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बुधवार, 15 अप्रैल 2020

सदगुरू मेंहीं बाबा का वाणी:सब कोई धर्म को पकड़ो,सुखी रहोगे

बीसवीं सदी के महान संत 
सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज की
 अमृतवाणी को हम सब पढ़ रहे हैं 
आइए हम लोग धर्म के गूढ़ रहस्यों को 
सदगुरु महाराज के वचनों में पढ़ते हैं
 और श्रवण करते हैं :-

बंदौ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि।
 महा मोह तम पुंज जासु बचन रविकर निकर।।

 प्यारे लोगों आप अपने घर में कई समांग से हैं
 सबको आपस में प्रेम रहे 
इस भांति एक साथ रहते रहेंगे तो 
आप बहुत सुख मालूम करेंगे
 चाहे आप थोड़े लोगों से घर में रहे।
वा अधिक लोगों से।
 जिनके घरों  में लोग मेल से रहते होंगे 
कितने सुख से रहते होंगे समझिए ।।
जहांं प्रेम रहता है वहां सुबुद्धि रहती हैं ।
जहां प्रेम नहीं रहता वहां दुर्बुद्धि रहती है 

"जहां सुमति तहां संपति नाना 
जहां कुमति तहं बिपति निदाना"
(गो0 तुलसीदास )
यह बहुत ठीक बात है 
जहां सुमति है वहां बहुत संपत्ति है
 जहां कुमति है वहां बिपति ही विपत्ति है ।
अपने देश की क्या हालत हो गई है ।
आपस की सुमति टूटी दूसरे देश के लोग 
यहां आकर शासन करने लगे।
 जो इतिहास पढ़े हैं उनको याद आती होगी 
यहां के जो बड़े राजा थे पृथ्वीराज ।
वे दिल्ली में रहते थे 
पृथ्वीराज का घर वहां नहीं था ।
वह नाना के यहां रहते थे 
उनके नाना को पुत्र नहीं था इसलिए 
उनको राजा बनाया गया था ।
कन्नौज में राजा जयचंद रहते थे 
वह भी दिल्ली के उन्हीं राजा के नाती थे 
पृथ्वीराज और जयचंद दोनों मसैरा भाई में 
विवाद हुआ ।
जयचंद जाकर दूसरे राजा को जो देश से बाहर था 
खबर दिया 
वह पहले से ही दिल्ली दखल करना चाहता था
 पर पृथ्वीराज से हार हार कर अपना देश जाता था ।
दिल्ली दरबार और कन्नौज दरबार में 
फूट होने के कारण दूसरे देश का राज्य हो गया 
इस्लाम धर्म वालों का 7 सौ वर्षों तक 
राज्य शासन चला ।
इसके बाद अंग्रेजों का शासन हुआ ।
इन बातों को समझने वाले हमारे देश में हुए
 50 वर्षों तक कोशिश हुई 
कांग्रेसी यानी बड़ी सभा का शासन होगा ऐसा हुआ 
अंग्रेज बड़े शक्तिशाली थे उनका देश बहुत छोटा था 
लेकिन एक मेल के लोग, एक ख्याल के वे लोग थे 
वहां आज भी राजा है लेकिन राजा  से विशेष
 अधिकार सभा को है ।
अंग्रेज यहां राज करते थे
 यहां मेल हो जाने पर अंग्रेज को यहां से 
जाने को कहा गया
 होते होते उनकी शक्ति कम हो गई 
और वे यहां से चले गए।
 हम सबको अब स्वराज्य है स्वराज्य में कमी है 
सुराज होने की ।
 सुराज कहते हैं जहां चोरी बेईमानी, ठगी ,घूसखोरी आदि दुष्कर्म नहीं हो।
 तब स्वराज्य को सुराज मिल जाए
 एक मेल से स्वराज्य मिला है  लेकिन सुराज नहीं ।
सूराज कौन लावेगा आज के शासक कभी नहीं
 यह लोग परिश्रम करते हैं लेकिन सूराज नहीं ला पाते
 जैसे एकमत पहले हो गए थे 
विदेशी राज्य को भगाया
 वैसे फिर एक मत हो तो सूराज आ जाए ।
खेत में चीज है तो उसका पहाड़ा करो 
घर में सामान की रक्षा के लिए पहड़ा रखो
 बाहर जाओ तो अपनी रक्षा आप करो 
यह सब काफी दिक्कतें हैं क्यों 
इसलिए कि सुराज नहीं है।
 सुराज लाने के लिए  सुबुद्धि लानी होगी
 सुमति लानी होगी
 जो झूठ बोलता है दुष्ट कर्म करता है 
उसको लोग कहते हैं कि इसको सुबुद्धि नहीं है
 यह पापी है।
 नहीं असत्य सम पातक पूंजा 
गिरी शम होही कोटिक गुंजा।।
 (गोस्वामी तुलसीदास)

