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सोमवार, 3 अगस्त 2020

सदगुरू मेंहीं:भगवान का दर्शन और यह दुर्दशा

संत सतगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की वाणी 
🙏🙏।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।🙏🙏
बीसवीं सदी के महान संत सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज ने संसार वासियों को बताया के देखो भगवान का दर्शन भी करोगे तो दुर्दशा में ही रहोगे और आज का शीर्षक" भगवान का दर्शन और यह दुर्दशा"

लोगों में इस बात का विश्वास है कि ईश्वर की भक्ति करो, ईश्वर आकर दर्शन देंगे। इसके लिए कहते हैं कि गोलोक, साकेत, वैकुण्ठ, क्षीरसमुद्र आदि में जो बसते हैं, वे आकर दर्शन देंगे अथवा तुम चतुर्भुजी, विराट आदि जिस रूप में देखना चाहोगे, आकर दर्शन देंगे। किन्तु संतलोग कहते हैं - ईश्वर का भजन करो और अपने से जाकर दर्शन करो।
दोनों उलटी-उलटी बातें मालूम होती हैं। एक कहता है - ईश्वर आकर दर्शन देंगे और दूसरे कहते हैं - तुम अपने से जाकर दर्शन करो। जो कहते हैं कि आकर दर्शन देंगे, वे कहते हैं कि देवरूप में, चतुर्भुजी रूप में, विराटरूप में तुमको दर्शन देंगे। किन्तु दूसरे कहते हैं कि तुम इन्द्रियों से। परमात्म-स्वरूप के दर्शन नहीं कर सकते। तुम सुरत से दर्शन कर सकते हो। इसके लिए तुमको चलना होगा। चलने में तुम्हारा शरीर नहीं चलेगा, तुम्हारा मन चलेगा। चलते-चलते मन भी छूट जाएगा, तब तुम अकेले चलोगे। मन तुम्हारा साथी नहीं है, मन तो एक खोल है। जबतक तुम मन में रहते हो, मन काम करता है, इससे तुम निकल गए, तो मन मिट्टी हो जाएगा। जैसे कि तुम शरीर में हो तो शरीर काम करता है। शरीर से तुम निकल जाते हो तो शरीर मिट्टी हो जाता है। 
अब विचारो कि बाहर में दोभुजी, चतुर्भुजी, विराटरूप आदि रूपों के दर्शन से क्या होता है? इन दर्शनों से धन, जन, प्रतिष्ठा का लाभ होता है और उन लोक लोकान्तरों में बासा होगा - यह लाभ होगा। अब विचार करो कि इसमें लाभ-ही-लाभ है कि हानि भी।
 श्रीकृष्ण का दर्शन अर्जुन को बराबर होता था। अर्जुन कोई साधारण नहीं थे। वे तो नर थे। नर-नारायण विष्णु के रूप हैं। वे ही नर के अवतार अर्जुन और नारायण के अवतार श्रीकृष्ण हुए थे। विराटरूप, दोभुजी, चतुर्भुजी का दर्शन अर्जुन को हुआ था। श्रीकृष्ण के बिना अर्जुन रह नहीं सकते थे। जैसे श्रीकृष्ण नहीं तो अर्जुन भी नहीं। कथा है कि -
श्रीकृष्ण के शरीर छूट जाने पर अर्जुन का बल-पौरुष बिल्कुल चला गया। 
पंजाब के निकट लुटेरों ने लाठी-डण्डे से सब कुछ अर्जुन से छिन लिया। उनसे कुछ न बन पड़ा।
 जिस अर्जुन से बड़े-बड़े वीर, यहाँ तक कि देवता भी पार नहीं पाते थे, ऐसे वीर अर्जुन भी समय-समय पर रोए। अभिमन्यु मारा गया, तब रोए, बहुत रोए। उनका चित्त ही कहीं नहीं लगता था। श्रीकृष्ण ने उन्हें चंद्रलोक में ले जाकर उसको दिखलाया। 
पुत्र! पुत्र!! कहकर पकड़ने लगे, तो उसने फटकारा और कहा कि यह नरलोक नहीं है। तुम ‘पुत्र!' किसको कहते हो! भगवान के दर्शन होने पर भी बाईस या तेईस वर्ष तक भीख माँग-माँगकर खाया, द्रौपदी से विवाह होने से पहले ही। 
फिर कुछ दिनों तक राज्य किया। 
उसके बाद सभा में ही द्रौपदी का वस्त्र हरण किया गया। राजराजेश्वर होते हुए भी उनके मुँह से कुछ वचन न निकल सका। एक गरीब से गरीब की स्त्री का सभा में कपड़ा खींचो, तब देखो कि वह कुछ बोलता है या नहीं। पाण्डव राजराजेश्वर से गुलाम बने। राजसी कपड़े उन पाँचों भाइयों के शरीर से उतार लिए गए। आसन से नीचे गुलाम - जैसे नीचे में बैठाया। कृष्ण की दया से द्रौपदी की साड़ी बढ़ी; पाँचों भाइयों को राज्य मिला; किंतु फिर दुहराकर जुआ खेला और सब कुछ हारकर बारह वर्ष तक वनवास और एक वर्ष अज्ञात वास किया। राजा विराट की नौकरी की। 
भीम हुआ रसोइया, अर्जुन हुआ नाचनेवाली, नकुल घोड़े का जमादार, सहदेव गौ का रखवार। विराट का साला था कीचक। उसने द्रौपदी को एक लात भी मारी। विराट ने जुए का पासा युधिष्ठिर के सिर में मारा कि सिर से खून बहने लगा। 
देखो! दर्शन से लाभ ही लाभ है या हानि भी। देखो, कितनी दुर्दशा है।
द्रौपदी लौंडी का काम करती थी। केवल जूठा नहीं उठाती थी और किसी का पैर नहीं दबाती थी, और सब लौंडी का काम करती थी। कहाँ राजा की लड़की और कहाँ यहाँ दासी का काम। 
देखो, भगवान का दर्शन और यह दुर्दशा! ऐसा नहीं कि सुख ही सुख मिलेगा। सुख के साथ दु:ख लगा ही रहेगा।
अब प्रह्लाद पर आइए। इसको नरसिंह का दर्शन हुआ था। जैसा दर्शन होने से लोगों की अँतड़ी गिर जाय। प्रह्लाद को दर्शन हुआ। उसका पिता मरा और वह राजा हुआ।
किसी भी लोक लोकांतर में रहिए, देह का कुछ-न-कुछ गुण अवश्य रहता है। किसी लोक लोकांतर में रहने से मुक्ति नहीं हो सकती।
ध्रुव को दर्शन हुआ। राज्य मिला। फिर उसके भाई को किसी ने मार दिया। फिर उससे लड़ने गए। इस प्रकार झंझट-बखेड़ा रह ही जाता है। संतो ने कहा - 
जिससे सांसारिक बखेड़ा नहीं रहे, ऐसा उपाय करो।
 इन दर्शनों से तुम बखेड़ों से नहीं छूट सकते। 
भगवान के आत्मस्वरूप का दर्शन करो तो इस संसार में नहीं आओगे और सब झंझट बखेड़ा मिट जाएगा। इसके लिए तुम अपने अन्दर-अन्दर चलो, शरीर इन्द्रियों से छूट जाओ, तब तुमको दर्शन होगा। चेतन आत्मा से परमात्मा का दर्शन होगा। तब ‘जानत तुम्हहिं तुम्हइ होइ जाई’ हो जाओगे।
🙏🙏श्री सद्गुरु महाराज की जय🙏🙏

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