जय गुरु आज सभी सत्संगी बांधों के लिए मैं संत सतगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का अमृत वाणी को लेकर आया हूं और उसे आप पढ़ करके आध्यात्मिक उन्नति करेंगे इसलिए इस प्रवचन को जरूर पढ़ें।
🙏🕉️ *जय गुरुदेव* 🕉️🙏
बाहर में संत-पथ नहीं है, अन्दर में है-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज
*प्यारे लोगो!*
आपलोग पढ़े-सुने होंगे-
संत संग अपवर्ग कर, कामी भव कर पंथ ।
कहहिं संत कवि कोविद, श्रुति पुरान सदग्रंथ ।।
संतों का रास्ता मोक्ष में जाने का है-मुक्ति में जाने का है। संतगण सांसारिक इच्छाओं को छोड़ दिए होते हैं। वे संसार में लसक (फँस) कर नहीं रह जाते। वे मोक्ष-मार्ग पर बिना अटक (रूक) के जाते हैं। परन्तु जो सांसारिक वस्तुओं में इच्छा रखते हैं, उनको मोक्ष-मार्ग में जाने में अटक रहता है। ‘जो जो करम कीउ लालच लगि, तिह तिह आपु बंधाइउ।’-नौवाँ गुरु तेग बहादुर का वचन है। जो-जो कर्मफल की इच्छा से किए, उन-उन कर्मों से अपने को बँधा लिया। जो सांसारिक इच्छाओं को नहीं त्याग सके, वे कर्म में फल इच्छा से लगे रहते हैं। उनको संत-पंथ पर जाने में अटक रहता है। धीरे-धीरे इच्छाएँ छूटती हैं। एक ही बार इच्छा नहीं छूटती। जबतक मन मण्डल से ऊपर चढ़ाई नहीं हो, तबतक इच्छा रहेगी ही। चाहे वह इच्छा सात्त्विकी ही क्यों न हो? इच्छा तीन प्रकार की होती है-तामसी, राजसी और सात्त्विकी। सात्त्विकी इच्छा ईश्वर की ओर ले जाती है। संसार में रहकर कुछ-न-कुछ इच्छा रहेगी। सात्त्विक कर्म का भी बन्धन होता है। इसलिए त्रय गुण से परे होने के लिए श्रीकृष्ण भगवान ने कहा था। त्रयगुण से परे तुरंत होना नहीं होता। क्रमशः तामस इच्छा को छोड़ते हैं, राजस को छोड़ते हैं और सात्त्विक में आते हैं। और अंत में इसको भी छोड़कर निस्त्रैगुण्य हो जाते हैं।
संसार की वस्तुओं को त्यागने की इच्छा, फिर सात्त्विक इच्छा के त्यागने की इच्छा करो। उस इच्छा को भी छोड़ दो। इस तरह आगे बढ़ोगे। जबतक मन पर विजय नहीं है, तबतक इच्छा होती रहेगी। त्रयगुणातीत होने पर भी-संत होने पर भी, जबतक कोई संसार में रहेगा, संसार से सम्बन्ध रखेगा। संसार में रहकर संसार के सब कामों को छोड़कर रहे, असम्भव है। जैसे जाग्रत में काम करते हैं, उसके लिए इच्छा होती है। स्वप्न में भी इच्छा होती है, गहरी नींद में इच्छा नहीं होती, लेकिन हाथ-पैर का वा किसी अंग का संचालन गहरी नींद में होता है। किन्तु उस अवस्था में हाथ-पैर सिकोड़ने की इच्छा नहीं होती है। इसी तरह कर्म करके उसके फल की इच्छा संत लोग नहीं करते। उनसे राजस और तामस कर्म नहीं होगा, सात्त्विक कर्म होगा।
जो मुमुक्षु हैं, उनको चाहिए कि इच्छा को रोकें, दमन करें। तामस इच्छा का त्याग करें। इसी तरह राजस कर्म का भी त्याग करें। सात्त्विक कर्म में बरतने पर भी सात्त्विकी इच्छा का त्याग करना चाहिए। यह पंथ-रास्ता कहने भर के लिए ही है कि ठीक है भी? रास्ता कहते हैं, र्चिं को-लकीर को। चाहे रास्ता चौड़ा हो वा चौड़ाई विहीन लम्बा हो। क्या है? वह लकीर है। इसी तरह जो मोक्ष का रास्ता है, वह लकीर है। लेकिन बहुत लम्बी लकीर है-चौड़ी लकीर नहीं है। रेखा के लिए पढ़े होंगे कि उसमें लम्बाई है, चौड़ाई नहीं। ठीक वैसा ही, जैसे विन्दु का स्थान है, परिमाण नहीं। लेकिन ऐसा विन्दु वा लकीर संसार में कोई देखा है? वह चश्मा जिसको पहनकर पतले-पतले अक्षरों को मोटे-मोटे रूप में देखता है, कितनी भी पतली लकीर खींचकर उस चश्मा से देखो, तो उसमें चौड़ाई मालूम होगी। संसार में ऐसी लकीर नहीं, जिसमें लम्बाई हो-चौड़ाई नहीं। ऐसी लकीर अन्दर का मार्ग है। मोक्ष में जाने का रास्ता लम्बा-ही-लम्बा है, चौड़ा नहीं।
एक तो रास्ता बनाते हैं, चलने के लिए, दूसरा रास्ता चलते-चलते बनता है। जिस पर चला जाए, वह रास्ता है। संसार के रास्ते पर सवारी और पैर चलता है। मोक्ष के रास्ते पर न सवारी चलती है और न पैर चलता है, उसपर मन चलता है।
