यह पंथ-रास्ता कहने भर के लिए ही है कि ठीक है भी? रास्ता कहते हैं, र्चिं को-लकीर को। चाहे रास्ता चौड़ा हो वा चौड़ाई विहीन लम्बा हो। क्या है? वह लकीर है। इसी तरह जो मोक्ष का रास्ता है, वह लकीर है। लेकिन बहुत लम्बी लकीर है-चौड़ी लकीर नहीं है। रेखा के लिए पढ़े होंगे कि उसमें लम्बाई है, चौड़ाई नहीं। ठीक वैसा ही, जैसे विन्दु का स्थान है, परिमाण नहीं। लेकिन ऐसा विन्दु वा लकीर संसार में कोई देखा है? वह चश्मा जिसको पहनकर पतले-पतले अक्षरों को मोटे-मोटे रूप में देखता है, कितनी भी पतली लकीर खींचकर उस चश्मा से देखो, तो उसमें चौड़ाई मालूम होगी। संसार में ऐसी लकीर नहीं, जिसमें लम्बाई हो-चौड़ाई नहीं। ऐसी लकीर अन्दर का मार्ग है। मोक्ष में जाने का रास्ता लम्बा-ही-लम्बा है, चौड़ा नहीं। एक तो रास्ता बनाते हैं, चलने के लिए, दूसरा रास्ता चलते-चलते बनता है। जिस पर चला जाए, वह रास्ता है। संसार के रास्ते पर सवारी और पैर चलता है। मोक्ष के रास्ते पर न सवारी चलती है और न पैर चलता है, उसपर मन चलता है। संतों का ज्ञान अध्यात्म-ज्ञान छोड़कर नहीं रह सकता। अपने को समझो कि तुम कौन हो? तुम मन नहीं हो, शरीर नहीं हो। किन्तु कुछ ज्यादे पढ़े-लिखे लोग, जिनको आत्मा की स्थिति का ज्ञान नहीं होता, वे कहते हैं-‘शरीर ही शरीर है, शरीर बनने से ऐसा कुछ हो गया है।’ जिस विज्ञान से वे कुछ कहते-सुनते हैं, वह अध्यात्म से सम्बन्धित नहीं है। अध्यात्म-ज्ञान सिखाता है कि आत्मा अभिन्न है, अनात्मा भिन्न है। आत्मा और मन, इसको समझाने के लिए बहुत बात नहीं, थोड़ा कहना है। जैसे शरीर माया है, वैसे ही मन माया है। मन की बनावट माया से हुई है। इसका भी रहना नहीं होगा। शरीर के जीवन में मन और आत्मा का मिलाप है। ऐसा मिलाप कि जैसे दूध और घी का। दूध को देखो तो उसमें घी का पता नहीं। घी का काम दूध से नहीं होता और दूध का काम घी से नहीं होता। कोशिश करो तो दूध को मथकर घी अलग कर लोगे। तब जो काम घी से होगा, वह दूध से नहीं। यह प्रत्यक्ष देखोगे। दूध का छेना (पनीर) होगा, लेकिन घी का नहीं। उसी तरह मन और आत्मा के मेल से जो काम होता है, वह काम केवल मन या केवल आत्मा से होने योग्य नहीं है। मन और आत्मा का मिलाप है। बिना मन के हम काम नहीं करते। कहीं चलने के लिए, कुछ बोलने के लिए मन प्रेरण करता है। पहले मन चलेगा, पैर नहीं। संत कबीर साहब ने कहा है- बिन पाँवन की राह है, बिन बस्ती का देश । बिना पिण्ड का पुरुष है, कहै कबीर सन्देश ।। कहाँ से चलेगा? रास्ता शुरू कहाँ से होगा? जो जहाँ बैठा रहता है, वहीं से चलता है। यह मन कहाँ बैठा हुआ है? इस तन में मन कहँ बसै,निकसि जाय केहि ठौर । गुरु गम है तो परखि ले, नातर कर गुरु और ।। नैनों माहीं मन बसै, निकसि जाय नौ ठौर । गुरु गम भेद बताइया, सब संतन सिरमौर ।। -कबीर साहब जानिले जानिले सत्त पहचानिले, सुरति साँची बसै दीद दाना। खोलो कपाट यह बाट सहजै मिलै, पलक परवीन दिव दृष्टि ताना।। ‘दीद’ कहते हैं आँख को और ‘दाना’ कहते हैं तिल को। कैसे रास्ता पकड़ोगे? तो कहा-‘खोलो कपाट यह बाट सहजै मिलै।’ जाग्रत में आँख में, स्वप्न में कण्ठ में, सुषुप्ति में हृदय में और तुरीय में मूर्द्धा में वासा होता है। मोक्षमार्ग पर चलने के लिए जाग्रत अवस्था से चलना होगा। बाहर में संत-पंथ नहीं है, अन्दर में है। इसी पर मन चलता है। जो कोई यहाँ से चलना बताता है, ठीक बताता है, यह आज्ञाचक्र है। कोई कहे कि नीचे से क्यों नहीं चलो? तो नीचे से हठयोगी चलते हैं। नीचे में वे स्थान मानते हैं, जिसको मूलाधार चक्र कहते हैं, वे वहीं से आगे बढ़ते हैं। कोई कहते हैं कि पैर में भी तुम हो, वहीं से क्यों नहीं चलते? तो पैर से चलने के लिए कोई नहीं बताते। कोई मूलाधार से, कोई हृदय से और कोई आज्ञाचक्र से चलना बताते हैं। हृदय से चलनेवाले को मूलाधार से चलनेवाला कहता है कि मूलाधार से क्यों नहीं चलते? हृदय से चलनेवाला अन्य दूसरों से कहता है कि हृदय से क्यों नहीं चलते? आज्ञाचक्र से चलनेवाला कहता है कि जिस कर्म से तुम अपने को समेटोगे, वह कर्म हमारे पास भी है। क्या मूलाधार और क्या हृदय, सबसे समेटकर हम आज्ञाचक्र से चलते हैं। शिवजी ने कहा है कि ‘पंच पद्मों का जो-जो फल पहले कहा, सो समस्त फल आपही इस आज्ञा कमल के ध्यान से प्राप्त हो जाएगा।’ यानि यानि हि प्रोक्तानि पंच पद्मे फलानि वै । तानि सर्वानि सुतरामेतज्ज्ञानाद्भवन्ति हि ।। -शिव-संहिता संतों ने यहीं से अन्तर का रास्ता बताया है। रास्ता ज्योति का है और शब्द का है। *************** *यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट में दिनांक 3. 9. 1967 ई0 को साप्ताहिक सत्संग के अवसर पर हुआ था।* ***************

