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शुक्रवार, 8 मई 2020

संत सतगुरु महर्षि में हीं के द्वारा दिया प्रवचन:शांति पद संसार में नहीं



प्यारे लोगो,
भगवान श्रीराम का उपदेश अभी आप लोगों ने सुना। गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह उपाख्यान लिख कर संसार का बड़ा उपकार किया है।
 भगवान श्रीराम ने अपनी प्रजा को उपदेश देकर अंत में कहा, भवसागर को तरो।
 इसके लिए बड़ी ताकीद है। सागर कहते हैं संसार को। पृथ्वी का विशेष हिस्सा जल ही है। 
यह संसार बहुत बड़ा समुद्र है। इसमें जन्म लेते हैं और मरते हैं। श्रीराम को बड़ी चिंता थी कि लोग इस संसार सागर से तर जाएँ। इसलिए उपदेश दिया।
 जिन्होंने संसार के दुःखों से, बंधनों से छुटकारा कर लिया, वे भी लोगों के उपकारार्थ ध्यान छोड़कर सत्संग करते हैं।
 पहले जीवन्मुक्त बहुत पुरुष हो गए हैं। 
वशिष्ठजी, वाल्मीकि जी, संत कबीर साहब, दादू दयाल जी, तुलसीदास जी, सूरदास जी, नानक साहब, तुलसी साहब, सब जीवन्मुक्त थे। 
इन पर किसी का विश्वास हो, किसी का नहीं, किंतु मुझे तो विश्वास है।
 जो शांति पद प्राप्त कर गए हैं, वे संत कहलाते हैं।

 शान्ति पद संसार में नहीं, संसार से ऊँचा है।
 हमारे देश के पुराने संत, भगवान बुद्ध और महावीर तीर्थंकर, शंकराचार्य, स्वामी रामानंद आदि भी जीवन्मुक्त पुरुष थे।
 ऐसे लोग भी समाधि को छोड़कर हरि-चरित सुनते हैं, अर्थात सत्संग करते हैं।
 यदि पूछो कि वे सत्संग क्यों करते हैं, उनको क्या काम रह जाता है? 
वे संसार में रहते हैं, इसलिए आदर्श दिखलाने के लिए ऐसा करते हैं।
 वे अपने आचरण और उपदेश से लोगों का उपकार करते हैं।
 "जब ऐसे महान जीवन्मुक्त पुरुष सत्संग करते हैं, 
तब यदि साधारण जन नहीं करे, तो उसका हृदय पत्थर के समान है।"

 🙏🙏सद्गुरू महाराज की जय 🙏🙏

(2)ईश्वर की भक्ति से मोक्ष पाता है:सदगुरू मेंहीं
 
इसका मूल कारण गुरु- आज्ञा है।जैसे शिशु को, छोटे बच्चे को, एक ही विश्वास रहता है कि
 मेरे शुभ के लिए, सारी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए केवल मेरी माता ही हैं -  उसी तरह भक्तों को, साथ-साथ मुझको भी, यह विश्वास है कि मनुष्य के सब सुखों की एक ही माता है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरी और नहीं, एक-ही-एक माता ईश्वर की भक्ति है। 
ईश्वर की भक्ति-रूपा माता की गोद में जो अपने को रखता है, वह अशुभ कभी नहीं देखता। 
यही जानकर, इसका दृढ़ विश्वास करके संतों ने संसार के लोगों के वास्ते जो शुभ बनाया है, उस शुभ के हेतु ईश्वर की भक्ति को ही बता दिया है।

         ईश्वर की भक्ति से मनुष्य शुभ-ही-शुभ देखता हुआ अंत में मोक्ष को पाता है।
 संसार के बंधनों में, जालों में फँसा हुआ मानव शुभ की मात्रा से अधिक अशुभ देखता है।
 और अशुभ देखते हुए वह संसार के जालों में रहकर कभी नहीं तृप्ति पाता है। तो भक्तगण, संतजन कहते हैं -ईश्वर की भक्ति सब सुख देनेवाली है।
 सब शुभ के लिए एक ही माता यही है।
 इस माता को अपना लो - इस माता की गोद में हो जाओ। इसी हेतु से हमारे गुरु महाराज ने ईश्वर की भक्ति का प्रचार, जब तक उनका शरीर रहा तबतक, उन्होंने किया और हमलोगों को भी उन्होंने यही प्रचार करने का उपदेश दिया।
 तो, दैनिक सत्संग और अखिल भारतीय वार्षिक सत्संग के द्वारा इसका प्रचार होता रहता है।
 इसका मूल कारण गुरु- आज्ञा है। तो मुझे इसमें बड़ा विश्वास है। आपलोगों से मैं कहता हूँ कि ईश्वर की भक्ति अच्छी तरह से समझिए। 
जिन माता के गर्भ से आपने जन्म लिया है, वह माता आपके वास्ते बहुत ही सुखदायिनी और शुभ में रखने वाली अवश्य है;
 परंतु भक्ति-रूपा माता आपको जिस सुख में रखेंगी वह सुख निराला है।

  🙏🙏श्री सद्गुरु महाराज की जय 🙏🙏
✍सज्जनों दोनों अध्याय पढकर आनंदित होंगे 
और अंत में निवेदन हैं कि
 कमेंट्स बॉक्स में 
सदगुरू महराज की जयधोष जरूर लिखें ।
जिससे हमको भी प्रेरणा मिलेगी ।।
जयगुरू 
।।जयगुरू ।।

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