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शनिवार, 22 जनवरी 2022

दिल की आह -कविता

सोच सोच कर दिमाग खराब है
 लगता भगवान को यही स्वीकार हैं।।

सोच सोच कर बहुत रास्ता को छोड़ा
बच बच कर कितनों से मुंह को मोरा
अब तो चारों ओर से गिरफ्तार हैं
लगता मेरा सारा बुद्धि बेकार है।।

हंस हंस कर कितनों को टाला
सोचता था अपने को हिम्मतवाला
अब बात दिल और दिमाग से बहार है
क्या कहूं खुद कुछ कहने से लाचार हैं।।
~तरूण यादव रघुनियां

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