रविवार, 16 फ़रवरी 2025

फ़रवरी 16, 2025

प्यार तो प्यार होता है।

इस कविता में आपको सभी तरह के पहलू नजर आयेंगे एक बार जरूर पढ़ें 👇 प्यार तो प्यार होता है कुछ दिनों का बुखार होता है। नया नया खूब अच्छा लगता है बात बात में दिवस रैन बीतता है। क्या खाया,क्या पीया हर लब्ज होता है। बिना हाल चाल पूछे कोई नहीं बात होता है। इस कदर डूबा होता है। दुनिया से बेखबर होता है। मैसेज,फोन का इंतजार होता है मिलने को जिया बेकरार होता है। नववर्ष पर नया नया उपहार होता है। साथ में सेल्फी लेने का इंतजार होता है। जब हो जाये छह महीने साल। आने लगता दुनिया का ख्याल। कम हो जाता पूछ्ना हाल-चाल एक दुसरे पर उठाने लगता सवाल। बस इतना ही दिन का होता प्यार होश आने पर उतर जाता बुखार। सच ही कहा प्यार तो प्यार होता है। लेकिन कुछ दिनों का यार होता है।। कवि-तरुण यादव रघुनियां

शनिवार, 25 जनवरी 2025

जनवरी 25, 2025

मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

जयगुरु 🙏 सभी सज्जन वृंद से प्रार्थना है कि प्रवचन को पूरा पढ़ें आपके लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का प्रवचन को लेकर हाजिर हूं। 🙏🕉️ जय गुरूदेव 🕉️🙏 मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्यारे लोगो! जिस क्षेत्र में हमलोग सत्संग कर रहे हैं, वह बड़े महत्त्व का है। यहाँ भगवान बुद्ध बहुत सत्संग किया करते थे। यहाँ निकट ही वेणुवन में भगवान बुद्ध सत्संग कराया करते थे। यहाँ और भी पहाड़ पर उनका स्थान है। यह पुण्यभूमि है। आपलोग जो सत्संग-प्रेमी हैं, घर के कामों को छोड़कर, विहार के इस कठिन महँगाई के समय में भी खर्च करके यहाँ आए हैं। यह देखकर मेरे चित्त को बहुत ही प्रसन्नता होती है। हमलोग क्यों आए? इसलिए कि जहाँ ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध सत्संग करते थे, वहाँ सत्संग करें। सत्संग से हम क्या सीखते हैं? बच्चे खेल खेलने में-खिलौने में खुश होते हैं। वे कुछ वर्ष खुश रहते है। उनको समझाया-बुझाया जाता है, अभिभावक की ओर से उनको भय दिखाया जाता है, दबाव डाला जाता है और विद्याभ्यास में लगाया जाता है। जैसे- जैसे वे विद्याभ्यास में बढ़ते हैं, वैसे-वैसे उनके ज्ञान का विकास होता है। वे समझते हैं कि बचपन का खेल भले ही छूट गया। वह सदा का सुखदायक नहीं था। पढ़-लिख लेने के बाद कर्तव्य और अकर्तव्य को समझने लगते हैं तथा उचित विचार कर उचित कर्म को करते हैं। ऐसे ही वे चलते हैं। यहाँ ऐसे बच्चे हैं, जो देखते हैं कि केवल संसार के ही काम हैं। जो संसार के आगे का ख्याल नहीं रखते, वे भी बच्चे हैं। मैं कहूँगा, जिनको जीवन के बाद का ख्याल नहीं है, चाहे वे कितनी अधिक उम्र के हो गए हों, फिर भी वे बच्चे हैं, चाहे वे मेरी उम्र (83 वर्ष) के हों वा मेरी