बजरंगबली बचपन में बहुत ही निडर और साहसी बालक था और वह सिख धर्म का पालन बहुत ही अच्छी तरह से करने के लिए जानता था और सूर्य देव की कृपा से और सूर्य देव के आदेश से अष्ट सिद्धि प्राप्त करने के लिए उन्होंने प्रस्थान किया लक्ष्मी जी के पास जब उन्होंने पहला सिद्धि प्राप्त करके लौटा तो पहला सिद्धि का आशीर्वाद मिलने के बाद बजरंगबली ने दूसरी सिद्धि के लिए आगे बढ़ा जब आगे जाते हैं तो चारों ओर मरुस्थल मरुस्थल और कहीं घास नहीं सूखा पड़ा पृथ्वी और ऊपर से चारों ओर पृथ्वी में दरारे नजर आ रही थी सोच रहे थे कि मैं किधर चला आया हूं मेरा जिधर से भी था मैं उधर से शायद भटक तो नहीं गया हूं कुछ देर बाद जब बजरंगबली आगे बढ़ते जाते हैं तो देखते हैं कि एक माई की रोने की आवाज आ रही है बजरंगबली ने सोचा कि इस वीरान मरुस्थल में कौन है जो रो रहे हैं चारों ओर निहारते हैं तो देखते हैं कि कुछ दूरी पर एक पत्थर के टुकड़े पर एक बूढ़ी माई बैठी हुई है और रो रही है गला में माला है किस पकी हुई है और सोच संताप में डूबी हुई है जब उसके पास जाते हैं तो बोलते हैं माई क्यों रो रही हो तो वह बोलती है कि तुम को बता कर मेरा दुख दूर थोड़े होगा तुम तो बच्चे हो तुम को बता कर क्या फायदा लेकिन जब बजरंगबली ने कहा कि माता मैं तुम्हारा दुख को दूर करूंगा तुम बताओ तो तब माता ने कहा कि मैं धरती माता हूं और मेरे जितने भी संतान है सभी निकम्मे और पथभ्रष्ट हो गए हैं जो बहुत ही मेहनती और सरल स्वभाव के थे आज वह पूरी तरह से बदल गए हैं जिसके कारण आज मैं पूरी तरह से सूख गई हूं देखो कैसी दरारें पड़ गई है और इसीलिए मैं रो रही हूं कि मेरे इस दुखरा को कौन सुनेंगे मेरे इस दुख को कौन दूर करेंगे और रोने लगते हैं बजरंगबली कहते हैं माते मैं अष्ट सिद्धि का दूसरा भाग सिद्ध करने के लिए जा रहा था लेकिन मैं तुम्हारे दुख को दूर करूंगा क्योंकि मेरे माता पिता ने और गुरु ने यही शिक्षा दिया है कि अपना हित छोड़कर के पहले परहित को देखना चाहिए पर दुख को दूर करना चाहिए और मैं ऐसा ही करूंगा चलो देखते हैं कि तुम्हारा संतान कहां पर है और कैसा है और क्यों पथभ्रष्ट हो गया है और जब जैसे ही माता पृथ्वी बजरंग बली दोनों साथ आगे बढ़ते हैं बस्ती में प्रवेश करते हैं वहां देखते हैं कि सभी जितने भी संतान बंधु थे सभी मदिरा पीकर मस्त थे और सभी इधर सुधर गिर पढ़ रहे थे और सब वेश्या के गमन में व्यस्त थे। और कुछ दूर आगे बढ़ते हैं तो पृथ्वी माता और बजरंगबली देखते हैं कि एक घर में उनकी पत्नी भोजन के लिए उसको कहते हैं कि मेहनत से कमाई कीजिए अन्न उपजाइए तब ना खाइऐगा लेकिन किसान निकम्मा हो चुका था आलसी हो चुका था वह कोई काम करना नहीं चाहता था क्योंकि उसे मुफ्त का धन मिल रहा था जिसके कारण खेत में कोरना अनाज बोना हल चलाना सब कुछ छोड़ दिया था उस पर उसके पति ने तरह-तरह के बाद कहने लगते हैं मारने पीटने लगते हैं तो उसकी पत्नी कहती है ठीक है मैं खाना ला कर देती हूं और घर जाते हैं और जिस पात्र में सोने का सिक्का पड़ा हुआ था वहीं सोना का सिक्का लेकर आते हैं और उसके माथा पर गिरा देते हैं देख कर के उसके पति बहुत गुस्सा आते हैं और मारते पीटते हैं फिर उससे जब आगे बढ़ते हैं तो यही नजारा देखते हैं चारों ओर यही नजारा ही नजारा तब बजरंगबली ने पूछा माता एक बात बताओ कि इन सब को धन आता कहां से है तो पृथ्वी माता ने कहा इन सबको इस राज्य के राजा ने आलसी और निकम्मा बना दिया है और वह रोज नित प्रति धन लुटाते हैं और कहते हैं कि धन लूट कर लेते जाओ जिससे हमारे राजा के लोग को हमारे प्रजा को कोई भी दुख तकलीफ नहीं होगा सब आराम से भोजन करेंगे और मेरा नाम