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शनिवार, 11 जनवरी 2025

मन में बहुत प्रकार के संस्कार भरे पड़े हैं -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार मधेपुरा आप सभी के लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का दिव्य प्रवचन को लेकर आया हूं।आप अगर पूरा पढ़ते हैं तो आपका आध्यात्मिक उन्नति कीओर मन को जरूर प्रेरणा मिलेंगे। 🙏🕉️जय गुरूदेव 🕉️🙏 मन में बहुत प्रकार के संस्कार भरे पड़े हैं-संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्यारे लोगो ! पूर्व की बात हमलोगों को स्मरण नहीं है, परंतु सद्ग्रन्थों से विदित होता है कि हमारे बहुत से जन्म हुए हैं। कितने जन्म हुए, यह संख्या में बतलाने योग्य नहीं है। किसी भी संख्या-करोड़, अरब बताने योग्य नहीं है; क्योंकि यह पृथ्वी, यह सूर्य, यह चन्द्र-सब बहुत पुराने हैं। इनकी रचना कब हुई, कोई ठीक-ठीक नहीं बता सकता। आज के लोग कुछ बताते हैं, लेकिन यह निश्चित नहीं है। हमलोग चार युगों की बात सुनते हैं। चार युग एक बार समाप्त होने पर एक चौकड़ी होती है। फिर कल्प और महाकल्प होते हैं। यह पुरानों के अनुकूल है। सृष्टि हुई है, लेकिन कब हुई है, कोई बता नहीं सकता। जबसे सृष्टि हुई है, तब से जीव-जन्तु हैं। हमलोगों के भी कितने जन्म हुए, ठिकाना नहीं। अन्दाज करके मालूम होता है कि हमारे बहुत जीवन गुजरें हैं; क्यांकि हमारे मन में बहुत संस्कार हैं। इस जन्म में कितने प्रकार के संस्कार में हम बरतते हैं-यह भी अन्दाज से बाहर है। फिर भी भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न संस्कार के देखे जाते हैं। जब लोग कुछ सयाने होते हैं और उनके संस्कार उदित होते हैं, तो इसी जन्म के सभी संस्कार हैं, कहा नहीं जाता। जो संस्कार इस जन्म में नहीं हुआ, उसके भी कर्म देखे जाते हैं। हमारे मन में बहुत प्रकार के ंसंस्कार भरे पड़े हैं। इसीलिए हमारे बहुत जन्म हुए। हमारे अन्दर जितने संस्कार उदित हुए, वे सब संस्कार सुख के लिए ही। सुख की खोज में पड़े, उसी के अन्दर दौड़े। जो ज्ञानवान हैं, उनके अन्दर में ज्ञान का उदय होता रहता है। यह ज्ञान का संस्कार पहले से ही है। कहा जाता है कि इस ज्ञान के पक्ष में बहुत जन्मों से रहे। शंकाराचार्य, भगवान बुद्ध बड़े-बड़े महात्मा हुए हैं। कबीर साहब, गुरु नानक साहब-ये सब ऐसे हुए कि बचपन से ही ज्ञान के पक्ष में चले। इसलिए कहना पड़ता है कि कई जन्मों से इनके अन्दर ज्ञान चला आता था, जो इस जन्म में उदित हुआ। साधारण मनुष्य विषय-भोग का संस्कार लेकर आते हैं और बचपन से उधर ही लगते हैं। वसन्त पंचमी में साल में एक बार हल की पूजा होती है। राजा लोग भी हल पकड़ लिया करते थे। सीताजी हल की पूजा के दिन ही निकली थीं, जबकि जनकजी हल जोत रहे थे। इसीलिए श्री जानकी जी को भूमिजा भी कहते हैं। जनकजी के हल की नोक लगने से घड़े से सीताजी निकली थीं। ढाई हजार वर्ष से कुछ पहले भगवान बुद्ध का जन्म हुआ। राजा शुद्धोधन हल जोतने गए थे। उस दिन बड़ा उत्सव था। भगवान बुद्ध को भी लेकर दाई वहाँ गई थी। दाई खेमे से बाहर निकली और फिर भीतर गई तो भगवान बुद्ध को ध्यानावस्थित उसने देखा और लोगों को भी दिखाया। ऐसा क्यों