 अपने देश में झूठ बहुत हो गया है इसको हटाओ 
इसको हटाने कौन कहेगा?
 धर्म तो थरथरा गया है 
वह यदि आदमी होता तो कहता कि लोगों ने 
हमारी रीढ ही को तोड़ दिया है।
 अंग को खंड खंड कर दिया है 
इसलिए सब कोई धर्म से बंधो
जिससे शरीर ठीक रहे रीढ ठीक रहे वह धर्म है ।
पीठ की रीढ टूट जाए तो समझो क्या हालत हो
 पिठीया घाव होता है तो बड़ा खराब हो जाता है
 कितने मर ही जाते हैं।
 इसलिए सत्य बोलो धर्म को अपनाओ
 ईश्वर को मानना ईश्वर की भक्ति, यही धर्म का सार है ।
जिस धर्म में ईश्वर की भक्ति नहीं ,वह असार धर्म है ।
इसलिए हृदय खोलकर भक्ति को अपनाओ 
जो भक्ति नहीं अपनाते
 उनके सत्य बोलने की शक्ति नहीं आती
 ईश्वर को समझो उनका
 अप्रत्यक्ष रूप में संसार में दर्शन नहीं कर सकते ।
यद्यपि वे संसार में है पर पहचानते क्यों नहीं हो 
जिस यंत्र से पहचानना चाहिए वह यंत्र नहीं है
 तो जैसे आंख से रूप रंग देखते हो आंख नहीं 
तो रूप रंग क्या देखेगा
 इसलिए कहा
" खोजो रुह के नैना"
 (कबीर साहब )
उपनिषद में आया है आत्मा से आत्मा का ग्रहन होता है ।कबीर साहब  ईश्वर स्वरूप के लिए कहते हैं 

