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शनिवार, 28 दिसंबर 2024

योग के आरंभ का नाश नहीं होता -संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

मैं तरुण कुमार सभी धर्मप्रेमी के लिए संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का प्रवचन लेकर हाजिर हूं। पूरा पढ़ें 🙏🕉️ *जय गुरूदेव* 🕉️🙏 योग के आरम्भ का नाश नहीं होता *प्यारे लोगो!* जो अचेत पड़ा हुआ हो, वह कुछ समझे बूझे-ऐसा नहीं हो सकता है। इसलिए संत- महात्मागण कहते हैं कि तुम सचेत हो जाओ। विषयों में लवलीनता अपने को अचेत रखना है। विषयों में लवलीनता नहीं हो, यह असम्भव नहीं है। पंच विषयोपभोग काल में जो जाग्रत दशा रहती है, उसमें थोड़ी-सी सचेतता है। तीन अवस्थाओं के अंदर हमलोग स्वभावतः गुजरते रहते हैं। इसमें विषय लवलीनता रहती है। जिस तरह ये तीनों अवस्थाएँ होती रहती हैं, उसी तरह एक चौथी अवस्था भी है। यह अवस्था योगी को प्राप्त होती है। जिन्होंने इसे पाने की ठीक विधि जानकर अभ्यास किया, उन्हें अवश्य ही इस अवस्था का ज्ञान होता है। चौथी अवस्था में यह स्थूल संसार खो जाता है। जैसे इस साधारण जागने की अवस्था में स्वप्नावस्था खो जाती है। केवल वाक्य-ज्ञान में निपुण होने से कोई विषयों से अनासक्त नहीं हो सकते। हमलोग सात्त्विक, राजस एवं तामस कर्म करते हैं। सात्त्विक कर्म का परिणाम वहाँ तक पहुँचाता है, जहाँ पहुँचकर तीनों गुणों से बाहर हुआ जाता है। तामस कर्म नीचे-नीचे की योनियों के भोगों को भोगता है। सात्त्विक कर्म ईश्वर की उपासना ही है। ईश्वर की उपासना इस तरह से करें कि वह हमें तीनों अवस्थाओं से ऊपर उठा सके। चौथी अवस्था का भेद बतानेवाले गुरु चाहिए। ऐसे गुरु के मिलने पर ही वह साधन हो सकेगा। पापों से छूटना ध्यान से ही हो सकता है और कर्मों से नहीं हो सकता। सुकर्मों को करते हुए जो ध्याना- भ्यास करते हैं, वही कर्मों के बंधनों से छूटते हैं। यदि शैल समं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम् । भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ।। -ध्यानविन्दूपनिषद् अर्थात् यदि अनेक योजनों तक फैले हुए पहाड़ के समान भी पाप हो तो वह ध्यानयोग से नष्ट हो जाता है। जिस कर्म का परिणाम दुःखद हो वा आवागमन करानेवाला हो, वह पाप है। ध्यान, लव लगाने को कहते हैं। कोई भी क्यों न हो, ध्यान सभी कर सकते हैं। ध्यान की युक्ति गुरु से सीखनी चाहिए। मैंने जो थोड़ा-सा अभ्यास किया है, उससे मुझे विश्वास हो गया है। इस अभ्यास में चलते रहो-अनवरत रूप से चलते रहो। अंत में वही होगा, जो संतों को प्राप्त हुआ है। ध्यानयोग के द्वारा सिमटाव होता है। सिमटाव से ऊर्ध्वगमन होता है। द्वैत का जहाँ तक विस्तार है, यदि ध्यान-योग से वहाँ तक की सीमा को पार कर गए तो सारे कर्मों-कर्म बंधनों से छूट जाता है। ध्यान-योग का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। एक-एक डेग चलते रहने से कितने कोस निकल जाते हैं, इसी तरह थोड़ा-थोड़ा नित्य नियमित रूप से ध्यानाभ्यास करते रहने से अवश्य लाभ होगा। ध्यानाभ्यासी का जब-जब जन्म होगा, मनुष्य योनि में ही जन्म होगा। इसका संस्कार कभी नष्ट नहीं होगा। भगवान कृष्ण ने कहा-‘योग के आरम्भ का नाश नहीं होता।’ भक्ति बीज बिनसै नहीं, जो युग जाय अनंत । ऊँच नीच घर जन्म ले, तऊ संत को संत ।। संतों की वाणी से दिलाशा होती है। अपने को पवित्र रखना चाहिए। *************** *यह प्रवचन पुरैनियाँ जिलान्तर्गत ग्राम-रूपौली में दिनांक 25. 12. 1965 ई0 के प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था।* इस प्रवचन को पूरा पढ़ें और शेयर करें 🙏

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