हुआ? बहुत से जन्मों से वे ध्यान करते चले आते थे। हम साधारण मनुष्य विषय-भोग का संस्कार लेकर आते हैं। इसलिए उस ओर बचपन से ही जाते हैं। कितने कुछ ज्ञान-चिन्तन और कुछ विषय- चिन्तन करते हैं। कितने बिल्कुल विषय-चिन्तन ही करते हैं, ज्ञान-चिन्तन नहीं। कितने में ज्ञान-चिन्तन की मात्रा अधिक और विषय-चिन्तन की मात्रा कम रहती है। अनेक जन्मों से लेकर आज भी हम सुख की ओर दौड़ते हैं। कितने विषय-सुख की ओर से धक्का खाकर फिर उसी ओर जाते हैं। कितने उस सुख की ओर से धक्का खाकर ज्ञान की ओर जाते हैं, विषयसुख की ओर से उनकी आसक्ति हटती है। आज के और पहले के संतों के ज्ञान से जानने में आता है कि विषय में सुख नहीं है। विषय पाँच हैं-रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द। इन पाँचों से फाजिल को कोई जानता नहीं है। इनसे अधिक संसार में कुछ है भी नहीं। इन विषयों में दौड़ते-दौड़ते थकते हैं, दुःख पाते हैं, फिर भी उधर ही दौड़ते हैं। साधु-सन्त कहते हैं और जिन्होंने अच्छा भजन किया है, वे भी कहते हैं कि बाहर विषय-सुख में मत दौड़ो। यहाँ कहाँ सुख है? सुख तुम्हारे अंदर है। उस ओर जाओ। विषय-सुख भोगते हुए मन सन्तुष्ट नहीं होता, अधिक चंचल होता है और इसी में दुःख होता है। मन बाहर-बाहर दौड़ता है, तो अन्दर प्रविष्ट नहीं होता है। संतों ने बताया कि बाहर विषयों से सन्तुष्ट तुम नहीं होओगे। इसे संतोष करो। सुख अन्दर में है। उधर चलो। तन्द्रा में अन्दर में रहते हो, तब कोई बाहर का विषय नहीं रहता, फिर भी तुम सुखी रहते हो, चैन मालूम होता है। तन्द्रा से कोई छूटता है, तो उसको दुःख लगता है। चैन तुम्हारे अन्दर है। मुख में मिसरी का टुकड़ा रहे और सो जाओ, तो उसकी मिठास तुमको मालूम नहीं होती। यदि स्वप्न में देखो कि नीम का पत्ता खा रहा हूँ तो नीम का स्वाद कड़ ूवा मालूम पड़ेगा, मिसरी की मिठास का स्वाद नहीं। चेतन भीतर में था, इसीलिए भीतर का ज्ञान होता था, बाहर का नहीं। अन्दर में सुख है। इसलिए अन्दर में चलो। अन्दर में कहाँ तक जा सकते हो? संतों ने और साधकों ने कहा कि अन्दर में चला जाता है। जब तुम स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत में नहीं रहते, तब तुरीय अवस्था में चलते हुए अन्दर का सुख पा सकते हो। जैसे-जैसे आगे बढ़ो, वैसे-वैसे अधिक सुख मिलता जाएगा। जहाँ चौथी अवस्था समाप्त हो जाएगी, वहाँ चलना भी समाप्त हो जाएगा। पहाड़ का अन्त उनकी चोटी पर होता है, इसी तरह तुरीय अवस्था का भी शिखर है। इसके शिखर पर चढ़ो, तो उसके आगे में क्या है, सो भी जानोगे। पहाड़ की चोटी पर रहने पर पहाड़ तुम्हारे पैर के नीचे रहेगा, ऊपर में पहाड़ नहीं रहेगा। इसी तरह चौथी अवस्था के ऊपर जाने पर फिर जाने के लिए स्थान नहीं रहता। इसी को गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं-‘देश काल तहँ नाहीं।’ जहाँ स्थान है, वहाँ समय है, और जहाँ समय है, वहाँ स्थान है। देश हो, काल नहीं; काल हो, देश नहीं-ऐसा हो नहीं सकता। इसको संतों ने विविध प्रकार से बतलाया है। संत दादूदयालजी महाराज ने कहा- अविगत अंत अंत अंतर पट, अगम अगाध अगोई । सुन्नी सुन्न सुन्न के पारा, अगुन सगुन नहिं दोई ।। वहाँ पहुँचने पर ही पता मिलता है कि यह ईश्वर है। वहाँ ईश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, यहाँ केवल विचार में ही। वे परमात्मा इन्द्रियज्ञान से परे हैं; मन, इन्द्रियों से परे हैं। मन इन्द्रियों से ऊपर उठकर ईश्वर को पा सकते हो। ईश्वर पाने के लिए अन्दर जाने का रास्ता संतों ने बताया। संत कबीर साहब कहते हैं- उलटि पाछिलो पैंड़ो पकड़ो पसरा मन बटोर । पसरे हुए मन को समेटो। जप से मन का सिमटाव होता है। जप से अधिक सिमटाव मानस ध्यान में होता है। पूरा सिमटाव एकविन्दुता में होता है। विन्दु में फैलाव नहीं है। इसीलिए विन्दु ध्यान की बड़ी महिमा है। हाथ-पैरवाला ईश्वर को जानेगा तो बड़ी मोटी बात है। शिवलिंग में, शालिग्राम में हाथ, पैर नहीं है। फिर ईश्वर क्यों मानते हो? इसका मतलब यह है कि केवल हाथ-पैरवाला ईश्वर होता है-ऐसा मत समझो। ऐसा सिमटाव हो कि एकविन्दुता प्राप्त हो जाए। जितने चित्र बनते हैं, विन्दुओं से। लकीर बनती है, विन्दुओं से। तेजो विन्दुः परं ध्यानं विश्वात्म हृदि संस्थितम् । अर्थात् हृदय स्थित विश्वात्म तेजस्वरूप विन्दु का ध्यान परम ध्यान है। उपनिषत्कार ने लिखा है। सबके अन्दर-अन्दर हृदय में यह विन्दु मौजूद है। ‘हृदय’ शब्द छाती के लिए नहीं, योगी लोग छठे चक्र को योगहृदय कहते हैं। यहाँ तक रूप है। संसार में रूप के बाद अरूप है। रूप स्थूल है और अरूप सूक्ष्म है। अरूप को प्राप्त करने के लिए अरूप अवलम्ब लो। अरूप अवलम्ब शब्द है। सबके अंदर शब्द गूंज रहा है। साधन करने वाला जानता है। इस शब्द का उद्गम परमात्मा है। जहाँ से यह शब्द उत्पन्न हुआ, वह परमात्मा है। कुछ बनाने में कम्प होता है। परमात्मा की मौज हुई सृष्टि बनाने में , उसमें शब्द हुआ। वह शब्द सृष्टि के अणु-अणु में प्रविष्ट है। शब्द-साधना करके जो परम पद को पाता है, वह वहाँ पहुँचता है, जहाँ से शब्द की उत्पत्ति हुई है। जहाँ से शब्द उत्पन्न हुआ, वहाँ शब्द की समाप्ति भी होती है। इसीलिए उपनिषत्कार ने कहा-‘निःशब्दं परमं पदम्।’ संतों ने कहा कि सुख खोजते हो, तो यहाँ (निःशब्दं परमं पदम् में) सुख मिलेगा। इसके लिए अनेक पीढ़ियों के संस्कार की, इन्द्रिय-निग्रह की, दीर्घोद्योग की तथा ध्यान और उपासना की सहायता अत्यन्त आवश्यक है। (देखें-लोकमान्य बालगंगाधर तिलक कृत ‘गीता रहस्य’ पृष्ठ 247) असली सुख अन्दर में मिलेगा, बाहर में नहीं। इसके लिए घर छोड़ने की जरूरत नहीं है। घर में रहो, काम करो और गुरु के बताए अनुकूल त्रैकालिक सन्ध्या अवश्य करो। रात में सोते समय भी कुछ करके सोओ। त्रैकालिक सन्ध्या अवश्य करो। सोना क्या है? गहरी नींद में जाना एक प्रकार से मरना है। मरने के पहले राम-राम कहो। इसलिए सोने के पहले कुछ जप-ध्यान करके सोओ। संसार के कामों को करते हुए भी ध्यान करो। ध्यान करते रहने से महा-से-महा संकट में भी कल्याण होगा। द *************** *यह प्रवचन बिहार राज्यार्न्तगत भागलपुर नगर के श्रीगंगातट-स्थित महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट में दिनांक 24. 4. 1966 ई0 के सत्संग में हुआ था।* *************** पूरा पढ़ने के लिए आपको बहुत बहुत साधुवाद!एक बात शेयर जरुर करें 🙏

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