लेंगे और जब मेरा नाम लेते हैं तो मुझे आनंद बनता है और राजा अपने को बड़ा ही दानी कहता था कि मुझसे बड़ा दानी दुनिया में कोई नहीं है अहंकार में चूर था धन के मद में में कि मैं धन के आधार पर दानी कह लाऊंगा बजरंगबली ने कहा कि उस राजा का नाम क्या है तो माता पृथ्वी ने कहा कि कहा कि इस राज्य के राजा का नाम मदन सेन है नित्य प्रति सुबह-सुबह अपने राज में सोने का सिक्का दान करते हैं और जनता सब लूट लूट कर ले जाते हैं और सब मौज मस्ती करते हैं अय्याशी करते हैं और घर पर अपने बच्चे और पत्नी को बहुत मिलते हैं लड़ाई झगड़ा करते हैं और जिसके कारण वह किसान हल जोतना छोड़ दिए खेती करना छोड़ दिए इसलिए आज सब खेत बंजर पर गया है और इसी के कारण मैं बहुत दुखी हूं यह मेरे दुख कैसे दूर होगा तो बजरंगबली ने कहा ठीक है माते कल राज के राजा के पास जाऊंगा और राजा के पास जब जाते हैं तो कहते हैं कि राजा साहब सुने अदानी हैं तो राजा ने कहा हां मैं बहुत बड़ा दानी हूं जितना चाहो धन ले सकते हो तो इस पर बजरंगबली ने कहा कि आप मुझे धन दे सकते हैं तो मदन सेन ने सुनकर बहुत जोर से हंसा और कहते हैं कि यह वानर बालक को मेरे वजन पर भरोसा नहीं है अगर मैं चाहूं तो तुम्हें सोना के सिक्का से तोड़ सकता हूं तुरंत झट से रंग बली ने कहा कि अगर आप नहीं तोड़ सकते हैं तब क्या करेंगे तो राजा ने कहा कि तुम जो कहोगे वही करुंगा और जिंदगी भर मैं तुम्हारा दास बन कर रहूंगा लेकिन ऐसा नहीं होगा क्योंकि मैं अपने धन से तुम्हें तो लूंगा अब तो तोलने का बाड़ी है तो तो उस सर आज के जो भी प्रजा थे जो अब कामचोर हो चुका था उन्होंने सोचा कि अगर राजा इस के बचन में बंध करके अगर हार जाते हैं तो हमको जो यह मुफ्त में धन मिल रहा है यह मिलना बंद हो जाएगा इसलिए इस बानर बालक को भगाना चाहिए अगर नहीं भागा तो मार देना चाहिए और यही बात सोच कर गांव वालों ने उस बार बालक को खोजने के लिए निकलता है तू बाहर में एक झोपड़ी के पास वह बूढ़ी माई और बजरंगबली बच्चा के रूप में था तो गांव वालों ने कहा कि देखो बंदर राजा से जो चुनौती लिया है उसे वापस ले लो बजरंगबली ने कहा कि मैं चुनौती वापस नहीं लूंगा तुम लोग पूरे पुरे निकम्में हो गए हो मेहनत से कमाना छोड़ दिए हो और मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगा गांव वालों ने उनका बात सुनकर सबों ने डंडा से प्रहार किया तो तो बजरंगबली ने अपने गदा से सभी लाठी को रोका और सभी को बारी-बारी से मार कर के भगा दिया और सभी डर के मारे भाग गए सुबह जब हुआ तो वहां पर पहले से तराजू लगा हुआ था एक तराजू पर एक पल्ला पर बजरंगबली बैठते हैं और दूसरे पल्ला पर वह सोने का धन देना प्रारंभ करते हैं पूरे राज्य का धन तोल दिए लेकिन जिस पर बजरंगबली बैठा हुआ था वह टस से मस नहीं हुआ उसके बाद राज्य में जितने भी मंत्री थे सभी ने अपना धन दे दिया अब अंत में राजा ने अपना मुकुट भी जब चढ़ा दिए फिर भी तराजू टस से मस नहीं हुआ और जिस पर बजरंगबली बैठा हुआ था वह टस से मस नहीं हुआ तब राधा को उसके सामने झुकना पड़ा राजा को विश्वास हो गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है कोई महापुरुष ही है और उसके बाद उसका चरण पकड़कर क्षमा मांगते हैं और इसके बाद पृथ्वी के रूप में जो दूसरी देवी थी वह खुश होते हैं और उसको अष्ट सिद्धि का जो दूसरा शक्ति था वह उन्हें देते हैं और इस पर माता लक्ष्मी भी बहुत खुश होती है और उसे आगे बढ़ने का प्रेरणा देते हैं और अपना आशीर्वाद भी देते हैं
सोमवार, 20 जनवरी 2020
बजरंगबली को अष्ट सिद्धि का दूसरी भाग कैसे प्राप्त हुआ
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