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सोमवार, 29 जून 2020

भगवान बुद्ध का उपदेश :जैसा संग वैसा रंग

भगवान बुद्ध के वचन 
भगवान बुद्ध का उपदेश 

भगवान् बुद्ध ने जेतवन में यह कथा भिक्षुओं को ' सुनाई - बहुत दिनों की बात है।

वाराणसी के राजा के यहाँ एक हाथी था।
यों तो राजा के यहाँ हजारों हाथी थे और उनमें बड़े - बड़े डील - डौलवाले गजराज भी थे , और सीखे हुए हाथी भी थे ; किन्तु जिस हाथी की चर्चा की जायगी , वह एक विचित्र हाथी था।
वह अत्यन्त सीधा , सुशील और बुद्धिमान् था।
उस हाथी ने भूलकर भी कभी उपद्रव नहीं किया , न उसने कभी कोई हानि पहुँचायी।
बच्चे उससे खेलते थे और सभी उस हाथी से प्रसन्न रहते थे।
वह सबसे खेलता था मानव और सबको आनन्द पहुँचाता बुरे था।
दूर - दूर तक उसके गुणों की ख्याति थी और राजा उसके आराम का विशेष है , प्रबन्ध रखता था।
वह दूसरे हाथियों से अलग रहता था।
उसके लिए ऋतुओं  के अनुकूल भोजन और आराम का ध्यान रखा जाता था।
एक समय की बात है।
अँधेरी रात थी।
सर्वत्र सन्नाटा था।
हाथी एक घने वृक्ष के नीचे आराम कर रहा था।
उसके महावत दूर पर अपनी कोठरी में सो रहे थे।
घोर निर्जनता थी।
इसी समय चोरों का एक दल कहीं से आया और उस वृक्ष के निकट ही बैठ गया , जिस वृक्ष के नीचे हाथी बँधा हुआ था।
चोरों ने आपस में वार्तालाप आरंभ किया।
एक चोर बोला ' भाइयो , हमे दया , क्षमा आदि के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए।
हमारे सामने इस समय जो भी आ जायेगा , वह हमारा बैरी है।
हम तत्काल उसकी जान ले लेंगे।
यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो वह हमारी जान का ग्राहक बन जायेगा।
दया करना या क्षमा करना भयानक दोष है।
इस बुरी आदत के चलते हम विपत्ति में फंस सकते हैं।
हमें अपनी मजबूत मुट्ठी में भयंकर अस्त्र रखना चाहिये।
 जो भी मुकाबले में आवे , हम तुरन्त उसका खात्मा कर दें।
जिस घर पर हम छापा मारें , वहाँ भी सबसे पहले हमें घरवालों का खुन कर देना चाहिय।
यदि कोई छोटा बच्चा भी रोने लगे तो उसे फौरन दो टुकड़े कर देना चाहिये।
हाथी चोरों वार्तालाप सुनता रहा।
चोर लगातार वहाँ आते - जाते रहे और इसी तरह की चर्चा करते रहे।
कितने कितने खून किये इसकी भी चर्चा होती थी।
हाथी के दिमाग में चोरों का वार्तालाप घरकर गया।
उसका स्वभाव बदल गया।
उसने एक दिन एकाएक उग्ररूप धारण करके महावत का संहार कर दिया।
वह गाँव की ओर दौड़ा।
हाहाकार मच गया।
बहुत - से व्यक्ति मारे गये और कितने घर उजड़ गयेl
लोग उस हाथी से असावधान रहते थे ; क्योंकि वह अत्यन्त सीधा और प्रेमी स्वभाव का था।
इस विश्वास के चलते बहुतों ने धोखा खाया अपनी जान गंवाई या हाथ - पैर तुड़वाये।
राजा ने जब यह संवाद सुना 
तब वह अत्यन्त दु : खित हो गया।
ऐसा सौम्य  और प्यारा हाथी एकाएक इतना भयंकर कैसे हो गया !
राजा कारण का पता लगवाना चाहता था।
वह हाथी को मरवा देने के पक्ष में न था।
उनका मन कहता था कि हाथी निर्दोष है।
किसी - किसी तरह हाथी को बाँधा गया।
पशु चिकित्सक बुलवाये गये।
जाँच से पता चला कि हाथी को कोई रोग नहीं है।
यह और भी आश्चर्य की बात थी जब कोई बीमारी नहीं है तब फिर एकाएक इतना सीधा और प्यारा हाथी ऐसा उद्धत कैसे बन गया।
राजा के दरबार में स्वयं भगवान् बुद्ध ही पूर्व - जन्म में दरबारी थे।
उन्होंने कहा कि यदि महाराज का आदेश हो तो मैं पता लगाने का प्रयत्न करूं कि हाथी का स्वभाव एकाएक कैसे बदल गया ! राजा का आदेश पाकर दरबारी अपनी जाँच का काम आरंभ किया।
उन्हें पता चला कि कुछ चोर नित्य हाथी के निकट के वृक्ष के नीचे आकर बैठते हैं और वे आपस में बातें भी किया करते हैं दरबारी ने छिपकर चोरों की बातें सुनी।
जिसे सामने देखो , उसे मार डालो आदि - आदि।
हमें खून करना चाहिये , दया करना मूर्खता है।
दरबारी समझ गये।
हाथी ने अपने कोमल दिमाग से इसी बातों को ग्रहण किया और वह राक्षस बन गया।
श्रवण शक्ति में कितना बल होता है , कितनी शक्ति होती है ; यह जानकर दरबारी अवाक हो गये।
जब रोज - रोज की बुरी बातों ने हाथी के दिमाग को भी बदल दिया तब फिर मानव की क्या बिसात है?
दरबारी ने पहरेदार बैठाकर चोरों को खदेड़ दिया और वहीं पर कुछ ऐसे आदमियों को रात में बैठाया जो जोर - जोर से बातें करने लगे- हिंसा महापाप है।
क्षमा , दया और प्रेम ईश्वर की देन है।
जीवमात्र पर प्रेम रखना , स्वप्न में भी किसी को पीड़ा न पहुँचाना सबसे बड़ा धर्म है ..... इत्यादि।
हाथी पिछली बातें भूलने लगा और वह इन नई बातों को ध्यान से सुनता हुआ शान्त हो गया।
उसकी भयानकता मिट गयी और कुछ ही दिनों में वह फिर इतना शान्त और प्रेमी बन गया कि नगर निवासी चकित हो गये।
बुरी बातों का असर बहुत ही जोरों से हृदय पर पड़ता है और मानव को राक्षस बना देता है।
बुरे उपदेश कान का विष है।
मुँह से खाया हुआ विष एक ही व्यक्ति का जान लेता है ; किन्तु कानों से जो विष  खाया जाता है वह पूरे के पूरे खानदान समाज या देश को ही मार डालता है।

🙏🙏🙏🙏🏻श्री सद्गुरूवे नमः 🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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