"स्वरूप अखंडित व्यापी चैतन्य श्चैचतन्य "
ऊपर नीचे आगे पीछे दाहिन बाई अनन्य ।।

उससे कहीं खाली नहीं है
 दृष्टि दृष्टि से देखा यानी दृष्टि की भी दृष्टि जो है
 उससे देखो 
जो दृष्टि को भी दृष्टि शक्ति प्रदान करता है वह है चेतन ।
हम लोग जिस आंख से देखते हैं वह चर्म दृष्टि है ।
उससे उस ईश्वर को नहीं देख सकते
 किस से देखेंगे 
खोजु रुह के नैना
 कबीर साहब ने कहा है यह बात बहुत गंभीर है 
वह चेतन आत्मा आप स्वयं है
 आप शरीर और इंद्रियों से बंधे हुए हैं 
शरीर इंद्रियों के संग वाला ज्ञान नहीं हो
 केवल चेतन आत्मा का ज्ञान ईश्वर दर्शन का ज्ञान है
 जो ज्ञान जो शिक्षा इस ज्ञान की खोज के लिए हो 
उसको प्राप्त करने का प्रयास करना धर्म है।
 इसकी शिक्षा संत लोग दे गए हैं उसको जानना चाहिए 
और उसको करना चाहिए ।
पुस्तकों को खूब पढ़ लो और करो कुछ नहीं
 तो पढ़ने का क्या फल मिलेगा 
खेती के लिए भी महाविद्यालय है उसमें पढ़ लिया 
कि इस समय खेत जोते 
इस समय वह और खेत को जोतता वह नहीं तो क्या होगा
 बिना किए कुछ नहीं होता है 
इसी तरह ईश्वर भक्ति के संबंध में चेतन आत्मा को 
शरीर इंद्रियों के ऊपर उठाना है ।
इनके लिए जो काम अपेक्षित है वह है 
(1)पहला सत्संग 
(2)दूसरा आचरण ठीक रखो
(3) तीसरा उपासना ध्यान करो 
इन तीनों कामों को करो सत्संग करो ठीक से समझो 
विधि भी जानो और उपासना भी करो
 सत्संग के द्वारा उस कर्म का विचार दिया जाता है 
जो कि नित्य करने का है ।
बनाने वाला बना देते हैं 
अच्छे आचरण को सदाचार कहते हैं 
अच्छे आचरण से रहोगे जिसमें 
झूठ चोरी नशा हिंसा और व्यभिचार 
यह पांचों नहीं है
 पांच पापों को नहीं करते रहोगे तो
 आपका धर्म अच्छा हो जाएगा 
जितने लोग ऐसे बनोगे एक मन के हो जाओगे ।
सत्यता आएगी झूठ भागेगा
 तब आपस में मेल होगा 
इसको कोई तोड़ नहीं सकेगा
 सुख से रहोगे तब स्वराज के साथ सूराज को 
भोगोगे 
स्वराज अपना राज है और सूराज यानी दुष्ट कर्म रहित राज
 इस देश में कभी कोई पहले ताला नहीं लगाता था जिसके घर में जो कुछ था वैसे पड़ा रहता था 
कोई कुछ लेता नहीं था झूठ तो जानते ही नहीं थे
 जो एकांत में बात करते थे वही 10 आदमी के बीच में ऐसा नहीं कि एकांत में एक बात हो और 10 आदमी के बीच में दूसरी बात हो
 महाजन से जो कोई कर्ज उधार लेते थे उसकी कागज पर लिखा पढ़ी नहीं होती थी
 लेने वाले ठीक-ठीक पहुंचा देते थे 
सत्य में बढ़ तो एक धर्म में बर्तनों के आपस में मेल से रहोगे 
सुख होगा 
इसलिए वेद में आया है कि आपस में मेल से रहो
 एक मन से ईश्वर की उपासना करो 
एक दूसरे का खंडन करते हैं
 पहले तो किसी का खंडन नहीं करते थे 
एक ईश्वर का ज्ञान जैसा दिया गया है 
वहीं उपासना करते थे ।
सभी ईश्वर को अपने अंदर खोजते थे 
यदि सभी नहीं तो ऐसे लोग अधिक थे ।
और ऐसे लोग कम थे जिनमें धर्म की प्रबलता नहीं थी धर्म की कमी के कारण देश में सुख की कमी हो गई है ।
धर्म धारण होगा 
घर में सुख से रहने के लिए धर्म धारण होगा 
मोक्ष पाने के लिए
 संतों ने सबके ख्याल को मिलाकर कहा सबका ईश्वर एक है ईश्वर को पाने का एक ही रास्ता है ।
सब कोई अपने को अंदर अंदर चलावेगा शरीर इंद्रियों से अलग होकर अपने स्वरूप में रहकर मोक्ष पावेगा 
ईश्वर दर्शन होगा 
सुख से रहोगे 
ईश्वर की भक्ति ऐसी है कि उसमें सदाचार का पालन होता है 
सदाचार पालन से सुंदर देश बनता है 
सुंदर लोग बनते हैं ।
पहरा के लिए चौकीदार व अपराधी को पकड़ने के लिए पुलिस की जरूरत नहीं होती
 "(सभी कोई धर्म को पकड़ो सुखी रहोगे)"

 श्री सतगुरु महाराज की जय
 बीसवीं सदी के महान संत ने जो अनुभव किए वह सारगर्भित बानी भक्तों के सामने सुनाएं
 और उसी का अंश था और भी प्रवचन विवेचना और अध्यात्मिक कथा पढ़ने के लिए निशा में ढेर सारा आर्टिकल है जाकर अवश्य पढ़ें और मनन करें अधिक लाभ होगा तो आइए पूरा पूरा पढ़ें और जीवन में उतारें तो आध्यात्मिक क्षेत्र में अग्रसर होंगे यही शुभकामना के साथ वाणी यहीं पर समाप्त करते हैं

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