संतों का ज्ञान अध्यात्म-ज्ञान छोड़कर नहीं रह सकता। अपने को समझो कि तुम कौन हो? तुम मन नहीं हो, शरीर नहीं हो। किन्तु कुछ ज्यादे पढ़े-लिखे लोग, जिनको आत्मा की स्थिति का ज्ञान नहीं होता, वे कहते हैं-‘शरीर ही शरीर है, शरीर बनने से ऐसा कुछ हो गया है।’ जिस विज्ञान से वे कुछ कहते-सुनते हैं, वह अध्यात्म से सम्बन्धित नहीं है। अध्यात्म-ज्ञान सिखाता है कि आत्मा अभिन्न है, अनात्मा भिन्न है। आत्मा और मन, इसको समझाने के लिए बहुत बात नहीं, थोड़ा कहना है। जैसे शरीर माया है, वैसे ही मन माया है। मन की बनावट माया से हुई है। इसका भी रहना नहीं होगा। शरीर के जीवन में मन और आत्मा का मिलाप है। ऐसा मिलाप कि जैसे दूध और घी का। दूध को देखो तो उसमें घी का पता नहीं। घी का काम दूध से नहीं होता और दूध का काम घी से नहीं होता। कोशिश करो तो दूध को मथकर घी अलग कर लोगे। तब जो काम घी से होगा, वह दूध से नहीं। यह प्रत्यक्ष देखोगे। दूध का छेना (पनीर) होगा, लेकिन घी का नहीं। उसी तरह मन और आत्मा के मेल से जो काम होता है, वह काम केवल मन या केवल आत्मा से होने योग्य नहीं है। मन और आत्मा का मिलाप है। बिना मन के हम काम नहीं करते। कहीं चलने के लिए, कुछ बोलने के लिए मन प्रेरण करता है। पहले मन चलेगा, पैर नहीं। संत कबीर साहब ने कहा है-
बिन पाँवन की राह है, बिन बस्ती का देश ।
बिना पिण्ड का पुरुष है, कहै कबीर सन्देश ।।
कहाँ से चलेगा? रास्ता शुरू कहाँ से होगा? जो जहाँ बैठा रहता है, वहीं से चलता है। यह मन कहाँ बैठा हुआ है?
इस तन में मन कहँ बसै,निकसि जाय केहि ठौर ।
गुरु गम है तो परखि ले, नातर कर गुरु और ।।
नैनों माहीं मन बसै, निकसि जाय नौ ठौर ।
गुरु गम भेद बताइया, सब संतन सिरमौर ।।
-कबीर साहब
जानिले जानिले सत्त पहचानिले, सुरति साँची बसै दीद दाना।
खोलो कपाट यह बाट सहजै मिलै, पलक परवीन दिव दृष्टि ताना।।
‘दीद’ कहते हैं आँख को और ‘दाना’ कहते हैं तिल को। कैसे रास्ता पकड़ोगे? तो कहा-‘खोलो कपाट यह बाट सहजै मिलै।’ जाग्रत में आँख में, स्वप्न में कण्ठ में, सुषुप्ति में हृदय में और तुरीय में मूर्द्धा में वासा होता है।
मोक्षमार्ग पर चलने के लिए जाग्रत अवस्था से चलना होगा। बाहर में संत-पंथ नहीं है, अन्दर में है। इसी पर मन चलता है। जो कोई यहाँ से चलना बताता है, ठीक बताता है, यह आज्ञाचक्र है। कोई कहे कि नीचे से क्यों नहीं चलो? तो नीचे से हठयोगी चलते हैं। नीचे में वे स्थान मानते हैं, जिसको मूलाधार चक्र कहते हैं, वे वहीं से आगे बढ़ते हैं। कोई कहते हैं कि पैर में भी तुम हो, वहीं से क्यों नहीं चलते? तो पैर से चलने के लिए कोई नहीं बताते। कोई मूलाधार से, कोई हृदय से और कोई आज्ञाचक्र से चलना बताते हैं। हृदय से चलनेवाले को मूलाधार से चलनेवाला कहता है कि मूलाधार से क्यों नहीं चलते? हृदय से चलनेवाला अन्य दूसरों से कहता है कि हृदय से क्यों नहीं चलते? आज्ञाचक्र से चलनेवाला कहता है कि जिस कर्म से तुम अपने को समेटोगे, वह कर्म हमारे पास भी है। क्या मूलाधार और क्या हृदय, सबसे समेटकर हम आज्ञाचक्र से चलते हैं। शिवजी ने कहा है कि ‘पंच पद्मों का जो-जो फल पहले कहा, सो समस्त फल आपही इस आज्ञा कमल के ध्यान से प्राप्त हो जाएगा।’
यानि यानि हि प्रोक्तानि पंच पद्मे फलानि वै ।
तानि सर्वानि सुतरामेतज्ज्ञानाद्भवन्ति हि ।।
-शिव-संहिता
संतों ने यहीं से अन्तर का रास्ता बताया है। रास्ता ज्योति का है और शब्द का है।
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*यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट में दिनांक 3. 9. 1967 ई0 को साप्ताहिक सत्संग के अवसर पर हुआ था।*
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सोमवार, 24 फ़रवरी 2025
बाहर में संत पथ नहीं -महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज
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