उम्र से अधिक के हों। विद्या से अनुचित और अनीति को समझते हैं, फिर भी उन्हीं में चलते हैं। किन्तु सत्संग से ज्ञान सीखकर जो संसार के बाद को भी सोचते हैं, उनको पता लगता है कि यह शरीर छोड़कर जाना है। लेकिन पता नहीं, कहाँ जाना है। जाना जरूर है। कहाँ जाना है? पता नहीं। रास्ता मालूम नहीं, स्थान मालूम नहीं, कितनी चिन्ता की बात है? इस बात को जो चेतते हैं, वे ही सयाने होते हैं। वे ही बालपन के खेल को छोड़ते हैं। इन्हीं बातों को समझाने के लिए संत लोग संसार में विचरते हैं। संतों ने संसार के खेल को देखा और कहा कि इसको छोड़ देना अच्छा है। एक बात तो यह है कि संसार के कामों से उपराम होना और दूसरी बात यह है कि संसार के कामों में लगे रहने पर भी संसार से उपरामता रहे। संसार के कामों में त्रुटि नहीं होने देकर उसमें उपरामता रहे, यह उत्तम है। जो संसार के कामों को छोड़कर रहते हैं, वे भी संसार के कामों और प्रबन्धों को छोड़कर नहीं रह सकते। मनुष्य को समझ में आवे कि रास्ता क्या है? जाना कहाँ है? सबसे उत्तम स्थान कहाँ है? यह भी संसार का ही काम है। और कामों से मन को हटा लिया जा सकता है, लेकिन इससे हटा नहीं सकते। बड़े-बड़े संतों, महात्माओं को ऐसा ही देखा गया। वे लड़ाई के मैदान में नहीं गए, खेती करने नहीं गए, नौकरी नहीं की, लेकिन यह काम अपने ऊपर ले लिया कि ‘चलना है रहना नहीं, चलना बिस्वाबीस।’ यह ख्याल देते रहे। चलना किस रास्ते से है। कहाँ जाना है? इस बात को समझाते हैं। यह समझाना निर्वाण में जाकर नहीं होता, संसार में रहकर ही करते हैं। दूसरे वे हैं, जो संसार के कामों को करते हुए अपने चेतते हैं और दूसरों को चेताते हैं, जैसे भगवान श्रीकृष्ण। भगवान बुद्ध संन्यासी हुए, औरों को भी उन्होंने संन्यासी बनाया। भगवान बुद्ध के समय में जितने संन्यासी हुए उतने किन्हीं के समय में नहीं। केवल संन्यासी ही नहीं बनाए, राजा और सेनापति भी उनके शिष्य थे। उनको उन्होंने संन्यासी नहीं बना लिया, उस तरह की शिक्षा दी। ‘कर ते कर्म करो विधि नाना। सुरत राख जहँ कृपानिधाना।। युद्ध भी करो और स्मरण भी करो। ‘तन काम में मन राम में।’ ‘करम करै करता नहीं, दास कहावै सोय।’ -कबीर साहब कर्म करते थे। उन्होंने अपने जीवन- यापन के लिए किसी दूसरे पर भार नहीं दिया। ‘थोड़ा बनिज बहुत ह्नै बाढ़ी उपजन लागे लाल मई।’ संतोष उनको बहुत था। थोड़ा-सा काम करते थे, अपना जीवन-यापन जिससे हो। मतलब यह कि जो संन्यासी हो जाते हैं, उनका कर्तव्य हो जाता है कि वे संसार के पार को बतावें। संसार में सदा रहना नहीं है। समर्थ रामदास ऐसे थे कि वे शिवाजी राव को चलाते थे। राजा को भी अपनी राय देते थे। शिवाजी ने कहा कि मैं तप करूँगा। समर्थ ने कहा- मैं तुम्हारा तप करता हूँ, तुम तलवार लो। गुरु गोविन्द