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मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

योगी देवता के पद से भी आगे बढ़ जाते हैं -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार आप सभी धर्मप्रेमी के महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का दिव्य प्रवचन लेकर आया हूं। सद्गुरु महाराज का प्रवचन जीवन को नयी आध्यात्मिक पर ले जाने वाला है।इसे पूरा पढ़ें 🙏🕉️ जय गुरूदेव 🕉️🙏 योगी देवता के पद से भी आगे बढ़ जाते हैं-संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! आपलोग शान्तिप्रिय बनें। शान्ति कैसे प्राप्त हो, यह इस सत्संग से जानें। सत्संग में भक्ति के बारे में कहा जाता है, ईश्वर-स्वरूप का ठीक- ठीक निर्णय बताया जाता है। आपके अपने-अपने घरों में, ईश्वर संबंधी कोई- न-कोई शब्द बच्चों को रटाते हैं। यह बहुत अच्छी रिवाज है। ईश्वर को अनेक मानना गलती है। क्या! ईश्वर अनेक हो सकते हैं? जो भक्त ईश्वर को अनेक मानते हैं, वे कम जानते हैं। ईश्वर दो हो नहीं सकते, यह एकदम असम्भव है। अनेक ईश्वर को मानने की साम्प्रदायिक भावना आपस में झगड़े पैदा कर देती है। यथार्थ में ईश्वर एक ही हैं। नाम और रूप अनेक हैं। उपनिषद् का यह ज्ञान बहुत उत्तम है- वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ।। -कठोपनिषद् , अध्याय 2, वल्ली 2 अर्थात् जिस प्रकार इस लोक में प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है। ब्रह्म या आत्मा एक-ही-एक है, वह वायु के ऐसा सर्वव्यापक है और सर्व से परे भी है। ईश्वर का न केन्द्र होता है और न परिधि। जीव केन्द्र और परिधियुक्त है। ईश्वर केन्द्र और परिधि से परे है। उसकी सीमा कहीं नहीं होती है। उसी एक को राम, शिव, विष्णु आदि कहते हैं। यह नाम, रूप माया है। ‘नाम रूप दुइ ईश उपाधी।’ (गोस्वामी तुलसीदासजी) पशु-योनि में जो मन रहता है, वही मन मनुष्ययोनि में भी रहता है। इसीलिए पशु-योनि का संस्कार मनुष्यों में पाया जाता है। जीवात्मा परमात्मा का अभिन्न अंश है। यह अंश आवरण के कारण से माना जाता है। कितना भी बड़ा रूप बना लो, वह रहेगा आकाश के अंदर ही। ईश्वर माया के रूप को भरकर उससे बाहर कितना है, कोई नहीं कह सकता। ईश्वर इन्द्रियों को व्यक्त नहीं, परन्तु आपको व्यक्त है। जो कोई योगी होता है, वह देवता के पद से भी आगे बढ़ जाता है। जहाँ जाकर ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ होता है। मनुष्य वहाँ तक जा सकता है। परमात्मा की भक्ति हम माया रूप पाने के लिए नहीं, उनके स्वरूप को पाने के लिए करें। मनु-शतरूपा को माया रूप का दर्शन हुआ, लेकिन उनका कष्ट नहीं छूटा। इससे छूटने के लिए अमायिक रूप का दर्शन चाहिए। उन्हें आत्मा से ही पहचान सकेंगे। आत्मा को अपनी कैवल्य-दशा में आना चाहिए। शरीर माया से निर्मित घर है। इसको जबतक हम पार नहीं कर जाएँ, तबतक हम कैवल्य-दशा को प्राप्त नहीं कर सकते। अंदर चलने के लिए ध्यानाभ्यास करो। किसी रूप का ध्यान स्थूल ध्यान है। रूप ध्यान से सिमटाव होता है और सूक्ष्म ध्यान करने की योग्यता प्राप्त होती है। ध्यान करने के लिए कहीं घर छोड़कर भागने की आवश्यकता नहीं। कर्म करो और ध्यान भी करो। सज्जनों के धर्मानुकूल चलो। पंच पापों से रहित को सज्जन कहते हैं। दमशीलता का अभ्यास करो। दमशील इन्द्रियों को रोकने का स्वभाववाला होता है। दमशील केवल विचार से नहीं हो सकते। मन की सूतें इन्द्रियों से लगी हुई है। ध्यान से मन को इन्द्रियों की घाटों से समेटा जाता है। द *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 26. 12. 1965 ई0 के अपर्रांकालीन सत्संग में हुआ था।* ******* प्रवचन को पूरा पढ़ने के लिए आपका आभार। शेयर जरुर करें

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