सिंहजी महाराज ने दोनों काम करके दिखाया-भजन भी, तलवार भी। गुरु गोविन्द सिंहजी महाराज कभी अनीति में नहीं गुजरे। बेटे मर गए, लेकिन उन्होंने शोक नहीं किया। उन्होंने समय को देखा। संसार में युद्ध-ही-युद्ध होता है। वेद के उपदेश से यही मालूम हुआ कि इन्द्रिय का सुख, सुख नहीं है। संसार के पदार्थों में सुख नहीं, ईश्वर-भजन में सुख है। भगवान बुद्ध के वचन का धम्मपद ग्रन्थ से पाठ हुआ, उसमें भी यही आया, ‘ईश्वर-भजन करो’-ऐसा तो उसमें नहीं आया, लेकिन यह आया कि संसार के सुखों में आसक्त मत होओ। तब क्या करो? संसार के सुख में नहीं फँसकर, शरीर-सुख से जो विशेष सुख है, उस ओर चलो। निर्वाण की ओर चलो। यह संसार जो दीप-टेम के समान जलता है, सदा के लिए बुझ जाए, उधर चलो। हमलोग इन्हीं बातों को याद दिलाने और जो नहीं सुने हैं, उनको सुनाने के लिए यह सत्संग करते हैं। जिनको सत्संग का चसका लग जाता है, वे दूर-दूर से आते हैं। उनके मस्तिष्क को ताजा बनाने के लिए सत्संग होता है। सुनकर लोग विद्वान होते हैं। भगवान बुद्ध ने जो वचन कहे थे, लोगों ने सुने, याद रखे। लिखे तो पीछे गए। उपनिषद् के पाठ में आया कि भवसागर को पार करने के लिए सूक्ष्म मार्ग का अवलम्बन करो। स्थूल रास्ते पर चलकर संसार भर ही रहोगे, बाहर नहीं जा सकते। संसार का मार्ग तो यह है कि यहाँ से कलकत्ता जाओ और कलकत्ता से यहाँ आओ। यह स्थूल मार्ग है। दूसरा मार्ग है कि शरीर छूटने के बाद-संसार से जाने के बाद आराम से रहना हो। इसके लिए जो उत्तम-उत्तम कर्म हैं, स्थूल दर्जे के ही हैं। फिर भी उत्तम हैं, उनको करो। सूक्ष्म मार्ग बहुत उत्तम है। ‘लखे रे कोई बिरला पद निर्वाण।’ यह बाहर में नहीं है, भीतर का रास्ता है। उसपर पैर से चला नहीं जाता। सूक्ष्म अवलम्ब लेकर चलना होता है। ‘बिन पावन की राह है, बिन बस्ती का देश। बिना पिण्ड का पुरुष है, कहै कबीर सन्देश।।’ इस सत्संग से ये ही सब बातें बतायी जाएँगी। मैं धीरे-धीरे बतलाऊँगा कि सूक्ष्म मार्ग कहाँ है, उसका आरम्भ कहाँ से है और अंत कहाँ है? मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं बतलाऊँगा कि जहाँ से आपको फिर लौटकर इस संसार में आना नहीं होगा। *************** *यह प्रवचन नालन्दा जिलान्तर्गत भगवान महावीर और भगवान बुद्ध के विहार स्थल राजगीर में 58वाँ अखिल भारतीय संतमत सत्संग का विशेषाधिवेशन दिनांक 28. 10. 1966 ई0 के प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था।* *************** अगर आप प्रवचन को पूरा पढ लिये है तो शेयर जरुर करें।

सबसे पहले का पदार्थ -सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

🙏🏻🕉️ *जय गुरूदेव* 🕉️🙏🏻 *183. सबसे पहले का पदार्थ कैसा है?* *प्यारी धर्मानुरागिनी जनता!* मुझे यहाँ का आयोजन देखकर बड़ी प्रसन्...